29 मई, 2009

टिकाटिप्पणी


मैं उनके घर की नहीं ,
लेकिन हर रोज
वे मुझे खाने की मेज़ पर सजाते हैं,
बड़े चाव से अपनी प्लेट में मुझे परोसते हैं
और टिकाटिप्पणी शुरू ............
" इसमें अपना कोई स्वाद और रूप नहीं है !
नमक थोड़ा और ज्यादा हो
तो ठीक रहेगा...........
धीमी आंच पर ही इसे बनाना चाहिए.......
पता नहीं क्यूँ,
कुछ जले जैसा टेस्ट रहता है इसका ...."
अनवरत कमी !
पर अपनी मेज़ पर मुझे लाना नहीं भूलते
.........
बिना टिका टिप्पणी के
उनका पेट नहीं भरता,
या यूँ कहें ,
दिन नहीं बनता !

25 टिप्‍पणियां:

  1. बिना टिका टिपण्णी के उनका पेट नहीं भरता -
    अगर धीमी आंच पर पकाओ तो कच्चा लगता है, तेज पर पकाओ तो जला हुआ ... अक्सर देखा तो ऐसा ही गया, अगर कुछ अच्छा करो तो भी टिका होती है, ना करो तो भी टिपण्णी की जाती है .. This HUman nature or wat ? सत्य के करीब लगी रचना.. Ilu..

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  2. sundar vyang

    insaan ki fitrat hi hai aisi ki
    bina kuch bole nigal nahi pata
    or maza bhi to nahi aata naa

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  3. दरअसल, आपका लिखा मुझ अ-बुद्धिजीवि के समझ में नहीं आया।

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  4. बहुत सुंदर , कविता मै आप ने बहुत कुछ कह दिया, चित्र देख कर हंसी आ गई, धन्यवाद

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  5. vah rashmi ji bahut badiya jo paas nahin hai vahi achha lagata hai er jo paas hai usme buraayean dikhti hain admi kabhi shukarguzar nahin hota aabhaar

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  6. चित्र तो क्या खूब लगाया है आपने । बहुत कुछ स्पष्ट करती रचना । आभार ।

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  7. wah! rozmarra ki baton ko itni aasani se kah diya aapne...aur han koi lambi tippadi bhi nahi ki :-)

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  8. आम जिन्दगी की आम बात को आपने बिशेष ढ़ंग से पेश किया है। वाह।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  9. रचना के लिये बहुत बहुत धन्यवाद.आप अच्छा लिखती है और आशा है हमें और रचनायें मिलेंगी....

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  10. यहाँ डाल डाल पर सोने की चिडिया करती है बसेरा वो भारत देश है मेरा.............
    अब ऐसा नहीं है ........
    डाल तो है पर सोने की चिडिया नहीं उनकी जगह,चील,और गिद्धों ने ले ली है......
    जो मौका मिलते ही बदन को नोच डालते हैं....
    उनके लिए इंसानियत के कोई मायने नहीं.....
    अक्षय-मन

    कोई भूल हुई हो तो माफ़ कीजियेगा.....
    अपने शैतानु को....::)

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  11. yahee to jivan kee sachchai hai.....bahut hee sarataa se itnee sundar baat kah dee aapne...

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  12. सच्चाई को बयान करती रचना ...

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  13. गलतिया देखने की आदत हों जाती है लोगो को...और उसमे जो पकाता है , वो सब लोग जो बोलते है सुन लेती है.इसलिए उन्हें बढावा मिल गया है...

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  14. छोटी छोटी बातोंमे कही लम्बी बात.............. सचमुच टीका टिपण्णी के बिना दिल की शुरुआत नहीं हो सकती............अच्छी रचना है

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  15. बिम्ब के माध्यम से उकेरी गयी पेचीदा मनस्थिति की इस रचना की जितनी प्रशंसा की जाय ऊतनी ही कम है ! " पर अपनी मेज पर मुझे लाना नहीं भूलते ,,,,,,,,,,,,,बिना टीका टिप्पणी.........." बहुत खूब रश्मि जी !

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  16. रश्मिप्रभा जी,

    बहुत अच्छा लगता है आपको पढना, छोटी छोटी बातों को शिल्प में ढालना और कविता कह देना।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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  17. hamesha kii tarah ......
    choti see baat se apne maksad tak pahuchna .....
    ajeeb hai par aapke saath sach ho jaata hai ma'am

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  18. कई बार पढ़ गया मैम..मेरी कम-इल्मी कि समझ नहीं पाया

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  19. rashmi ji,


    ghar men ek saath sab baat cheet kar saken wo waqt hai khane ka samay....aur sab mil kar baat cheet men le aate hain ek doosare par teeka tippani....sundar bhavabhivyakti ..

    badhai

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  20. अगर इंसान संतुष्ट हो जाये तो फिर वो इंसान कहाँ?
    और कमियां निकालने की आदत तो हर किसी में होती है किसी में कम किसी में ज्यादा..
    हाँ ,स्त्री में सहन शीलता अधिक है ,इस लिए उसे ही कहा जाता है और वह सुनती है..
    कहती नहीं..कहने लगेगी तो फिर ........??

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  21. वाह वाह क्या बात है! बहुत ही उम्दा रचना है!

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