16 सितंबर, 2014

ये आदतें




कल हम नहीं होंगे 
सोचकर,
…… …… 
अपने दिमाग में भी 
एक घुप्प सन्नाटा होता है 
…।  
ये जो चीज 
मैंने छुपाकर 
संभालकर रखी है 
वो फिर अपने मायने खो देगी 
सरप्राइज़ तो बिल्कुल नहीं रह जाएगा  
और यह जो डायरी सी लिखती हूँ 
नहीं रहने पर 
पता नहीं किस शब्द के क्या मायने हो जाएँ !
लॉकर की चाभी गुम हो गई है 
अचानक नहीं रही 
तो बहुत फेरा हो जायेगा !
अभी कई काम भी निबटाने हैं 
घर अस्त-व्यस्त है 
थकान,दर्द के बावजूद 
ठीक तो करना ही है 
ये दीवारों पर बारिश से चित्तियाँ हो गई हैं 
… ठीक है 
ये मेरा अपना घर नहीं 
लेकिन किराया दे रही हूँ,
कोई आएगा तो रखरखाव में 
मेरी सोच,
मेरे रहन-सहन की ही झलक मिलेगी 
… 
नवरात्रि नज़दीक है 
उससे पहले जितिया 
पूजा के लिए सफाई अभियान शुरू करना है 
… 
यूँ अचानक नहीं रहने पर 
सबकुछ धरा रह जाता है 
जैसे अम्मा का इयरफोन, चश्मा  ....… 

पर धरे रह जाने से पहले तो 
सबकुछ सिलसिलेवार होना ज़रूरी है न 
अम्मा की भी यही समस्या थी 
- एटीएम बदलवा दो 
- इस इयरफोन से ठीक सुनाई नहीं देता 
- सर दर्द - लगता है कुछ हो गया है 
- kbc आने का समय हो तो बताना 
-  एक कॉपी दो, लिख दूँ सवाल -जवाब इसके 
बच्चों के काम आएँगे   … 
… 
अब अम्मा नहीं है 
पर उसकी वे सारी आदतें, 
जिनपर हम झल्ला जाते थे 
टेक लगाकर भीतर बैठ गई हैं  … 
सुनो न अंकू
वो स्टिकर का काम 
वो प्रिंट 
वो  … … … 
देखो न मिक्कू ये काम बाकी है 
खुशबू, जरा वो काम देख लेना 
… पता है समय नहीं 
तुमलोगों को याद भी है 
फिर भी !
अब जवाब हो गया है 
- तुम एकदम अम्मा हो गई हो"
… मुस्कुराती हूँ,
अम्मा की बेटी हूँ न। 
फिर सोच की लहरें आती है 
और लगता है - कह ही लूँ,
भूल जाऊँगी 
.... आजकल भूलने भी लगी हूँ 
वो भी बहुत ज्यादा 
महीने का हिसाब करने के बाद भी 
लगता है,
शायद पैसे देने रह गए हैं 
किसी दिन दे देने के बाद दुबारे दे सकती हूँ !
उपाय निकाला है 
लिख लेती हूँ 
बशर्ते याद रहे कि लिख लिया है !
दीदी गुस्साती है 
'अरे तुम हम सबसे छोटी हो' 
ये तो सच है 
पर भूल जाती हूँ तो क्या करूँ !

अब क्या बताऊँ -
अम्मा बगल में सोने से पहले विक्स 
अमृतांजन,मूव सबकुछ लगाती थी 
नवरत्न तेल भी 
मैं अक्सर कुनमुनाती - 
अम्मा, इस गंध से मैं बीमार हो जाऊँगी 
.... अब रोज सोने से पहले मैं मूव,अमृतांजन लगाती हूँ 
दर्द ही इतना है कंधे में 
लगाते हुए सोचती हूँ 
- अंकू कुछ कहती नहीं 
परेशानी तो होती ही होगी  … 
दिन में कई बार हाथ बढ़ाती हूँ उसकी तरफ 
- उँगलियाँ खींच दो 
पढ़ाई रोककर वह ऊँगली खींचती है 
और मैं - अम्मा की तकलीफें सोचती हूँ 
और पूर्व की बातें 
… 
'क्या सोच रही हो अम्मा?' 
… 'ऐसे ही कुछ,कुछ'
- फ़ालतू सोचने से कुछ होगा ?
???????????
अब मैं सारे दिन कुछ कुछ सोचती हूँ 
अपनी समझ से सार्थक 
दूसरे की दृष्टि से फ़ालतू !!!
सोचते हुए चेहरा अजीब सा बन जाता है 
जगह कोई भी हो - घर,मॉल, खाने की कोई जगह 
.... बच्चे टोकते हैं,
माँ, तुम किसी को नहीं देख रही 
पर लोग तुम्हें देख रहे हैं 
हँसी आ जाती है 
लेकिन अगले क्षण वही हाल !

राशन लेते लेते अचानक 
मोबाइल पर पंक्तियाँ टाइप करने लगती हूँ 
घर जाते कहीं भूल न जाऊँ 
कई बार तो "माँ $$$$$$$$$$$$$$$$$$$$"सुनाई भी नहीं देता 
मुँए ये ख्याल 
जगह ही नहीं देखते 
फिल्म देखते हुए मैं सोचती हूँ 
- खत्म हो, घर लौटूँ तो कुछ लिखूँ !

सामने क्या 
हर कमरे में अम्मा की तस्वीर लगा रखी है 
जिधर जाउँ 
हँसकर कहती हैं 
'क्यूँ ? हो गया न मेरे जैसा?"
मैं मस्तिष्क में ही बड़बड़ाती हूँ 
- हम्म्म हो ही जाता है 
और हो जाने के बाद ही समझ आती है ये आदतें !!

19 टिप्‍पणियां:

  1. सच कितना कुछ जोड़ता है..बचाता हैं इन इंसान अपने लिए अपनों के लिए फिर अंत में सबकुछ यही धरा रह जाता है ..जैसा आया वैसा चला जाता है ...सबकुछ जानकार भी कितना अनजान रहता है जीवन भर ......
    कितनी उधेड़बुन में जीवन रमा रहता है ....
    जीवन के प्रति गंभीर चिंतन बोध कराती सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. अजीब बात है न !
    वही होने लगता है या अनजाने हम वही करने लगते हैं जो हम पसंद नहीं करते या नहीं होना चाहते !
    जीवन अपनी कहानी स्वयं लिखता है !

    उत्तर देंहटाएं
  3. समझ में नहीं आ रहा है दीदी कि इस रचना में मैं अम्मा का भूतकाल देख रहा हूँ या आपका और हमारा भविष्य... कितनी बारीकी से आपने एक-एक पलों को संजोया है... सचमुच लगता है कि अम्मा उतर आई हैं आपके अन्दर, आपके व्यवहारों में. वो सब कुछ जो उनके रहते लगता था कि हमें नापसन्द है, इसी बहाने उनकी पहचान बनता गया और अब हमारी पहचान...
    सही कहा था किसी ने
    मेरे जैसे बन जाओगे/
    जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा
    और इश्क़ ही तो था वो
    जो कह गया
    लाली देखन मैं चली
    मैं भी हो गई लाल ...

    आपकी इस रचना में अम्मा के स्वर सुनाई दे रहे हैं!! प्रणाम दी!

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत खूबसूरती से बाँध दिया है आपने शब्दों के साथ शब्दों को माँ से माँ तक समय के लौटने का ऐहसास समय समय के साथ कितनी खूबसूरती से कर ले जाता है जाने वाला रहने वाला आने वाला सबकुछ एक हो जाता है :)

    उत्तर देंहटाएं
  5. हाँ दी यही सच होता है जिसे हम जीते जी चाहे न स्वीकारें मगर उसके बाद खुद जब उससे गुजरते हैं स्वीकार लेते हैं ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. दी.......बार बार पढ़ रही हूँ..उदास सी हो रही हूँ...

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  7. सलिल भाई ठीक कहते है यह रचना हमारे भविष्य को आईना दिखा देती है !
    आजकल मै भी अपना चश्मा, गैस पर रखा दूध, मोबाईल बहुत कुछ भूलने लगी हूँ :)
    बचपन सुन्दर था युवावस्था का अपना अलग महत्व था वृद्धावस्था की ओर बढ़ते हुए हम जिसके अनुभव की अपनी गरिमा है,परिपक्ता का अपना मजा है , लेकिन परिस्थितियों को हर बदलाव को जब हम अहोभाव से स्वीकार करते है न तब जीने की गुणवत्ता में भी बदलाव आ जाता है ! यह सच है कल हम नहीं रहेंगे लेकिन आज है क्यों न इसीका आनंद मनाते है,माता-पिता की जिन आदतों से कभी हम झल्लाते थे आज हम भी उन आदतों से गुजर रहे है तो अजीब सा लगना स्वाभाविक है !

    उत्तर देंहटाएं
  8. आदतों का लिहाफ़ चुपके से ओढ़ाकर जाने वक्‍़त दबे कब पांव आगे बढ़ जाता है और हम सोचते रह जाते हैं .... कई बार अम्‍मा की छवि उभरी कई बार आप मुस्‍करा कर आगे बढ़ गईं ये अभिव्‍यक्ति कहाँ परछाईं है अम्‍मा की जिसे आपने शब्‍द दिये

    उत्तर देंहटाएं
  9. - हम्म्म हो ही जाता है
    और हो जाने के बाद ही समझ आती है ये आदतें !!
    ...एक शाश्वत सत्य...कितनी खूबसूरती से पिरोया है अहसासों को शब्दों में, एक एक पल जीवंत हो गया है नज़रों के समक्ष...

    उत्तर देंहटाएं
  10. कितना भी पूरा करने का प्रयत्न करें एक दिन तो सब अधूरा ही रह जाने वाला है...उस दिन को भुलाने का असफल प्रयत्न करती हैं ये आदतें...

    उत्तर देंहटाएं
  11. कितना कुछ बाकी है अभी जो करना है ... फिर न होने की सोच क्यों ...

    उत्तर देंहटाएं
  12. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  13. kitni sahajta se itni sochne waali baatein likh di aapne... bahut hi achi rachna hai... aadatein to adatein hai... aisey thode hi naa badllengi... jab apne uppar aati hai tab pata chalta hai!!
    bahut uttam!!

    उत्तर देंहटाएं
  14. ये मेरा अपना घर नहीं
    लेकिन किराया दे रही हूँ,
    कोई आएगा तो रखरखाव में
    मेरी सोच,
    मेरे रहन-सहन की ही झलक मिलेगी ---- मन के सार्थक विचारों को व्यक्त करती सच्ची अनुभूति --- सुंदर रचना
    सादर----

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत बारीकी से जीवन के हर क्षण को इस अभिव्यक्ति में उतारा है । सच वक़्त के साथ माँ की हर बात याद आती है ।

    उत्तर देंहटाएं

शीशम में शीशम सी यादें

छोड़ कैसे दूँ उस छोटे से कमरे में जाना जहाँ पुरानी शीशम की आलमारी रखी है धूल भले ही जम जाए जंग नहीं लगती उसमें  ... ! न उसमे...