16 जनवरी, 2008

मायने बदल जाते हैं...



जब मासूम ज़िन्दगी अपने हाथों में,
अपनी शक्ल में मुस्कुराती है
तो जीवन के मायने बदल जाते हैं...
बचपन नए सिरे से दौड़ लगाता है!
कहाँ थे कंकड़, पत्थर?
कहाँ थी काई ?
वर्तमान में जीवंत हो जाते हैं॥
नज़रिये का पुनर्आंकलन
मासूम ज़िन्दगी से जुड़ जाते हैं...
जो हिदायतें अभिभावकों ने दी थी
वो अपनी जुबान पर मुखरित हो जाते हैं!
हमने नहीं मान कर क्या खोया
समझने लगते हैं
नज़र, टोने-टोटके पर विश्वास न होकर भी
विश्वास पनपने लगते हैं!
"उस वृक्ष पर डायन रहती है...."
पर ठहाके लगाते हम
अपनी मासूम ज़िन्दगी का हाथ पकड़ लेते हैं
"ज़रूरत क्या है वहाँ जाने की?"
माँ की सीख, पिता का झल्लाना
समय की नाजुकता समय की पाबंदी
सब सही नज़र आने लगते हैं!
पूरी ज़िन्दगी के मायने
पूरी तरह बदल जाते हैं

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया. अरे ! हम कहाँ पहुँच गए ? सच ही है, उस दुनियाँ में हर बात के मायने कितने जुदा हैं .... कितने अलग. अच्छा है रश्मि जी. बधाई.

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  2. जब मासूम ज़िन्दगी अपने हाथों में,
    अपनी शक्ल में मुस्कुराती है
    तो जीवन के मायने बदल जाते हैं...
    बचपन नए सिरे से दौड़ लगाता है!
    आत्मा को छू गई बहुत सुंदर रचना बधाई

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  3. बचपन नए सिरे से दौड़ लगाता है!
    कहाँ थे कंकड़, पत्थर?
    कहाँ थी काई ?

    ...अतीतजीवी मन की व्यथा-कथा अच्छी है।

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  4. badee bata nahee ki ye kavita sach hai
    badee baat ye hai ki bhut sundar tarah se sach ko sthapit kiya hai sar jhuk gaya hai mera to

    Anil

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  5. ्बिल्कुल सही कहा ………कब ज़िन्दगी के मायने बदल जाते हैं पता भी नही चलता।

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  6. समय की नाजुकता समय की पाबंदी
    सब सही नज़र आने लगते हैं!
    पूरी ज़िन्दगी के मायने
    पूरी तरह बदल जाते हैं

    सत्य का दर्शन हरती रचना ...आभार

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  7. समय की नाजुकता समय की पाबंदी
    सब सही नज़र आने लगते हैं!
    पूरी ज़िन्दगी के मायने
    पूरी तरह बदल जाते हैं
    इस जिंदगी में हर पल मायने बदलते है ,जो समझ ले तो पiर अन्यथा जीवन निस्सार

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  8. जब मासूम ज़िन्दगी अपने हाथों में,
    अपनी शक्ल में मुस्कुराती है
    तो जीवन के मायने बदल जाते हैं...
    बचपन नए सिरे से दौड़ लगाता है!

    कुछ सम्मोहित पलों की याद दिलाती सुन्दर पंक्तियाँ/रचना दी...
    सादर.

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