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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

08 January, 2010

प्रत्यंचा




मन की धाराएँ
तटों से टकराकर
जब गुमसुम सी लौटती हैं
तो दिशा बदल
क्षितिज के विस्तार में
बढ़ने लगती हैं
और धरती से आकाश तक
अपनी प्रत्यंचा खींच देती हैं

46 टिप्पणियाँ:

वन्दना ने कहा…

waah.........gazab ka likha hai.

अनिल कान्त : ने कहा…

aap kam panktiyon mein koi bhi baat vistaarpoorvak kah jati hain.

ye bahut achchha lagta hai

smriti ने कहा…

vicharon ke teer chubhte hein
magar lahoon nahi nikalta
apni aankh ke paniyon ko dhoondhne lagti hoon
ek boond ...bas ek boond us namkeen pani ki nikal jaye
to mann ki dhara par bhi kisi pushp ke pallawait hone ki sambhavna jage....!

Rashmi di...... aapki rachnayein behad behad prerit kar jaati hein... aur kuchh na kuchh likh hi jaati hoon....! khush naseeb hun jo aapka saath uplabdh ho paya...!

Suman ने कहा…

nice

Mithilesh dubey ने कहा…

बेहद उम्दा ।

sangeeta swarup ने कहा…

मन की धाराएं.....क्षितिज का विस्तार और धरती से आकाश तक प्रत्यंचा

बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति......बधाई

ρяєєтι ने कहा…

यही कहेंगे की - "कम शब्दों में गहरी बात "...ILu..!

अजय कुमार ने कहा…

इंद्र्धनुष जैसा सुंदर भाव

Priya ने कहा…

Ye pratyancha nature ki ho ya fir man ki....zaroori hai jeene ke liye....control ke liye

Priya ने कहा…

Ye pratyancha nature ki ho ya fir man ki....zaroori hai jeene ke liye....control ke liye

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

मन और मन में बनते-बिगड़ते भावों का सुंदर चित्रण..धन्यवाद ..रचना अच्छी लगी..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

ये तो बहुत बढ़िया सीपिका है जी!
बधाई!

sakhi with feelings ने कहा…

bahut sundrta se phir bhav khinche hai yaha

hamesha ki tarah bahut acha laga padna

मनोज कुमार ने कहा…

बेहद रोचक ।

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

इस रचना मे शब्दों का समावेश व अभिव्यक्ति प्रभावशाली है किंतु भाव कल्पना से ओतप्रोत जान पडते हैं, .. धाराएं कौन से तटों से टकराकर विस्तार रूप ले रहीं हैं और कहां प्रत्यंचा खींच रहीं हैं .. !!!!
टिप्पणीकारों द्वारा भी लेखक की तारीफ़ में खूब वाह-वाही दर्ज की है जो अपनी उपस्थिति दर्ज कराने ... !!!!
लेखक की कल्पनाशीलता बेहद प्रभावशाली है जो निश्चिततौर पर बधाई के योग्य है !!!!

वाणी गीत ने कहा…

धाराएँ दिशा बदलकर प्रत्यंचा चढ़ा लेती हैं ...क्या खूब कहा ...
आप तो दिनोदिन मेरी आदर्श बंटी जा रही है ...प्रणाम ..:)

Ravi Rajbhar ने कहा…

Pradam di,
Hamesa ki tarah gagar me sagar bhari di hai aapne...badhai swikare

दिगम्बर नासवा ने कहा…

गुमसुम से मान की दौड़ कहाँ जा कर रुकेगी कोई नही जानता .........
मान के एहसास को गहरे से बयान किया है आपने ........

Ankur Mishra ने कहा…

Pranam,
badhi mriduta se vicharo ka samavesh kiya hai apne.
ap ki profile bahut hi achhchhi hai

Shayaar ने कहा…

Didi, bahut manmohak kavita kahi hai. Aapki kavitayein mere liye kisi sapne ke samaan hoti hai. bahut khoobsurat kavita aur baat kehne ka tareeka to kya kahun...waah!!

--Gaurav

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

सुंदर कविता ।

Babli ने कहा…

आपको और आपके परिवार को नए साल की हार्दिक शुभकामनायें!
बहुत बढ़िया रचना लिखा है आपने!

शोभना चौरे ने कहा…

man ke hi taro ko jhnkrat kar gai ah abhivykti .

rahul kumar ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना

निपुण पाण्डेय ने कहा…

bahut sundar!!!!
thode se shabdon me bahut gahre bhaav!
:)

अल्पना वर्मा ने कहा…

क्षितिज के विस्तार में जाने का संकेत!
मन की उथल पुथल को दिशा दे रही है....आप की यह कविता.

rashmi ravija ने कहा…

हमेशा की तरह..गागर में सागर..

रोहित ने कहा…

behad achhi kavita hai............

श्री श्री साढ़े सात हजार बाबा सांडनाथ !! ने कहा…

ये प्रत्यंचा बहुत खूब है पर इनपे चाप नहीं चढ़ता !!!

M VERMA ने कहा…

और यह खिची हुई प्रत्यंचा चित्र में भी दिख रही है.
बहुत खूबसूरत

निर्मला कपिला ने कहा…

रश्मि जी कम शब्दों मे इतनी बडी बात कह दी। बहुत बहुत बधाई। इस प्रत्यंचा को खींचे रखें तभी तो हमे इतनी सुन्दर रचनायें पढने को मिलेंगी। शुभकामनायें

amit ने कहा…

शब्दों के इंतज़ार में है यह मन की अपने भावो को कैसे आप से कहे ....
हसीन है आप के शब्दों का संसार ...

अमित

संत शर्मा ने कहा…

खुबसूरत अभिव्यक्ति

Rajiv ने कहा…

रश्मि जी,बहुत दिनों से ऐसी ही एक कविता की आशा में था जो जीवन का पूरा विस्तार लिए आगे बढती हो. इन्द्रधनुषी बिम्बों के सहारे आपके भावों ने जो रूप धरा हैं वह अपने- आप ही सब कुछ कह जाता है.

Rajiv ने कहा…

सीमित से असीमित की आपकी यात्रा ने बहुत प्रभवित किया है.

jenny shabnam ने कहा…

rashmi ji,
sundar bhaawaabhivyakti, aapki kalpanashilta par daad kubool karen.

Apanatva ने कहा…

bahut hee pyaree rachana hai.bhav he ot - prot .

रंजना ने कहा…

WAAAAHHH !!!! KYA BAAT KAHI.....

ITNE KAM SHABDON ME AAPNE POORA BIMB SAKAAR KAR DIYA...CHITRA KI TO KOI AAWASHYKTA HI NA BACHI...

Pankaj Upadhyay ने कहा…

jee ekdam yaho hota hai..gumsum si lautti bhi hain aur pratyancha bhi banati hain...saaare prayog karti hain..saare..

महावीर ने कहा…

थोड़े से शब्दों में भावों का विस्तार भी क्षितिज के विस्तार से कम नहीं.
सुन्दर अभिव्यक्ति.
महावीर शर्मा

sada ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द ।

mark rai ने कहा…

बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति.....

संजय भास्कर ने कहा…

मन और मन में बनते-बिगड़ते भावों का सुंदर चित्रण..धन्यवाद ..रचना अच्छी लगी..

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

आपका भी जवाब नहीं...!शब्दों और भावनाओं की सुन्दर अभिव्क्ति..

संजय भास्कर ने कहा…

मन और मन में बनते-बिगड़ते भावों का सुंदर चित्रण..धन्यवाद ..रचना अच्छी लगी..

Devendra ने कहा…

सुंदर.