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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

13 December, 2009

प्राण-संचार


तुम्हारे चेहरे की धूप
तुम्हारी आँखों की नमी
तुम्हारी पुकार की शीतलता
मुझमें प्राण- संचार करते गए ........
दुःख के घने बादलों का अँधेरा
मूसलाधार बारिश
सारे रंग बदरंग थे !
पर तुमने अपनी मुठ्ठी में
मेरे लिए सारे रंग समेट रखे थे
मैं रंगविहीन हुई ही नहीं !
लोग राज़ पूछते रहे हरियाली का
विस्मित होते रहे ....
मैं अपने आत्मसुख की कुंजी लिए
तुम्हारे धूप-छाँव में
ज़िन्दगी जीती गई....
कहने को तुम पौधे थे
पर वटवृक्ष की तरह
मुझ पर छाये रहे
मुझमें प्राण-संचार करते गए ...............

52 टिप्पणियाँ:

sangeeta ने कहा…

बहुत छायादार वटवृक्ष .....यूँ ही हरीतिमा रहे ज़िन्दगी में...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!
हृदय पर सीधे असर करती है!

परमजीत बाली ने कहा…

यह रिश्ता होता ही ऐसा है .....समझ मे नही आता कि किस पर कौन सुख और आनंद की बरसात कर रहा है।

बहुत भावपूर्ण रचना है। बहुत गहरे भीतर तक उतर गई। बधाई स्वीकारें।

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति .. आनंद आ गया ....

मनोज कुमार ने कहा…

ज़िन्दगी की ख़ूबसूरती तथा रिश्तों की पाक़ीज़गी का अहसास मन को गहरे भिंगो देता है।

jenny shabnam ने कहा…

रश्मि जी,
बेहद आत्मीय शब्द...
''मैं अपने आत्मसुख की कुंजी लिए
तुम्हारे धूप-छाँव में
ज़िन्दगी जीती गई...''
भाव भीनी रचना केलिए बधाई स्वीकारें!

kishor kumar khorendra ने कहा…

kahane ko tum paudhe the
par vatvriksh ke tarah ..
mujh par chhaaye rahe

kavita prerna daayii lagi
sukomal bhav se paripurn lagi
sundar kavita

kishor

शहरोज़ ने कहा…

दी मेरी प्यारी सी आप येत बताएं इतनी मार्मिक, अर्थवान रचना इतना सहजता पूर्वक कैसे लिख लेती हैं.इर्ष्या होती है.काश!लेकिन खुशी इसलिए होती है की दीदी ने लिखा है!दीदी समय नहीं मिल पाता है वरना आपकी कविताओं से रूबरू तो होता ही रहता हूँ.

Devendra ने कहा…

--सारे रंग बदरंग थे
पर तुमने अपनी मुठ्ठी में
मेरे लिए सारे रंग समेट रखे थे
मैं बदरंग हुई ही नहीं-
..कमाल की अभिव्यक्ति, मेरी बधाई स्वीकार करें...।

Mithilesh dubey ने कहा…

दीदी चरण स्पर्श

बेहद उम्दा रचना ।

VIJAY TIWARI " KISLAY " ने कहा…

तुम्हारे धूप-छाँव में
ज़िन्दगी जीती गई..
भावनात्मक रचना है.
-विजय

वाणी गीत ने कहा…

आपकी कविताओं के जरिये उस वट वृक्ष की असीम शांतिदायक स्नेह और प्रेमभरी छाँव हम तक भी पहुँच रही है ...बहुत आभार ...!!

अजय कुमार ने कहा…

भावपूर्ण और आत्मीय रिश्तों से ऐसा ही सम्बल मिलता है , अच्छी प्रस्तुति

Ravi Rajbhar ने कहा…

Wah-shabd nahi aapki tarif ke liye.

ρяєєтι ने कहा…

आपने अपने लहू से, अपनी भावनाओ के जल से सींचा है इस पौधे को , तभी तो इसकी शाखाये इतनी रंगों भरी और सशक्त है , जो हर धुप और छाव में साथ साथ है ...ILu ..!

महफूज़ अली ने कहा…

मम्मी जी..... खूबसूरत शब्दों के साथ.... बहुत ही उम्दा रचना....

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जीवन में कोई ना कोई चीज़ होती है वटव्रक्ष की तरह ........ हम सब उसकी छायाँ में साँस लेते हैं ........
बहुत ही गहरी अभिव्यक्ति .......

संत शर्मा ने कहा…

सच कहा आपने, बच्चे माता - पिता के लिए उनके जीवन श्रोत ही होते है, उनके चेहरे की ख़ुशी, उनकी सफलता विपरीत परिस्थितयों में भी माता - पिता को आत्मिक सुख दे जाने में समर्थ होते है | एक सकारात्मक, भावनात्मक और बहुत ही उत्कृष्ट रचना |

Murari Pareek ने कहा…

अपने परिजनों की छाँव तले सुन्दर अभिव्यक्ति है !!!

shikha varshney ने कहा…

aakhiri 4 panktiyon ne dil le lia di!

psingh ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा आपने
बहुत-२ आभार

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

... सुन्दर रचना !!!

sakhi with feelings ने कहा…

kya kahu bhaut kuch to ye rachna kha gayee...kai baat kuch bhaut chhota hokar bhi apne baddapan ka ahsaas karata hai vaisi hi lagi iski bhavna

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही प्रेरणादायी रचना ।

संजय भास्कर ने कहा…

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Suman ने कहा…

nice

Avinash Chandra ने कहा…

bahut hi madhur aur prernadayi...bahut achchhi rachna

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत सुंदर भाव समेटे हुए अक अच्छी रचना

sada ने कहा…

बहुत ही भावमय प्रस्‍तुति
लिये हुये बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

-सारे रंग बदरंग थे
पर तुमने अपनी मुठ्ठी में
मेरे लिए सारे रंग समेट रखे थे
मैं बदरंग हुई ही नहीं-

प्रेम के तो रंग ही सारे बदरंग हो गए हैं ......क्या कहूँ.....!?!

Rajiv ने कहा…

Rashmi jee, namaskar.
"Chehre ki dhoop" ne vatsalya ka jo bargadi vistar liya hai,behad khubsurat aur anupranit karne wala hai. Yah aapki mamtamayee soch ka darpan sa prateet hota hai.Aapke blog mein tippani bhejne ki kai bar koshish ki par safal nahi ho paya,isliye scrape ke madhyam se bhej raha hun.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

विलक्षण रचना...हमेशा की तरह कमाल के शब्द और भाव...बहुत बहुत बधाई...
नीरज

शरद कोकास ने कहा…

सुन्दर कविता । बीच में दो जगह गैप दें ।

Prem ने कहा…

कितना सुंदर लिखती हैं आप ,भाव आपके शब्दों की पकड़ में आते ही नया रूप धर लेते हैं ,बहुत बधाई ,ईश्वर करे साहित्य की उच्चाईयां आपके कदम चूमें । शुभकामनायें ।

Rajey Sha ने कहा…

खूबसूरत बयान।

Rajey Sha ने कहा…

खूबसूरत बयान।

KAVITA RAWAT ने कहा…

Didit ji bahut sundar kavitalagi. Bahut gahari hoti hai aapki rachna mein. bahut achha lagata hai ki hindi sahitya ko aap smardh kar rahi hain....

गौतम राजरिशी ने कहा…

आपकी कविताओं का प्लाट हर बार एकदम अपना सा भाव देता है कि जैसे मैं कहना चाहता था ये बात तो।

सुलभ सतरंगी ने कहा…

वटवृक्ष की तरह
मुझ पर छाये रहे
मुझमें प्राण-संचार करते गए ...............

अत्यंत भावपूर्ण आत्मीय पंक्तियाँ कह गए आप. मन को सुकून मिला.

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

मस्तानों का महक़मा ने कहा…

बहुत ही सुंगर भावों से सजी लेखनी.. आपके शब्दों को एक रेशेदार जाल की तरह पेश करता है हमारे बीच.
जिसमें कोई एक जीवन सांस ले रहा होता है।

शुभकामनाऐं ।।।

KAVITA RAWAT ने कहा…

Sundar prastuti ke liye dhanyavaad.

रोहित ने कहा…

maa'm aapko padhna hamesha se sukhad anubav raha hai.......bahut achhi hai aapki ye rachna

hem pandey ने कहा…

पौधे में वटवृक्ष की कल्पना के लिये साधुवाद.

creativekona ने कहा…

बहुत सुन्दर मन को छूने वाली रचना---।
हेमन्त कुमार

लोकेन्द्र ने कहा…

मै रंग विहीन हुई ही नही.....
लोग राज पूछतें रहे हरियाली का
विस्मित होते रहे.....

सुन्दर प्रेम भरे अल्फाजों में लिखी गई ये कविता.....

अल्पना वर्मा ने कहा…

मै रंग विहीन हुई ही नही.....
लोग राज पूछतें रहे हरियाली का
विस्मित होते रहे.....

-अद्भुत!!
- प्रेम भाव लिए बेहतरीन कविता.

ज्योति सिंह ने कहा…

वटवृक्ष की तरह
मुझ पर छाये रहे
मुझमें प्राण-संचार करते गए ...............
bahut hi sundar bhav lahra rahe hai ,aapko nahi dekha kai roj se ,socha aapki rachna agli aai nahi ,do teen dino se doore blog ke sahare aapka blog ka pata le aaj aa gayi ,naam hi rashmi prabha ,is dohri raushni me to jagmayega hi dharti kya aakash bhi .

JHAROKHA ने कहा…

Bahut samvedanatmak kavita.---dil ko chhuu gayee.shubhakamnayen.
Poonam

रंजना ने कहा…

Prem ke paavan nirmal bhavon ko jis prakaar aapne abhivyakti di hai...kya kahun......WAAH !!!

Marmsparshi atisundar rachna....

Apoorv ने कहा…

एक पूरा मौसम जैसे सिमट आया हो आपकी इन पंक्तियों मे..कौन कहता है कि सिर्फ़ तीन मौसम होते है..दिल के इन मौसमों की विविधता का कोई अंत नही....
बहुत बेहतरीन...

NARAD ने कहा…

Manoj sundriyal

Aapki kavita (wajan) me itna wajan hai ki jisne mujhe itna majboor kiya ki mai aapko ek tippani jaroor likhoon, maine use itni baar padha ki yaad karne ki gustaki kar baitha....