19 सितंबर, 2010

पागल हो तुम भी !


पागल हो तुम भी
खुद के लिए नहीं जीती
खुद के लिए नहीं सोचती
और ताखों से प्यार करती हो
कई बार तुम्हारा दिया निस्तैल फूटता है
पर ताखों को रौशनी देना नहीं भूलती
प्यार दो तो प्यार मिलता है
अपने कभी पराये नहीं होते '
के भ्रम में जीती हो
पागल हो तुम भी !

39 टिप्‍पणियां:

  1. प्यार दो तो प्यार मिलता है
    अपने कभी पराये नहीं होते '
    के भ्रम में जीती हो
    पागल हो तुम भी !
    --
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

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  2. अपने दिए में तेल भले ही कम हो जाएँ, परवाह नहीं ... मगर दूसरों को रौशनी देने को "पागल" ही कहा जाता है... बहुत अच्छी पेशकश... |

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  3. रश्मि जी बहुत खूब। शुभकामनायें

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  4. वैसे तो सब आपने ही होते हैं, जब तक कि भ्रम का कुहरा न छंट जाए।

    बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

    काव्य के हेतु (कारण अथवा साधन), परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

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  5. बहुत ही सुंदर पंक्तियां है रश्मि जी ...बहुत खूब

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  6. अपने कभी पराये नहीं होते '
    के भ्रम में जीती हो
    पागल हो तुम भी !

    आज की स्थिति के अनुसार यह सोचने वालों को लोंग पागल ही समझते हैं ....

    विचारणीय बात कही है ...

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  7. प्यार दो तो प्यार मिलता है
    अपने कभी पराये नहीं होते '
    वैसे सच तो यही है ना.

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  8. कवी लोग मोस्टली पागल क्यों होते हैं ? :):):)

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  9. यही पागल लोग दुनिया सम्हाले हैं।

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  10. bahut hi umdaah rachna..
    yun hi likhte rahein...
    ----------------------------------
    मेरे ब्लॉग पर इस मौसम में भी पतझड़ ..
    जरूर आएँ..

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  11. सुन्दर रचना.सुन्दर भाव.क्या ये कवयित्री के अपने अनुभव है या संसार और समाज के अनुभव? यदि ये संसार और समाज के अनुभवों का चित्रण है तो रचनाकार से इन्हें अलग कर सकती हैं?
    'प्यार दो तो प्यार मिलता है
    अपने कभी पराये नहीं होते '
    के भ्रम में जीती हो
    पागल हो तुम भी !'
    ये पागलपन है तो भी कितना खूबसूरत पागलपन है मैं तो इसी के साथ जीती हूं और इसी के साथ आपकी इस दुनिया से जाना चाहती हूं.
    क्यों सोचे हम? अँधेरे ताखों मे दिया हर कोई नही रखता,न ऐसी बुद्धि, विवेक ईश्वर हर किसी को देता है.
    अपने बहुत लाडलों को सौंपता है ये जिम्मेदारी.
    'तेल' कभी कम ना हो.
    क्या पाया क्यों सोचे?
    जितना दे सकते हैं,दें.
    आत्म-संतुष्टि-सी सम्पदा इसी से मिलती है मेरीप्यारी दोस्त.
    तुम्हारे सम्वेदनशील मन को शक्ति और कलम की उम्र दीर्घ हो,शतायु हो.
    बहुत अच्छी लगी ये कविता एक तारतम्य बिठा गई मेरे मन विचारों से यह.

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  12. "प्यार दो तो प्यार मिलता है
    अपने कभी पराये नहीं होते '
    के भ्रम में जीती हो
    पागल हो तुम भी!"
    kavi pagal hote hai kyonki samaj aur sanskriti ke saranrakshk jo hote hain.Rishton ki lau ko lambe samay tak jalaye,bachaye rakhane ki kshamta aur chahat aik sachche kavi mein hi hota hai.Behad samvedna bhari rachna.

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  13. भ्रम है तो है ....
    पागलों की दुनिया सलामत रहे ..!

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  14. प्यार दो तो प्यार मिलता है
    अपने कभी पराये नहीं होते '
    के भ्रम में जीती हो
    पागल हो तुम भी !

    sundar prastuti di'

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  15. apne kabhi paraye nahi hote........sach me ye bhram pagalpan hi hai, aaj ke drishtant me...:(
    lekin fir bhi ye pagalpan jayaj hai!!!:)

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  16. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    समझ का फेर, राजभाषा हिन्दी पर संगीता स्वरूप की लघुकथा, पधारें

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  17. रश्मी जी आज कल आप कम शब्दो का उपयोग करती है... लेकिन प्रभाव उतना ही... सुन्दर पागल्पन...

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  18. प्यार दो तो प्यार मिलता है
    अपने कभी पराये नहीं होते '
    के भ्रम में जीती हो
    पागल हो तुम भी !

    एक नारी इसी भ्रम मे तो सारी ज़िन्दगी गुजार जाती है मगर कभी नही जान पाती है कि जब जाती है तो खाली हाथ जाती है……………बेहतरीन अभिव्यक्ति। सच पागल ही तो होती है।

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  19. कभी कभी इस भ्रम में रहना अच्छा लगता है ..... खुद को छले जाना अच्छा लगता है ... सच में पागल जो है मन ....

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  20. वाह रश्मि जी, बहुत ही बेहतरीन!

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  21. प्यार दो तो प्यार मिलता है
    अपने कभी पराये नहीं होते '
    के भ्रम में जीती हो
    पागल हो तुम भी !

    pyar do to pyar mile ye laazimi nahin na ye zaruri ki apne paraaye na bane...par ye bhrum na paale to koi jiye kaise?
    bahut gahri abhivyakti, badhai.

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  22. बहुत दिनों बाद फुर्सत से आपकी सारी रचनाएँ पढ़ी । आपकी अभिव्यक्ति का अंदाज़ बहुत अलग और प्रशंसनीय है । शुभकामनायें ।

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  23. ये पागल पण इश्वर हर किसी को नहीं देता...सिर्फ जिस से उसे प्रेम है उसे ही देता है...

    नीरज

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  24. अपने कभी पराये नहीं होते '
    के भ्रम में जीती हो
    पागल हो तुम भी !
    ..... बेहतरीन अभिव्यक्ति

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  25. प्यार दो तो प्यार मिलता है
    अपने कभी पराये नहीं होते '
    के भ्रम में जीती हो
    पागल हो तुम भी !--------------------------सच कहा है आपने --यही तो जीवन है।

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  26. दूसरों के लिये जीने का पागलपन ही तो जीवन है---बहुत सशक्त रचना।

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  27. हम भी उसी दुनिया के बाशिंदे हैं, सुन्दर है ऐसा पागलपन ....

    दी, प्रणाम के साथ शुभकामनाएं...

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  28. प्यार दो तो प्यार मिलता है
    अपने कभी पराये नहीं होते '
    के भ्रम में जीती हो
    पागल हो तुम भी !bahut sundar likha aur sahi bhi hai ,
    bhram rakhna padta hai nahi to jeena kathin ho jaayega .aur tyaag ki bhana bhi lupt ho jaayegi .

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  29. स्वगत के शिल्प से कुछ भिन्न यह सुन्दर कविता है ।

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  30. ह्रदय में मृदु-रस पोर गयी ...आपकी भावभीनी रचना ...
    आभार....

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