20 मई, 2008

जीत.......




पौधे जब लगाये थे
तो धूप पानी कुछ नहीं था,
बस था तूफ़ान का अनवरत सिलसिला !
बड़ी मुश्किलों से देवदार,गुलाब
और रजनीगंधा लगाए,
आंखों के जल से सींचा था,
ममता की बाड़ लगाई थी
और रक्षा मंत्र का पहरा था!
सबने कहा था-
"आसान नहीं पौधों को बचाना,"
जो जीवन का उद्देश्य बना !
जाने कितने कांटे चुभे पाँव में,
और पौधे भी अकुलाए,
टांग दी तब ये झूठी तख्ती-
"कुत्तों से सावधान"....
डर से फिर आतंक रुक गया,
एक-एक झूठ की आड़ में मैंने
सौ सत्य का वरदान लिया.......
आज खड़ा है देवदार,
देखो वह उन्नत भाल लिए,
और मन है ओत-प्रोत
फूलों की सुगंध लिए-
आज फिर सत्य की जीत हुई,
आया बसंत आँगन में,
चहुँ ओर है सूर्य की लाली,
हँसता चाँद गगन में...
जीवन में खुशियाँ चहक उठीं हैं,
कोई तिनका तोड़ लूँ या बढ़कर
काजल का गहरा टीका लगाऊँ
मेरे आँचल में खुशिया सिमट चली है..........


17 टिप्‍पणियां:

  1. गहरा कथ्य, बेहतरीन रचना..

    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  2. जीत.......




    पौधे जब लगाये थे


    तो धूप पानी कुछ नहीं था,


    बस था तूफ़ान का अनवरत सिलसिला !


    बड़ी मुश्किलों से देवदार,गुलाब


    और रजनीगंधा लगाए,


    आंखों के जल से सींचा था,


    ममता की बाड़ लगाई थी


    और रक्षा मंत्र का पहरा था!


    सबने कहा था-


    "आसान नहीं पौधों को बचाना,"


    जो जीवन का उद्देश्य बना !


    जाने कितने कांटे चुभे पाँव में,


    और पौधे भी अकुलाए,


    टांग दी तब ये झूठी तख्ती-


    "कुत्तों से सावधान"....


    दर्र से फिर आतंक रुक गया,


    एक-एक झूठ की आड़ में मैंने


    सौ सत्य का वरदान लिया.......
    बहुत अच्छे ।

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  3. atisundar abhivyakti,bahut sahi,paudhe lagana aur bachana aasan nahi bahut mushkil hai,magar jab angan mein devdar khada ho sari khushiyan udkar aati hai.kisi ki nazar na lage aapki khushiyon ko,aameen.

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  4. वात्सल्य- उत्सव के उन्नत शिखर को छूती एक ममतामयी रचना...

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  5. दिल की गहराई से उठते भावों की उम्दा अभिव्यक्ति, बधाई.

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  6. बड़ी मुश्किलों से देवदार,गुलाब



    और रजनीगंधा लगाए,



    आंखों के जल से सींचा था,



    ममता की बाड़ लगाई थी



    और रक्षा मंत्र का पहरा था!
    kya dunia ki har maa aap jaisi hai??????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????

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  7. आज खड़ा है देवदार,

    देखो वह उन्नत भाल लिए,

    और मन है ओत-प्रोत

    फूलों की सुगंध लिए-

    आज फिर सत्य की जीत हुई,

    आया बसंत आँगन में,

    चहुँ ओर है सूर्य की लाली,

    हँसता चाँद गगन में...
    yahi to hai asli jeet
    bilkul sahi likha hai aapne

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  8. mamta ke anchal ko chaakar..
    tumne paudhe bade kiye...
    angan main ghar ke hi tumne...
    drakht hain dekho khade kiye...

    jisko duniya "jeet" hi maane..
    vahi jeet kahlaati hai...
    man ke jeete jeet hi milti...
    duniya ye samjhati hai....

    Deepak

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  9. "पौधे जब लगाये थे
    तो धूप पानी कुछ नहीं था,
    बस था तूफ़ान का अनवरत सिलसिला !
    बड़ी मुश्किलों से देवदार,गुलाब
    और रजनीगंधा लगाए,
    आंखों के जल से सींचा था,
    ममता की बाड़ लगाई थी
    और रक्षा मंत्र का पहरा था!"
    अब विपरीत परिस्थिति में भी इतनी तन्मयता से कोई पौधे लगायेगा, तो उन पौधो का फलदार वृक्ष हो जाना तो लाजमी है | अपने कर्मो के प्रति ईमानदारी हो और अटूट विश्वास हो तो जीत निश्चित है |एक बेहतर अभिव्यक्ति |

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  10. "कुत्तों से सावधान"....

    दर्र से फिर आतंक रुक गया,

    एक-एक झूठ की आड़ में मैंने

    सौ सत्य का वरदान लिया.......

    ek baar phir se advitiy
    Anil

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  11. bahut si sandaar rachna ...
    manushy jivan ko bahut hi sundarta hai dhala hai pratiroopo me ..

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  12. sach me rashmi ji ...jeet jaisee bhi hoti ho..par aapki kavita me varnit charitra ki uplabdhi se jyada sukhmay nahi hoti hogi...

    nari ka astitwa ka sabse pada falak shayad uska matritwa hi hota hai..
    aur us astitwa ki poornta ke sangharse ko sah kar paar nikalne se badi vijay aur kya ho sakti hai???
    is tarah ki kavita janha bhaav aur anubhav ka dayraa itna vishad ho main rachnakar ki tareef je jada unki ijjat karne lagta hun......
    ....desh.

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