03 दिसंबर, 2017

मैं झांसी की रानी




कंपकंपाता अंधेरा
न झींगुरों की आवाज़
न घने पेड़ के पत्ते ही खड़क रहे हैं
....
हाँ मैं झांसी की रानी
बुंदेले हरबोलों के मुख से
जिसकी कहानियाँ कही गई हैं
...
अति कुछ नहीं सुना तुमने
मैं दक्ष घुड़सवार
तलवार मेरी
विद्युत की गति से चमकती थी
मेरा लक्ष्य
दुश्मनों का सर्वनाश था
मैंने किया भी !
युद्ध संचालन
विपरीत परिस्थितियों में हौसला
तीव्र दृष्टि
शेरनी सी दहाड़
नाना की मुँहबोली बहन थी न
उस भाई ने यह सबकुछ
राखी के बदले दिया था
....
लेकिन यह घुप्प अंधेरा
सांय सांय करता सन्नाटा
मुझे सोने नहीं देता
चलने नहीं देता
ठहरो,
इस बच्चे की उंगली थाम लूँ
उसे अपने होने का एहसास देते हुए
खुद को उसके होने का एहसास दे लूँ
... रात कट जाएगी
फिर मैं
सम्पूर्ण सूरज हो जाऊँगी ...

3 टिप्‍पणियां:

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