12 मई, 2014

आम और खास से परे - सच कहा न ?



मैं आम नहीं
पर उसी समूह में रहती हूँ
दिन और रात को जीने के लिए !
मैं खास भी नहीं
जिसे तुम नाम से पहचान लो …
मैं -
आम और खास से परे एक रहस्य हूँ !
ढाल लिया है मैंने अपने आप को
एक किताब में
जिसके पन्नों से आवाज आती है  …
मैं एक बोलनेवाली किताब हूँ
जिसे तुम चाहोगे पढ़ना
पर वह तुम्हें सुनाई देगा
वह भी, मेरी आवाज में !
तुम पढ़कर सुनाना भी चाहो किसी को
तो तुम्हारी धड़कनों से प्रतिध्वनित होकर
तुम्हारे स्वर में मेरी ही आवाज गूँजेगी  !
मेरे शब्द तुम्हारे अन्तर में समाहित होकर
उसकी बनावट बदल देंगे
तब तक -
जब तक तुम मुझे पढ़ोगे
और सोचोगे
… अतिशयोक्ति नहीं होगी
यदि कहूँ
कि खुद को ढूँढ़ते रह जाओगे !
उदहारण ले लो -
प्रेम !
कहते हैं लोग,
प्रेम फूल और भँवरा है
यह कथन
मात्र एक अल्हड़ उम्र का ख्याल है
उस उम्र से आगे
समय कहता है
प्रेम ईश्वर भी है,राक्षस भी
प्रेम अनश्वर है तो नश्वर भी
चयन तुम्हारा
नियति तुम्हारी
परिणाम अदृश्य  …
विश्वास हो तो भी प्रेम मर जाता है
शक हो तो भी प्रेम जी लेता है
प्रेम वक़्त का मोहताज नहीं
प्रेम अकेला भी सफ़र कर लेता है
कोई प्रेम के बाद भी प्रेम करता है
तार्किक अस्त्र-शस्त्रों से
सही होता है
पूर्ण होता है
दूसरी तरफ
कोई एक प्रेम का स्नान कर अधूरा होता है !
हम क्या चाहते हैं, क्या नहीं चाह्ते
इससे अलग एक पटरी होती है ज़िन्दगी की
जिसके समतल-ढलाव का ज्ञान मौके पर होता है
दुर्घटना - तुम्हारी असफलता हो
ज़रूरी नहीं
अक्सर सफलता के द्वार उसके बाद ही खुलते हैं
.... पर अगर तुमने असफलता को स्वीकार कर लिया
तो मुमकिन है
सफलता तुम्हारे दरवाजे तक आकर
बिना किसी दस्तक के लौट जाये !
आश्चर्य की बात मत करो
हतोत्साहित सिर्फ़ तुम नहीं होते
सफलता भी हतोत्साहित होती है
उसका इंतजार न हो
तो वह अपना रूख मोड़ लेती है !
पाना-खोना
हमारे परोक्ष और अपरोक्ष सत्य पर निर्भर है !
तुम-हम जो सोचते और देखते हैं
वह सच हो - मुमकिन नहीं
.... सच को देखना
सच का होना
दृष्टि,मन, मस्तिष्क की चाक पर
घूमता रहता है
रुई की तरह धुनता जाता है
अंततः जब उसका तेज समक्ष होता है
उसकी तलाश में रहनेवाले गुम हो जाते हैं
या याददाश्त कमजोर हो जाती है
या  … सत्य अर्थहीन हो जाता है !
आँख बंद होते
जिस सच को हम सजहता से कह-सुन के
स्वीकार करते हैं
वहाँ शरीर से पृथक हुई आत्मा
अट्टाहास करती है
फिर सिसकती है
इस अट्टाहास और रुदन में कई अबोले सच होते हैँ
जो दिल की धड़कन रोक कर
शरीर को साथ ले जाते हैं !
मैंने उस अट्टाहास और रुदन के बीच
अपने आप को एक गहरी खाई में देखा है
पहाड़ों से टकराकर आती प्रतिध्वनित सिसकियों में
स्नान किया है
फिर रेत में विलीन शब्द ढूँढे हैँ
एहसासों की चाक पर उन्हें आकृति दी है
… जो पूर्ण नहीं होते
कोई न कोई हिस्सा टेढ़ा रह जाता है
या दरका हुआ
पर शायद जीवन की पूर्णता इसी अपूर्णता में है
क्यूँ ? सच कहा न ?

23 टिप्‍पणियां:

  1. यदि जीवन में अपूर्णता न हो तो पूर्णता की और अग्रसर कैसे होंगे ? सटीक तथ्य ।प्रेम शक में भी जी लेता है और विश्वास में मर भी सकता है कितनी गहन बात है । शायद प्रेम बस मन की भावना है , हो सकता है जिस पर विश्वास करें उससे प्रेम न हो और जिससे प्रेम करें उस पर शक हो । मुझे तो लगता है कि जिससे प्रेम करते हैं उसी पर शक ज्यादा करते हैं और एक वक़्त ऐसा आता है कि प्रेम दम तोड़ देता है ।

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  2. एक ऐसी किताब जिसमें सब आपका जीवन देखते हैं ... अपने जीवन की किताब खोजते हैं ... गहरी रचना ...

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  3. आपकी लिखी रचना मंगलवार 13 मई 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  4. सच कहा एक किताब पेपरबैक एक हार्ड बाउँड और एक फटी बिना जिल्द ।

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  5. हम कितना भी लिख लें , प्रेम , विश्वास , सत्य की कोई एक सार्वभौमिक परिभाषा हो नहीं सकती। ईश्वर ने बनाया ही सबको भिन्नता के साथ है , कभी प्रेम प्रतिदान ना पाकर भी जीत जाता है , कभी सहज होकर भी हारता है।
    आपकी गहन दृष्टि हमेशा हतप्रभ करती है !!

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  6. बहुत गहन चिन्तन..पर सब कुछ कह कर भी सब अनकहा रह जाता है..

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  7. विश्वास हो तो भी प्रेम मर जाता है
    शक हो तो भी प्रेम जी लेता है
    प्रेम वक़्त का मोहताज नहीं
    प्रेम अकेला भी सफ़र कर लेता है
    कोई प्रेम के बाद भी प्रेम करता है

    Kitni rahasymayi hai na prem ki yah duniya jahan kuchh bhi poorn nahin lekin is adhoorepan men bhi kitani kashish hai, santvana hai aur hai sab kuchh paa lene ka bhram jo bhale hi chatka hua ho man use hi jeevanparyant kaleje se chiptaye rakhna chahta hai. gahan evam sashakt rachna ke liye sadhuvad sweekar karen Rashmiprabhaji.

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  8. अंतर्द्वंद कि अनकही अपूर्णता को पुर्ण करने के लिये भटकते शब्द .....

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  9. अपूर्णता में ही पूर्णता समाहित है सच कहा क्योंकि प्रेम की भी अपूर्णता में ही पूर्णता समाहित होती है

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  10. आम और ख़ास, प्रेम - नश्वर अनश्वर, सफलता असफलता.. पूरा जीवन ही द्वन्द्व है... सिक्के के दो पहलू सा. एक समय में एक ही दिखाई देता है.. इसीलिए हर देखने वाला अपने दृष्टिकोण से देखता है और उसे ही सच मानता है!!
    आपके देखने का अन्दाज़ हमेशा से चमत्कृत करता है और उससे भी अधिक उसका विश्लेषण!!

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  11. ब्लॉग बुलेटिन की ८५० वीं बुलेटिन खेल खतम पैसा हजम - 850 वीं ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  12. प्रेम का दायरा है एक … और प्रेम अनंत भी या यूँ कहें कि जीवन हर दृष्टिकोण का स्वागत करता है निर्भर होता है कि व्यक्ति जीवन से क्या चाहता है और उससे भी अधिक क्या चुनता है ...
    आपके विचारों की गहनता तक पूरी तरह पहुँच पाना आसान नहीं पर कोशिश करती रहूँगी
    सादर

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  13. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (13-05-2014) को "मिल-जुलकर हम देश सँवारें" (चर्चा मंच-1611) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  14. अपूर्णता ही प्रेम की पूर्णता है क्यूंकि अपूर्णता में ही प्रेम जीवित है। खो जाये तो सोना है वाली बात।

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  15. एकदम सौ फीसदी सच कहा आपने.. जिसका कायल हम सब हैं..

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  16. गहन ....जीवन सार इसी अपूर्णता भरी पूर्णता को समझना है

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  17. nishabd hun padh kar...sach ek ek baat sochne par majboor kar deti hai....

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  18. एहसासों की चाक पर उन्हें आकृति दी है
    … जो पूर्ण नहीं होते
    कोई न कोई हिस्सा टेढ़ा रह जाता है
    या दरका हुआ
    पर शायद जीवन की पूर्णता इसी अपूर्णता में है
    क्यूँ ? सच कहा न ?
    … सच इसी अपूर्णता के लिये जीव ताउम्र चलता-रहता है
    बहुत सुन्दर गंभीर चिन्तन

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  19. खूबसूरत भावों से भरी रचना...

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  20. पर शायद जीवन की पूर्णता इसी अपूर्णता में है .... ये अंतिम पंक्ति ही नही पूरी रचना अक्षरश: मन में उतरती चली गई, आपका लेखन नि:संदेह हर बार की तरह इस बार भी नि:शब्‍द कर गया ....

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  21. आम और खास का अंतर ही मनुष्य को चलाये रखता है...अपूर्णता से परिपूर्णता की ओर...

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  22. जीवन यात्रा की बड़ी ही सुंदर और गहन अभिव्यक्ति करती रचना।।।

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