06 अक्तूबर, 2013

समय और ईश्वर के आगे खुद को मुक्त कर दो





सन्देश तो बहुत मिले होंगे 
कुछ पोस्टकार्ड 
कुछ अंतर्देशीय 
कुछ लिफाफे 
कुछ मेल 
…………. पर 
आँखों की खामोश पुतलियों पर लिखे सन्देश 
मिले तुमको ?
किसी और ने गर पढ़ा भी 
तो क्या हुआ 
सन्देश के हर्फ़ तुम्हारे लिए थे 
तुम जानते हो - है न ? 

होठ सी लेने से 
अनभिज्ञता दिखाने से 
तुम मानते हो 
कि उसे मान लिया गया ?
नहीं  …. 
तुम्हारे चेहरे पर जाने कितने सन्देश हैं 
जिसे तुम्हारे अपने पढ़ते हैं 
अपने - जिनसे तुम्हारा रक्त सम्बन्ध है !
वे पढ़ते ही नहीं 
चुनते जाते हैं उन संदेशों को 
संभालकर रखने के लिए 
पर एक बार तुम्हें कहना होगा 
अपने होठों की सीलन खोलकर 
नाहक इधर-उधर भटकते क़दमों को रोककर !!!
…। 
यह समय का मौका है 
ईश्वर का करिश्मा है 
कि तुम्हारी बेचैनी एकत्रित हो गई है 
चुप्पी में जिस व्यक्तित्व को तुमने अनदेखा किया 
उसे बताने का वक़्त आ गया है 
एक विश्वास रखो -
क्षणांश को क्रोधित होकर भी 
प्यार की ताकत सबकुछ समेट लेती है 
परिस्थितिजन्य गलतियों पर 
स्नेहिल स्पर्श से क्षमा की अनुभूति देती है 
वे अपने - जो दूर नज़र आने लगे थे 
यक़ीनन उनका विश्वास - 
तुम्हें हँसने का 
बिलखकर रोने का 
कुछ भी कहने-सुनने का 
इत्मीनान भरा साहस देगी 
एक दूसरे की आँखों में उभरे संदेशों को 
बताने का मौका देगी  … 
बस-
समय और ईश्वर के आगे खुद को मुक्त कर दो 

29 टिप्‍पणियां:

  1. बस-
    समय और ईश्वर के आगे खुद को मुक्त कर दो ........इसी में सुकून है...शांति है|

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - सोमवार - 07/10/2013 को
    अब देश में न आना तुम गाधी
    - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः31
    पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


    उत्तर देंहटाएं
  3. बस-
    समय और ईश्वर के आगे खुद को मुक्त कर दो ...
    सारगर्भित रचना दी ....!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. बस-
    समय और ईश्वर के आगे खुद को मुक्त कर दो ...
    सारगर्भित रचना दी ....!!

    उत्तर देंहटाएं
  5. यूँ ही तो जीवन आगे बढ़ता है......

    बहुत कोमल भाव..

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (07-10-2013) नवरात्र गुज़ारिश : चर्चामंच 1391 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का उपयोग किसी पत्रिका में किया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  7. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (07-10-2013) नवरात्र गुज़ारिश : चर्चामंच 1391 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का उपयोग किसी पत्रिका में किया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  8. समय और ईश्वर के आगे
    मुक्त करना अपने आपको
    अगर इतना ही आसान होता
    ये संसार ही पूरा ईश्वर का
    ईश्वरमय क्या तब नहीं होता !

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  9. पढने वाले पढ़ ही लेते हैं बिन पढ़े भी !
    सन्देश प्रभावी है !

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  10. कोशिश कामयाब हो नहीं पाता
    नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें

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  11. होठ सी लेने से
    अनभिज्ञता दिखाने से
    तुम मानते हो
    कि उसे मान लिया गया ?
    नहीं …. बहुत सच ....
    गहरी भावानुभूति ...

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  12. भ्रम का मायाजाल है ये दुनियाँ इसे जीने के लिए काला आणी चाहिए

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  13. बहुत सुन्दर. सारगर्भित रचना ...आभार रश्मि जी

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  14. इश्वर के आगे खुदको मुक्त कर देना ही भक्ति है।

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  15. सारगर्भित ,अनुभूति आधारित सुन्दर रचना |
    latest post: कुछ एह्सासें !
    नई पोस्ट साधू या शैतान

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  16. समय और ईश्वर के आगे खुद को मुक्त कर दो ...बहुत सुंदर व सार्थक रचना है दी..

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  17. बहुत सुंदर सारगर्भित प्रस्तुति.!
    नवरात्रि की बहुत बहुत शुभकामनायें-

    RECENT POST : पाँच दोहे,

    उत्तर देंहटाएं
  18. बहुत सुंदर सारगर्भित प्रस्तुति.!
    नवरात्रि की बहुत बहुत शुभकामनायें-

    RECENT POST : पाँच दोहे,

    उत्तर देंहटाएं
  19. सही कहा तिनके की तरह लहरों के साथ बहने के लिए |

    उत्तर देंहटाएं
  20. क्षणांश को क्रोधित होकर भी
    प्यार की ताकत सबकुछ समेट लेती है
    परिस्थितिजन्य गलतियों पर
    स्नेहिल स्पर्श से क्षमा की अनुभूति देती है
    अक्षरश: कितना कुछ समेटे हुये हैं यह पंक्तियां

    ......

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  21. अंतिम मुक्ति तो शायद इसी को कहते हैं ... उस को सौंप के खुद मुक्त हो जाना ...

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  22. आगत विगत का भार वर्तमान डुबो देता है, सब ईश्वर के सहारे छोड़ देने में सार्थकता है। बस कर्मनिरत रहना ही एक मार्ग है।

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  23. मुक्त होना ही तो नहीं जानता इंसान .... इसीलिए मोह जाल में फंसा रहता है । सार्थक संदेश देती गहन रचना

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