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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

08 मई, 2014

पाप पुण्य से परे



जीवन में सच हो या झूठ
- दोनों की अपनी अपनी कटुता है !

सच को अक्षरशः कहना संभव नहीँ होता
बात सिर्फ साहस की नहीं
दुविधा मर्यादा की होती है  …
फिर झूठ से सच की निर्मम हत्या हो ही जाती है !
सच सिर्फ़ यह नहीं
कि - सात फेरे सात वचन निभाने चाहिए
सच यह है कि इसे निभाने के लिए
झूठ की ऊँगली थामे
98 प्रतिशत लोग झूठे चेहरे लिए
चलते हैं,जीते हैं -
समाज,
परिवार,
बच्चे  .... इन कटु सच्चाईयों के लिए
और यह स्त्री-पुरुष दोनों की विडंबना है  !.
कारण भी पूर्णतः नहीं बता सकते
कभी जिह्वा कटती है
कभी हिम्मत नहीं होती
और कभी कहने की जुर्रत की
तो विरोध की हिकारत
- 'इस तरह खुद को जलील करने की ज़रूरत क्या है ?'
चुप्पी में सच की दर्दनाक स्थिति
हँसी में झूठ की निर्लज्जता
'काहू बिधि चैन नहीं'

हादसों का सच !!!
कौन कह पाता है ?
 खुलासे से तबीयत बिगड़ जाती है
यूँ भी खुलासे में सिर्फ़ अश्लीलता होती है
दर्द मर चुका होता है !
लोग नहीं जानें - इस ख्याल में
शहर बदल जाता है
नाम बदल जाता है
.... पूरा परिवेश बदल जाता है !
अंदर में सच हथौड़े चलाता है
झूठ
पत्थर और जीवन के बीच
भटकता जाता है !
…।
सच और झूठ - दोनों की अपनी मजबूरियाँ हैँ
पाप-पुण्य से परे

19 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद बारीकी से किया गया चिंतन... आपकी पिछली कविता भी याद आ गई ...तोल कर बोलने की... साहस हो तो भी दुविधा मर्यादा की होती है...पढ़ कर टिप्पणी करूँ न करूँ आत्मचिंतन ज़रूर करती हूँ ...

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  2. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति |

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  3. सच और झूठ दोनों की अपनी मजबूरियाँ हैं .... कितना कठोर सत्य है

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  4. सच और झूठ - दोनों की अपनी मजबूरियाँ हैँ
    पाप-पुण्य से परे..................कितना बड़ा सच!!

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  5. मजबूरियों से बँधा रिश्ता और रिश्तों से बँधी मजबूरियाँ... क्या पाप क्या पुण्य.. कर्मण्येवाधिकारस्ते... !!

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  6. सच और झूठ - दोनों की अपनी मजबूरियाँ हैँ.......सच?????

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  7. मर्यादा सच नहीं बोलने देती .... पाप पुण्य से परे जीवन तो जीना ही है .... जहाँ मजबूरी हो तो सच और झूठ भी क्या ... गहन और गंभीर चिंतन .

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (09-05-2014) को "गिरती गरिमा की राजनीति" (चर्चा मंच-1607) पर भी है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  9. जीवन ही दुविधा है..यहाँ कुछ भी द्वंद्व से परे नहीं है..सिवाय उस एक के..

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  10. सच और झूठ - दोनों की अपनी मजबूरियाँ हैँ....बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति |

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  11. जीवन में सच हो या झूठ
    - दोनों की अपनी अपनी कटुता है !
    बिलकुल सही कहा है सच कह नही पाते
    झूठ बर्दाश कर नहीं पाते ! दुविधायुक्त संपूर्ण जीवन ही !

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  12. कभी मर्यादा रोकती है , कभी कर्तव्य और कभी कभी सच झूठ आपस मे स्थान बदल चुके होते हैं !

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  13. सच कहा झूठ बोलते बोलते झूठ, सच सा लगने लगता है और सच को कहने का कोई असर नहीं होता वो झूठ लगता है । मर्यादाएं न हों तो जंगल हो जाएगा सारा शहर । कविता ने बहुत कुछ कद दिया बधाई

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  14. सच और झूठ - दोनों की अपनी मजबूरियाँ हैँ
    पाप-पुण्य से परे


    सही कहा आपने आदरणीया रश्मि प्रभा दीदी

    सुंदर सार्थक कविता ...
    हमेशा की तरह

    साधुवाद और मंगलकामनाएं !

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  15. जिंदगी को आईना दिखती रचना

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  16. गहरी बात कही है आपने

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  17. सच और झूठ - दोनों की अपनी मजबूरियाँ हैँ
    हक़ीकत बयां करती सशक्‍त अभिव्‍यक्ति

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  18. सबके अपने-अपने सच होते हैं...पाप-पुण्य से अलग...

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