21 जनवरी, 2014

बचपन की तरह





कुछ गीली मिट्टी ले आई थी मैं बचपन के खेल से 
सोचा था - 
जब जब हम इकट्ठे होंगे 
खेलेंगे उससे 
मिटटी सने हाथों को देख 
मासूम हँसी हँस लेंगे 
पर, 
मिट्टी -
जाने किस दिन 
जाने कैसे
सूख गई 
गीला करने को बहुत पानी मिलाया 
आँसू भी मिलाए 
पर मिट्टी !
गीली क्या, हल्की भी नहीं हुई 
…… 
शायद इसीलिए हम एक चेहरे पर 
दूसरा चेहरा लिए घूमते हैं 
हँसने के नाम पर 
होठ फैला देते हैं 
…! तुम्हें मैं बनावटी दिखती हूँ 
मुझे तुम !!!
बहस कैसी ?
साबित क्या करना है अब ?

बस एक बात बताना 
तुमने थोड़ी मिट्टी नहीं उठाई थी 
???
अगर उठाया हो तो अगली बार ले आना 
अपनी अपनी मिट्टी मिला देंगे 
शायद  .... शायद  … 
मासूमियत लौट आए हमारे चेहरे में 
और हम एक दूसरे का हाथ थाम 
बेसाख्ता हँसते जाएँ - बचपन की तरह 

29 टिप्‍पणियां:

  1. कोई तो लौटा दे ...मेरा बचपन ....
    होंठो की मुस्कान में ढल के
    ग़म आया है , भेस बदल के ...

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  2. जीवन सफ़र के अनुभव की तेज धूप सूखा कर देती हैं रिश्तों की नमी !

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  3. तुम्हें मैं बनावटी दिखती हूँ
    मुझे तुम !!!
    बहस कैसी ?
    साबित क्या करना है अब ?

    Sach Kaha Apne ..... Sara Aadambaer to samjh aa hi raha hai ..... Bhetreen rachna

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  4. जीवन की इस अंधी दौड़ में हमारे बचपन की मासूमियत न जाने कहाँ कब ख़त्म
    हो गयी पता ही न चला ! हर बात में औपचारिकता ने घेर लिया है ! हमारा हंसना, बोलना यहाँ तक की जीने में भी बनावटीपन झलकने लगा है , इसके कारण हजारों हो सकते है बचपन की इस मासूमियत वही बचा पाता है जिसका व्यक्तित्व सरल है जिंदादिल है, शायद बहुत कम ऐसे लोग हो , आपकी रचना मन को छू गयी क्योंकि मै जानती हूँ उस मिटटी को जिसका जिक्र आप कर रही है,!

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  5. aaj kahan rishton me nami bachi hai kitna hi koshish kar lo jo mitti sookh chuki hoti hain wo phir nam nahi hua karti

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  6. अब न वो बचपन न वो मिट्टी..सब कुछ बदल गया....

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  7. आपकी इस प्रस्तुति को आज की सीमान्त गांधी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  8. भोले बचपन में लौटने के लिए ... भोला होना जरूरी है ... उस मिटती से प्यार होना जरूरी है ... भावपूर्ण ...

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  9. वो गीली मिट्टी और घरोंदे और बचपन :)
    कोई लौटा दे !!

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  10. गीली मिट्टी
    अच्छा हुआ
    वहीं रह गई
    बचपन के साथ
    पानी की कमी
    वैसे भी होने लगी
    पचपन तक
    पहुँचने की पता
    चल चुकी है
    लगता है
    उसे ये बात
    मिट्टी खुद होने
    के लिये जब
    बढ़ रहा हो शरीर
    तब कहाँ किसी को
    महसूस होता है
    सुखा लेना है या
    कुछ नमी भी
    ले जाना जरूरी
    होता है यहाँ से
    निकलते समय
    अपने साथ ।

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  11. काश मिट्टी पुनः पहले सी नम हो जाये।

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  12. बचपन भावनाओं में होता है । बचपन को जीने के लिये बच्चों जैसी भावनाएं होनी चाहिये । अच्छी कविता ।

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  13. सुखद ऐहसास।

    मिट्टी है तो मिट्टी होगी।

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  14. कागज़ की कश्ती जो आनंद देती थी...वो अब फोक्सवैगन में खोज रहे हैं सब...खिलौनों के दाम अब बच्चों को तो नहीं उनके अभिभावकों को ज्यादा संतोष देते हैं...बच्चे तो उसके गत्ते में ही ख़ुशी खोज लेते हैं...

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  15. ले आई हूँ मिट्टी
    खुलकर हँसे ज़माना गुजर गया
    आइये मिला कर खिलखिलाए

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  16. धत्त तेरे की
    इतना आसान है
    खिलखिलाना
    ________ है न हाइकु

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  17. बचपन की मिट्टी और मिट्टी के खिलौने.. वो हामिद का चिमटा, वो सोमारी मेले में मिलने वाला कुल्हिया-चुकिया... अपनी मिट्टी से उखड़कर हम कहीं से कहीं रोप दिए गये हैं... बचपन तो अब अपने बूढे माता-पिता की प्रतीक्षारत आँखों में ही दिखता है.. अपना भी और उनका भी!!
    दीदी, मन को झकझोर गई यह कविता!!

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  18. पूरी जिंदगी न जाने क्या साबित करने में लगा देते हैं हम :(

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  19. जीवन की भाग दौड़ में कितनी दूर हो गए हैं हम बचपन की मासूमियत से...बहुत भावपूर्ण रचना...

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  20. मिट्टी से जुड़ा हमारा अस्तित्व बचपन में बहुत करीब होता है उसके |

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  21. सच है ... वो बचपन का भोलापन और चंचलता मिल जायेगी जो अपनी-अपनी मिटटी साँझा कर ली हमने
    दर्द जाता ही नहीं बचपन से बिछड़ने का

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  22. काश वो मासूमियत हमेशा बनी रहती तो ये दिखावटी दुनिया आज अपनी सी लगती

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  23. न जाने क्यूँ ह्रदय तड़प कर रह जाता है इन भावनाओं में डूबकर..

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  24. मिट्टी से जुड़े हम और हमारी सोच कई बार कितने गहरे उतरती है
    जहां सब कुछ होते हुये भी एक भीगा पन होता है जितना भीतर उतरोगे
    उतनी ही नमी नज़र आएगी
    भाव मय करती यह अभिव्‍यक्ति
    सादर

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  25. मिट्टी से जुड़े हम और हमारी सोच कई बार कितने गहरे उतरती है
    जहां सब कुछ होते हुये भी एक भीगा पन होता है जितना भीतर उतरोगे
    उतनी ही नमी नज़र आएगी
    भाव मय करती यह अभिव्‍यक्ति
    सादर

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  26. I loved the first line! Beautiful poem!:)

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