13 मार्च, 2008

अजीब बात!


कितनी अजीब बात है!
नारी की जीत,उसकी पूरी मनोदशा-
पुरुष की फाइल में बंद होती है!
एक कैरेक्टर सर्टिफिकेट के लिए,
वह घर-बाहर का संतुलन बनाये रखती है....
प्रतिभा से अधिक 'स्त्री-धर्म' मायने रखता है.....
'स्त्री-धर्म'!
तब होती है उसपर 'इनायते करम'
और वह 'धन्य'होती है....
जगह जो तुम्हे दिखाई देती है
कभी उसके पीछे का नज़ारा देखा है?
भावनाओं की अनगिनत लाशें,
ओह!इस सच को कैसे समझ पाओगे-
इक इमरोज़ के लिए ,
जाने कई बार
कितनी ज़िन्दगी
तोहमतों की राह पर
रो-रो के दम तोड़ती हैं!!!!!!!!!!!!

6 टिप्‍पणियां:

  1. ACHHI KAVITA...
    HAMESHA AAPKI KAVITA PROVE KARTI HAIN KI AAPKE PAAS SHABD K SAATH ANUBHAV BHI HAI QKI AAPKE SHABD BOLTE HUE SE PRATEET HOTE HAIN

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  2. बिल्कुल सही बोलते हैं आपके शब्द रश्मि जी ..जिस तरह आप भावनाओं को लफ्ज़ देती है वह तारीफे काबिल है !!

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  3. बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है ... लेकिन सच तो है. क्या कहा जाए ? एकदम सही कहतीं हैं आप. लेकिन .....

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  4. bahut hi sahi kaha nari ke astitv par rashmi ji,ab hum doctor hai,koi rishtedar ye nahi puchta,aap kitni behtarin operation karti hai,puchte hai khana bana sakti ho ki nahi,ya padhai mein wo sikha hi nahi,kab badlega ye sab.i think people dont know that a women is very much more efficient than others in multi-tasking work.at work and at home to.apko bahut badhai.

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  5. बहुत सुन्दरता और सहजता से मनोभावों को उकेरा है.

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