17 अक्तूबर, 2013

खोलो अपनी पिटारी



अपनी ख़ामोशी 
जो मैंने नहीं गढ़ी 
फिर भी 
वक़्त की माँग पर 
जिसे मैंने स्वीकार किया 
वहाँ मोह की आकृतियाँ 
मेरे कुछ कहने की प्रतीक्षा में बैठी होती हैं 
…. !
मैं तो बातों की पिटारी रही हूँ 
जब पिटारी में कुछ नहीं होता 
तो भी मनगढंत बातें सुनाती हूँ 
पता है मुझे -  
खालीपन कभी मुस्कुराता नहीं 
और मैंने हमेशा चाहा है 
कि शून्य में खिलखिलाहट भर जाए 
ताकि तुम्हारे एकांत में 
यादें मेरी बातों की 
तुम्हें गुदगुदा जाए 
तुम्हारा चेहरा खिल जाये 
और खालीपन भी आश्चर्य में पड़ जाये !!
…… 
गीत,कहानी,नकल,साहस, ……। 
जाने कितनी सारी बातें हैं 
फिर भी सन्नाटा !!!
एकटक देखती आँखों का इंतज़ार 
मैं समझती हूँ 
तभी तो आज  …………… 
दुलारती हूँ उन चेहरों को 
और कहती हूँ -
तुम भी तो कुछ कहो !
खोलो अपनी पिटारी 
कुछ नहीं तो वो जादू दिखाओ 
जो मैंने तुम्हें दिखाया,सिखाया 
गढ़ो कोई कहानी 
या कोई छोटी सी बात 
और खिलखिलाते जाओ मेरे संग 
तब तक 
जब तक 
झूठमुठ के खींचे गए सन्नाटे शर्मा न जाएँ 
डर कर भाग न जाएँ 
………………… 
पता है न 
पलक झपकते सारे दृश्य बदल जाते हैं 
इंतज़ार के सारे मौके ख़त्म हो जाते हैं 
और तब 
सन्नाटा बहुत भयानक होता है 
शून्य में कही अपनी बातें 
ख़ुद तक लौट आती हैं 
और  ……… !!!!!!!!
तो कहो कुछ तुम 
मैं तो पिटारी लिए खड़ी ही हूँ :)

35 टिप्‍पणियां:

  1. सही है..वक्त रहते कुछ कह लें कुछ सुन लें..समय का कोई भरोसा नहीं...प्रभावशाली रचना

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  2. बहुत सुंदर सीख देती आपकी अभिव्यक्ति !!
    सन्नाटा बहुत भयानक होता है
    शून्य में कही अपनी बातें
    ख़ुद तक लौट आती हैं
    बिलकुल सही बात

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  3. बोलना बुलाना, मिलना मिलाना ... कुछ यादों को संजोना ... शायद ऐसे समय के लिए बहुत जरूरी होता है ...

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  4. हमेशा की तरह बेहद प्रभावशाली रचना , सही मैने मे अंतर्द्वंद को उजागर करती खिलखिलाती सी रचना बधाई रश्मि जी

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  5. पता है न
    पलक झपकते सारे दृश्य बदल जाते हैं
    इंतज़ार के सारे मौके ख़त्म हो जाते हैं
    यही सच है |
    latest post महिषासुर बध (भाग २ )

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  6. डायरेक्ट दिल से ... बहुत प्रभावशाली

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  7. सन्नाटों की अपनी भाषा होती है ..

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  8. और तब
    सन्नाटा बहुत भयानक होता है
    शून्य में कही अपनी बातें
    ख़ुद तक लौट आती हैं ………… और उनका शोर कानों को नहीं मन को भेदता है इसलिये वो वक्त आने से पहले कह दो कुछ जो सहेजा जा सके…………बहुत सुन्दर रचना दी

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  9. तो कहो कुछ तुम
    मैं तो पिटारी लिए खड़ी ही हूँ .
    .....
    तुम कर्तव्‍य के घाट पर से
    जब भी निकलती हो
    साहस की नाव लेकर
    लहरें आपस में बात करती हैं
    नदिया का जल
    तुम्‍हारी हथेली की अंजुरी में समा
    स्‍वयं का अभिषेक करने को
    हो जाता है आतुर
    किनारे तुम्‍हारे आने की बाट जोहने लगते हैं !!
    आपके इस ज़ज्‍बे को सादर नमन ....

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  10. मैं तो बातों की पिटारी रही हूँ
    जब पिटारी में कुछ नहीं होता
    तो भी मनगढंत बातें सुनाती हूँ
    पता है मुझे -
    खालीपन कभी मुस्कुराता नहीं
    और मैंने हमेशा चाहा है
    कि शून्य में खिलखिलाहट भर जाए
    ताकि तुम्हारे एकांत में
    यादें मेरी बातों की
    तुम्हें गुदगुदा जाए
    तुम्हारा चेहरा खिल जाये
    और खालीपन भी आश्चर्य में पड़ जाये !!

    बेमिसाल..

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  11. पता है न
    पलक झपकते सारे दृश्य बदल जाते हैं
    इंतज़ार के सारे मौके ख़त्म हो जाते हैं
    और तब
    सन्नाटा बहुत भयानक होता है
    शून्य में कही अपनी बातें
    ख़ुद तक लौट आती हैं
    बहुत सुन्दर .
    नई पोस्ट : लुंगगोम : रहस्यमयी तिब्बती साधना

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  12. आपकी लिखी रचना मुझे बहुत अच्छी लगी .........
    शनिवार 19/10/2013 को
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    में आपकी प्रतीक्षा करूँगी.... आइएगा न....
    धन्यवाद!

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  13. सच दी !!
    खिला चेहरा देख खालीपन भी हैरान हो जाय कि आखिर क्या गुदगुदा गया इसे !!
    बहुत बहुत सुन्दर रचना...

    सादर
    अनु

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  14. सन्नाटा एक संकेत है, कुछ बड़ा होने को है, पलक झपकने के बाद।

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  15. सशक्त भाव..... अपने आप से साक्षात्कार करवाते से .....

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  16. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (18-10-2013) "मैं तो यूँ ही बुनता हूँ (चर्चा मंचःअंक-1402) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  17. वाकई जब खामोशी के पलों में सन्नाटों की दीवारों पर कुछ मनभावन बातों और यादों के खुशनुमां चित्र मन बहलाने को मिल जाते हैं तो सब कुछ बहुत सुहाना सा लगने लगता है ! इसलिए इन चित्रों को उकेरने और सहेजने से कतराना नहीं चाहिये ! बहुत सुंदर रचना रश्मिप्रभा जी ! बधाई !

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  18. .....कुछ तुम बोलो, कुछ मैं बोलूं और बढ़ता ही रहे पिटारे का दायरा.

    उम्मीद है पिटारा से जितना निकलेगा उतना ही भरता जाएगा. अति सुन्दर.

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  19. पिटारी बड़े काम की होती है !
    बहुत सुंदर !

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  20. मैंने लिखा था कि बन्‍द पिटारी खोली तो----। अच्‍छी रचना है, सभी की पिटारी में कुछ न कुछ है।

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  21. यूँ ही बैठे बिठाये बन गई कुछ बातें …पिटारी तो आपकी गज़ब है ही !

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  22. खालीपन कभी मुस्कुराता नहीं .....gahan bhaw rashmi jee .......

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  23. बहुत सुन्दर रचना,तन मन कुछ दिनों से अस्वस्थ था पर इस रचना ने प्रेरणा दी !चित्र तो देखकर ही मुस्कराहट खिल गई चेहरे पर, आभार :)

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  24. बहुत ही उम्दा...... शब्द तो आपके हाथ में आते है संवर जाते हैं |

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  25. बेहद प्रभावशाली रचना , आभार..

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  26. दीदी,
    आपकी कविताओं पर चट से रेडीमेड कमेन्ट करना बहुत मुश्किल होता है.. कविता को पढने और फिर उसे गुनने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है.. बहुत ही दार्शनिक अन्दाज़ में लिखी कविता!!

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  27. सबके मन की सोच को लिखने में आप माहिर है दीदी ...बहुत खूब

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  28. पता है न
    पलक झपकते सारे दृश्य बदल जाते हैं
    इंतज़ार के सारे मौके ख़त्म हो जाते हैं
    और तब
    सन्नाटा बहुत भयानक होता है
    शून्य में कही अपनी बातें
    ख़ुद तक लौट आती हैं
    और -------

    जीवन का सच है,जब तक कोई रहता है बातें नहीं हो पाती
    पर जब मौन सन्नाटा छाने लगता है तो लगता है ढेर सारी
    बातें हों,लेकिन सन्नाटा जब स्थिर हो जाता है तो हम शून्य में
    समा जाते हैं------
    रह जाता है बातों का अधूरापन

    मार्मिक और भावुकता से लिखी गहन अनुभूति

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  29. आज कल तो मेरी पिटारी ही खो गयी है ...कैसे खोलूँ मुंह उसका :):) भावों से ओत - प्रोत रचना

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  30. सही है आपकी लेखनी को प्रणाम कितनी आसानी से और सरल शब्दों में आप दिल को छू लेती हैं हमेशा माँ की तरह :) सही है यह ज़िंदगी जितनी बड़ी और लंबी नज़र आती है, उतनी है नहीं। इसलिए ख़ामोशी से बेहतर है कुछ कहते सुनते रहना क्या पता यह बाते यह मुलाकातें कल हो ना...और रह जाये केवल शून्य और एक कभी न ख़त्म होने वाला मौन...

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  31. अच्छी प्रस्तुति...दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनाएं...
    नयी पोस्ट@जब भी जली है बहू जली है

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