About Us



मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

05 May, 2010

समर्पण !


समर्पण .... कैसा?
किसको?
समर्पण का आधार
कभी भी शरीर नहीं होता
शरीर !
तो कोई भी पा लेता है
आत्मा !
- अमर है
समर्पण का स्रोत है
गंगा वहाँ से निकलती है
...
गंगा में नहाना
और गंगा को समझना
- दो अलग बातें हैं ...

गंगा में नहाकर
ना तुम पवित्र होते हो
ना गंगा मैली होती है
... मृत , तुक्ष शरीर को लेकर
तुम्हारी संतुष्टि
क्षणिक है,
वहम है

आत्मा का समर्पण
रेगिस्तान में भी
रिमझिम बारिश का एहसास देता है
जो इस बारिश से अनभिज्ञ रहा
वहाँ कैसा समर्पण?

51 टिप्पणियाँ:

माणिक ने कहा…

AAPAKAA NAYAA TEMPELT DIL LE GAYAA. PAHALE WAALE SE BAHUT JYAADAAA CHHA HAI.

KAVITAA KUCHH GAHAREE HAI
अपनी माटी
माणिकनामा

Asha Pandey Ojha ने कहा…

ganga me nha kar n tum pvitr hote ho n wo melee hotee hai ..wwah kya khoob kahee hai aapne ..in do panktiyon me jeevan mulya sthapit kar diye ..badhai..!

दीपक 'मशाल' ने कहा…

Abhibhoot hoon vichar ki gahraai samajhkar..

Rajni Nayyar Malhotra ने कहा…

sahi likha hai mam shareer ko to koi bhi hasil kar sakta hai,balpurawak ya adhikar se par,aatma ko to bas prem aur samrpan se hi jeeta ja sakta hai........gahre bhav ko rakhte hain aapke sabd sabd ...

Rajni Nayyar Malhotra ने कहा…

sahi likha hai mam shareer ko to koi bhi hasil kar sakta hai,balpurawak ya adhikar se par,aatma ko to bas prem aur samrpan se hi jeeta ja sakta hai........gahre bhav ko rakhte hain aapke sabd sabd ...

रोहित ने कहा…

aah maa'm!
kitni gahri baat avivaykt kiya hai aapne...
aatma,sharir or jevan in sabke baare me mera gyan to uthala hi hai...pr aapki ye kavita bahut kuch sikhla gayi!
aadar-
#ROHIT

M VERMA ने कहा…

शरीर !
तो कोई भी पा लेता है
आत्मा !
-अमर है
समर्पण का स्रोत है
गंगा वहाँ से निकलती है
अत्यंत सादगी से कही लाजवाब बातें
बेहतरीन

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

गंगा को लेकर कितनी गहरी बात की है आपने! ये शब्दों की गहराई जैसे सब कह जाती है . गंगा में नहाना और समझना दो अलग बातें है...सच में ,लेकिन नहाने का वहम ही तो हमें क्षणिक सुख जरूर देता है.. ..

kishor kumar khorendra ने कहा…

bahut achchhi rachna

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है आपने ... ये सच है कि शारीरिक समर्पण तो बस एक बाहरी क्रिया है ... असली समर्पण तो भावनात्मक समर्पण है ... एक मन का दुसरे मन से जुडना है ...

ओम पुरोहित'कागद' ने कहा…

शब्द व्यंजना की बात करेँ तो स्पष्ट है ; समर्पण अत्यन्त पवित्र शब्द है।परस्पर समभाव वाञ्छित है। आत्म का परम्आत्म के प्रति समर्पण सरीखी वांछना।मन और अत्मा कहीँ भी नहाने से निर्मल नहीँ होते।सत्य का योग ही इन्हे निर्मल करता है। इसी लिए आदिकाल से सत्य की खोज जारी है।हमारा अपना सत्य तो दैहिक ही है ना!हर संसारी का अपना सत्य है जिस मेँ दंभ,कपट,ईर्ष्या,छल, प्रपंच,आडम्बर और न जाने क्या क्या अपसंस्कार हैँ।खैर! कविता अच्छी है। बधाई हो!

AlbelaKhatri.com ने कहा…

दैहिक स्तर पर समर्पण है तो क्या समर्पण है
और दैहिक स्तर पर शील है तो क्या शील है

शरीर तो केवल कुछ दिन ही पराक्रम दिखा सकता है

सच्चा पराक्रम तो आत्मिक स्तर पर होता है

हमें यही सिखाया गया है

vandana ने कहा…

आत्मा-अमर है समर्पण का स्त्रोत है,गंगा वहां से निकलती है..
काश सब ये समझ लेते..
बहुत बढ़िया दीदी..!

वन्दना ने कहा…

gazab ke bhav bhar diye hain...........sachcha samarpan to wo hi hai magar itna koi samajh nahi pata sirf tan ke samarpan ko hi yahan samarpan mana jata hai aatma tak to koi pahuch hi nahi pata.

प्रसून दीक्षित 'अंकुर' ने कहा…

आत्मा का समर्पण रेगिस्तान में भी रिमझिम बारिश का एहसास देता है !
*****************************************************
अत्यंत खूब माँ !
बहुत सुन्दर रचना !
धन्यवाद !

Shekhar Kumawat ने कहा…

bahut khub

ganga ki mahima jitni ki jaye kam he

अरुणेश मिश्र ने कहा…

आत्मा को नही छू पाए तो शरीर की छुअन का कोई अर्थ नही ।
रचना गहन प्रेम को अभिव्यक्त करती है ।

मनोज कुमार ने कहा…

जीवन का महत्व तभी है जब वह किसी महान ध्येय के लिये समर्पित हो । यह समर्पण ज्ञान और न्याययुक्त हो ।

राज भाटिय़ा ने कहा…

रशिम जी बहुत ऊंची बात कह दी आप ने आज अपनी इस कविता मै, बहुत खुब, मेरे पास इअतने शव्द ही नही की इस रचना की तारीफ़ भी कर सकूं.बॊने पडते है हमारी तारीफ़ के शव्द भी.
धन्यवाद

अमिताभ मीत ने कहा…

आत्मा
अमर है
समर्पण का स्रोत है
गंगा वहाँ से निकलती है ....

बहुत खूब !!

sangeeta swarup ने कहा…

कितनी सुन्दर भावना है समर्पण की ....रेगिस्तान में भी बारिश का अहसास....बहुत बढ़िया..सच ये शरीर तो तुच्छ है..

arun c roy ने कहा…

prem, rishto ko samajhne ke sahi star ko aapne kitni sahajta se abhivyakt kiya hai... kitni sadharan lekin bhavpoorn, arthpurn panktiya hain...."ganga ko samajhna aur ganga me nahana.. do alag baate hain"... behad samvedansheel kavita...

महफूज़ अली ने कहा…

मम्मी .... आखिरी पंक्तियों ने दिल को छू लिया...

'उदय' ने कहा…

...प्रभावशाली रचना,बधाई!!!

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

कविता का अंतिम खंड सर्वश्रेष्ठ लगा मुझे , समर्पण में
आभ्यंतर की महिमा को रेखांकित करता हुआ ! आभार !

usha rai ने कहा…

गंगा में नहाना और गंगा को समझना दोनों अलग अलग बातें हैं ! भावनाओं की कार्य शाला है आपका ब्लॉग ! बड़ी सार्थक है आपकी खोज ! बधाई स्वीकारें !

चैन सिंह शेखावत ने कहा…

जो इस बारिश से अनभिज्ञ रहा
वहाँ कैसा समर्पण
इस बारिश के बिना समर्पण कोरा ढोंग ही हो सकता है.
सुंदर भावाभिव्यन्जना

Priya ने कहा…

Ye rachna Spritual lagi...ganga ko samajhna aur nahana jaisi baat dil ko bhaai....Practically samarpan ki dikhawa aur vyapaar jaari hain...aisi samajh yada-kada paai jaati hain

सुमन'मीत' ने कहा…

समर्पण
जहाँ मन नहीं होता
विचार नहीं होते
होता है मौन
सिर्फ मौन .............

सुमन'मीत' ने कहा…

रश्मि जी
आपने ब्लोग की नई छवि अच्छी लगी परंतु पहले वाली ज्यादा अच्छी लगती थी आपके एहसास के मन्दिर के दियों से सुकून मिलता था .........

संत शर्मा ने कहा…

आत्मा का समर्पण
रेगिस्तान में भी
रिमझिम बारिश का एहसास देता है
जो इस बारिश से अनभिज्ञ रहा
वहाँ कैसा समर्पण?

Sach ko prabhavi shabd diya hai aapne. Bahut sundar.

jenny shabnam ने कहा…

rashmi ji,
bahut gahri soch, ''gangaa mein nahana aur gangaa ko samajhna, do alag baaten hain'' jiwan ka satya hai aur is satya ko samajhna jitna zaroori hai mahsoos karna bhi utna hin. uttam prastooti, badhaai sweekaren.

Deepak Shukla ने कहा…

Hi..

Agar aatma sang nahi ho,
to wo kahan 'samarpan' hai..
Tan-man aur Aatma ka arpan hi sahi 'Smarpan' hai..

Sahi kahti hain aap.. Tan aur aatma dono ka arpan hi purn samarpan hai..

DEEPAK..

राजेन्द्र मीणा 'नटखट' ने कहा…

कविता ..पूरो पढ़ी भी ना थी ...की मुह से ..वाह निकली ....गज़ब की रचना है ......बहुत गहरा सर्जन है .......कुछ सीखने को भी मिला ....धन्यबाद

वाणी गीत ने कहा…

आत्मा का समर्पण रेगिस्तान में भी बारिश का आनंद देता है ...जो इससे अनभिज्ञ रहा ...वहां कैसा समर्पण ...

उससे कैसा समर्पण ...

निःशब्द ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

समर्पण का चित्रगीत सुन्दर है!

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

Manik jee ke baat se sahmat hoon..:) kavita kuchh jayda gahree hai.........:) mere jaise aam pathak k samajh se thora upar!!.......

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

Manik jee ke baat se sahmat hoon..:) kavita kuchh jayda gahree hai.........:) mere jaise aam pathak k samajh se thora upar!!.......

kunwarji's ने कहा…

समर्पण का आनंद बस समर्पित हो कर ही लिया जा सकता है!बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति आपकी!

कुंवर जी,

अभिलाषा ने कहा…

रश्मि प्रभा जी,
आपकी अभिव्यक्तियाँ लाजवाब हैं. जितनी भी बड़ाई करें काम है. 'सप्तरंगी प्रेम' ब्लॉग पर हम प्रेम की सघन अनुभूतियों को समेटती रचनाओं को प्रस्तुत कर रहे हैं. आपकी रचनाओं का भी हमें इंतजार है. hindi.literature@yahoo.com

ρяєєтι ने कहा…

समर्पण ही पूर्णता देता है, एक गहरी तृप्ति, एक अनकहा एहसास महसूस होता है ...
सही बात है - समर्पण का आनंद बस समर्पित हो कर ही लिया जा सकता है...ILu...!

सुनील गज्जाणी ने कहा…

didi pranam is kavita me aap ka alag hi roop nazar aaya, vakai ek bodh karane wali rachna hai ;; samapran '' ek line prabhav wali hai.sadhwad
saadar

ज्योति सिंह ने कहा…

आपके ब्लॉग का नया रूप काफी प्रभावशाली
है ,रचना का तो जवाब नहीं ,सब कुछ sundar.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

समर्पण ... सच में कहने और समर्पित होने में बहुत फ़र्क होता है ... बहुत गहरी बात लिखी है आपने ...

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) ने कहा…

वाह, समर्पण सिखलाती कविता..
गंगा मे नहाकर,
न तुम पवित्र होते हो
न गंगा मैली होती है...

वाह, बहुत खूब...

निपुण पाण्डेय ने कहा…

आत्मा का समर्पण रेगिस्तान में भी रिमझिम बारिश का एहसास देता है !

बहुत सार्थक बात कही आपने !
समर्पण विचारों में है .....वास्तव में गंगा को समझ पाने वाले कम ही होते हैं ...बाकी तो बस डुबकी भर लगा लेते हैं ...:)

manish badkas ने कहा…

"THY BODY IS A TEMPLE IN WHICH THY GOD RESIDES AS THY SOUL ;
THY MIND IS A PRIEST WHO IS THERE TO SERVE YOUR BODY & SOUL ;
THY
JUST A VIEWER.."
see clearly-without distiguishing one with the other..Are they not but varios forms of the supreme one..???

Jyotsna Pandey ने कहा…

रचना पूर्णतः समर्थ है ये बताने में कि समर्पण आत्मिक होता है, ये संभव हुआ है आपके शब्द कौशल से ....

प्रणाम के साथ शुभकामनाएं.....

कविता रावत ने कहा…

आत्मा का समर्पण
रेगिस्तान में भी
रिमझिम बारिश का एहसास देता है
जो इस बारिश से अनभिज्ञ रहा
वहाँ कैसा समर्पण?
...Aatmik samparpan ko gahre arth aur chitran ke saath gambhirtapurvak aapne paribhasit kiya hai...
Behtreen rachne ke liye bahut dhanyavaad.

Avinash Chandra ने कहा…

saadaa saadaa, aatmik kathya, adbhut shabdon me....ye jaadoo sirf aap kar sakti hain:)

Pranam

Umesh Tarsariya ने कहा…

wah.... right defination of samarpan

really amazing]

" gurukary sarvopari he "