11 जनवरी, 2008

अरे कोई है ???


सन्नाटा अन्दर हावी है ,
घड़ी की टिक - टिक.......
दिमाग के अन्दर चल रही है ।
आँखें देख रही हैं ,
...साँसें चल रही हैं
...खाना बनाया ,खाया
...महज एक रोबोट की तरह !
मोबाइल बजता है ...,
उठाती भी हूँ -
"हेलो ,...हाँ ,हाँ , बिलकुल ठीक हूँ ......"
हँसती भी हूँ ,प्रश्न भी करती हूँ ...
सबकुछ इक्षा के विपरीत !
...................
अपने - पराये की पहचान गडमड हो गई है ,
रिश्तों की गरिमा !
" स्व " के अहम् में विलीन हो गई है
......... मैं सन्नाटे में हूँ !
समझ नहीं पा रही ,
जाते वर्ष से गला अवरुद्ध है
या नए वर्ष पर दया आ रही है !
........आह !
एक अंतराल के बाद -किसी का आना ,
या उसकी चिट्ठी का आना
.......एक उल्लसित आवाज़ ,
और बाहर की ओर दौड़ना ......,
सब खामोश हो गए हैं !
अब किसी के आने पर कोई उठता नहीं ,
देखता है ,
आनेवाला उसकी ओर मुखातिब है या नहीं !
चिट्ठी ? कैसी चिट्ठी ?
-मोबाइल युग है !
खैर ,चिट्ठी जब आती थी
या भेजी जाती थी ,
तो सुन्दर पन्ने की तलाश होती थी ,
और शब्द मन को छूकर आँखों से छलक जाते थे
......नशा था - शब्दों को पिरोने का !
.......अब सबके हाथ में मोबाइल है
............पर लोग औपचारिक हो चले हैं !
......मेसेज करते नहीं ,
मेसेज पढ़ने में दिल नहीं लगता ,
या टाइम नहीं होता !
फ़ोन करने में पैसे !
उठाने में कुफ्ती !
जितनी सुविधाएं उतनी दूरियां
वक़्त था ........
धूल से सने हाथ,पाँव,माँ की आवाज़ .....
"हाथ धो लो , पाँव धो लो "
और , उसे अनसुना करके भागना ,
गुदगुदाता था मन को .....
अब तो !माँ के सिरहाने से ,
पत्नी की हिदायत पर ,
माँ का मोजा नीचे फ़ेंक देता है बेटा !
क्षणांश को भी नहीं सोचता
" माँ झुककर उठाने में लाचार हो चली है ......"
.......सोचने का वक़्त भी कहाँ ?
रिश्ते तो
हम दो ,हमारे दो या एक ,
या निल पर सिमट चले हैं ......
लाखों के घर के इर्द - गिर्द
-जानलेवा बम लगे हैं !
बम को फटना है हर हाल में ,
परखचे किसके होंगे
-कौन जाने !
ओह !गला सूख रहा है .............
भय से या - पानी का स्रोत सूख चला है ?
सन्नाटा है रात का ?
या सारे रिश्ते भीड़ में गुम हो चले हैं ?
कौन देगा जवाब ?
कोई है ?
अरे कोई है ???????????????

12 टिप्‍पणियां:

  1. अरे भाई है पढ़ रहें हैं आपको :-)

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  2. जाते वर्ष से गला अवरुद्ध है
    या नए वर्ष पर दया आ रही है !

    bahut sare sach ek sath kah dale
    kis ksi sach ko ab dil sambhale

    bahut achha likha hai
    Anil

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  3. "हम दो ,हमारे दो या एक ,
    या निल पर सिमट चले हैं ......
    लाखों के घर के इर्द - गिर्द
    -जानलेवा बम लगे हैं !"

    बहुत ही मार्मिक चित्रण है संबंधों का विखरते आयाम का..

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  4. अरे कोई है॰॰॰? बहुत ही शानदार रचना है॰॰॰॰॰॰॰॰॰ वर्तमान के कड़ुवे सच को आपने शब्दों मे अंकित कर चिंतन करने का नेक काम किया है॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ वास्तव मे रिश्तों की खत्म होती गर्मी चिंतनीय है॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
    आदरणीय रश्मी जी ॰॰॰॰॰ इतनी अच्छी रचना के लिये आपको बधाई॰॰॰॰॰॰शुभकामनायें॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰

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  5. रश्मि जी
    बहुत जानदार अभिव्यक्ति ..विचारों के अविरल प्रवाह को बखूबी शब्दों में बाँधा है ..बहुत अच्छा लगा पढ़ना एक साँस में पढ़ गयी ... बधाई

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  6. अब जवाब नही आते…………कौन सुनता है…………बहुत सुन्दर रचना।

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  7. सच है किसी के पास समय नहीं बोरिंग टीवी प्रोग्राम देखना मंजूर पर पास के कमरे से भी रिश्ता नहीं रह गया वहाँ चाहे माँ बाप रहते हों या भाई बहन

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  8. .......हँसती भी हूँ, प्रश्न भी करती हूँ
    .......स्व के अहम में विलीन हो गई हूँ
    .......आनेवाला उसकी ओर मुखातिब है या नहीं !
    ...... फ़ोन करने में पैसे - उठाने में कोफ़्त|

    अद्भुत स्पष्टवादिता| बहुत प्रभावित करती है आप की ये कविता रश्मि जी| ये सब ऐसे प्रश्न हैं जिनके जवाब हैं सभी के पास, पर जवाब देने वाला कोई भी नहीं|
    उत्कृष्ट कोटि की कविता के लिए बारम्बार बधाई रश्मि जी|

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  9. अंदाज अलग है पर कसक वही है.
    बहुत सुन्दर.

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  10. -मोबाइल युग है !
    खैर ,चिट्ठी जब आती थी
    या भेजी जाती थी ,
    तो सुन्दर पन्ने की तलाश होती थी ,
    और शब्द मन को छूकर आँखों से छलक जाते थे
    ......नशा था - शब्दों को पिरोने का !

    अब तो फोन पर बात हुई और खत्म ..चिट्ठी में लिखे जाने वाले शब्द कहाँ जगह पाते हैं ..बहुत अच्छी रचना

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शाश्वत कटु सत्य ... !!!

जब कहीं कोई हादसा होता है किसी को कोई दुख होता है परिचित अपरिचित कोई भी हो जब मेरे मुँह से ओह निकलता है या रह जाती है कोई स्तब्ध...