.jpg)
रोज़ देखा करती हूँ सामने
घर बनाने का काम...
ईंट-गारे,पत्थरों की भरमार
कई रोज़गार मजदूर...
सपने को पूरा करने में ,अपना योगदान
पूरे मनोभाव से दे रहे हैं.......
'अपना घर'
एक सुकून होता है,
बरगद की घनी छांव-सा लगता है,
नई ज़िंदगी का आरंभ लगता है!
नन्हें पैरों के निशाँ,
बुजुर्गों की हिदायतें
आँगन,दीवारों में गुंजायमान होती हैं!
रफ्ता-रफ्ता
रिश्ते बदल जाते हैं,
व्यवस्था बदल जाती है,
मन की इमारत खंडहर में तब्दील हो जाती है!
आंखों की रौशनी कम
आवाज़ धीमी पड़ जाती है ,
बुद्धि बेवकूफी में बदल जाती है........
'घर' एक इत्तेफाक है
या.......सुकून?
या, पूरी ज़िंदगी बेमानी?
या,
एक सिलसिला खंडहर का???????????????