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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

31 May, 2010

तुम कहाँ हो


एक बादल आकर रुका है
कुछ नम सी हवाओं ने छुआ है
तुम कहाँ हो
बूंदें बरसने को हैं
मन सोंधा हो उठा है
चेहरे के इन्द्रधनुषी रंग
आँखों से टपकने लगे हैं
कोई देख ले
उससे पहले आ जाओ

फिर जमके बारिश हो
हवाएँ चलें
बिजली चमके
बादल गरजे
तुम्हारे साथ
मैं धुली धुली पत्तियों सी हो जाऊँ



39 टिप्पणियाँ:

pawan dhiman ने कहा…

चेहरे के इन्द्रधनुषी रंग, आँखों से टपकने लगे हैं
.. bahut khoob.

sangeeta swarup ने कहा…

वाह...बहुत इन्द्रधनुषी सी रचना...

दीपक 'मशाल' ने कहा…

जज्बातों को उड़ेल कर रख दिया गया इस कविता में..

गंगेश राव ने कहा…

बहुत ही सुंदर लिखा है!

मन आज कहीं और उड़ चला है!

इश्वर आपको स्वस्थ रखें और आप ऐसे ही लिखती रहे!

परमजीत सिँह बाली ने कहा…

बहुत भावभीनी रचना है। बहुत सुन्दर!!

ALOK KHARE ने कहा…

gajab di,

khoob indradhanushi rang bikhere hain aapne is kavita me ......

splendid

Suman ने कहा…

nice

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत भावपूर्ण!

Mahfooz Ali ने कहा…

मम्मी जी....बहुत सुंदर कविता...एहसासों से परिपूर्ण..... सच में! जज़्बातों को उंडेल दिया है आपने.....

Shekhar Kumawat ने कहा…

फिर जमके बारिश हो
हवाएँ चलें
बिजली चमके
बादल गरजे
तुम्हारे साथ
मैं धुली धुली पत्तियों सी हो जाऊँ


bahut khub

Shobhna Choudhary ने कहा…

bahut hi sundar poem likhi hai di

Shekhar Suman ने कहा…

bahut hi uttam..
tum kahan ho...

kunwarji's ने कहा…

अच्छा जी.......

कुंवर जी,

वन्दना ने कहा…

prem ras mein bheegi rachna..........bahut hi sundar.

manish badkas ने कहा…

वाह रश्मि जी वाह !!
क्या खूब स्वागत गीत है..
लगता है अबके सावन उमड़-घुमड़ के बरसेगा...........!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

फिर जमके बारिश हो
हवाएँ चलें
बिजली चमके
बादल गरजे
तुम्हारे साथ
मैं धुली धुली पत्तियों सी हो जाऊँ

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ... मन को छुं गई ...

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत प्यारी सतरंगी रचना, धन्यवाद

shikha varshney ने कहा…

फिर जमके बारिश हो
हवाएँ चलें
बिजली चमके
बादल गरजे
तुम्हारे साथ
मैं धुली धुली पत्तियों सी हो जाऊँ
dhuli dhuli si sondhi rachna.

Sonal Rastogi ने कहा…

मैं धुली धुली पत्तियों सी हो जाऊँ
उफ़ कितना निखार और यौवन छा जाता है ... कुछ ताजगी भरी बूंदों की ही तो जरूरत है

Priya ने कहा…

मैं धुली धुली पत्तियों सी हो जाऊँ ....ye line badiya hai

nilesh mathur ने कहा…

तुम्हारे साथ
मैं धुली धुली पत्तियों सी हो जाऊँ

कमाल कि पंक्तियाँ है! बेहतरीन!

richa ने कहा…

अजीब होता है ये मन भी, ख़ुशी हो या ग़म सबसे पहले उसी के साथ बाटना चाहता है जो दिल के बेहद करीब हो... बूंदे यूँ बरसने मत दीजियेगा... दुनिया के लिये ये मोती पानी से ज़्यादा कुछ नहीं होंगे :)

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

'मैं धुली धुली पत्तियों सी हो जाऊँ'
बहुत सुन्दर !!!

M VERMA ने कहा…

तुम्हारे साथ
मैं धुली धुली पत्तियों सी हो जाऊँ
बहुत सुन्दर

वाणी गीत ने कहा…

चेहरे से झलक जाएँ इन्द्रधनुषी रंग इससे पहले आ जाओ ,
कि मैं फिर से धुली पत्तियों सी हो जाऊं ...
किसी के आने का ऐसा इन्तजार ...क्या कहने ...!!

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

main dhuli dhuli pattiyon si ho jaun......:)
kitni pyari aur dil ko chhune wali baat kahi Di....:)

चैन सिंह शेखावत ने कहा…

वाह !
कितनी मधुर अभिलाषा है
'मन सोंधा हो उठा है '
इस पंक्ति के विषय में क्या कहूं
बधाइयाँ.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सदैव की भाँति मखमली रचना!

arun c roy ने कहा…

"मैं धुली धुली पत्तियों सी हो जाऊँ "... bahut sunder bhav.. romance se bharpoor.. adbhud...sahaj aur sadahran shabdon se kitni sunder baat keh jaathi hain aap !

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

किसी छायावादी कवि कि पंक्तियाँ लग रही हैं और आपकी कलम से निकल रही हैं. बहुत सुंदर कहाँ, प्रकृति के साथ मन को जोड़ कर जो कहा तो छू गया.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कुछ नर्म .. गीली महक से भीगी हुई रचना ... बेमिसाल ...

Babli ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना! बढ़िया प्रस्तुती!

Parul ने कहा…

is jhamjham mein tajgi se sarabor nazm :)

शोभना चौरे ने कहा…

rashmiji
aapke shbdo ne bahut hi saoundhi khoshbu bikheri hai is bar .
bahut sundar thandi hva ka jhoka

Pankaj Trivedi ने कहा…

प्रकृति और मानवीय संबंधो की संयुक्त अभिव्यक्ति के सप्तरंग में आपने सबकुछ निचौड़ दिया है जैसे... प्रत्येक रचना बेहतर होती है... इस नाचीज़ के पास अलफ़ाज़ कम है.. आपके लिएँ ... धन्यवाद

अल्पना वर्मा ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत कविता.खास कर अंतिम पंक्ति.
[पहले एक बार आई थी कविता पढ़ी लेकिन आप की पसंद पर क्लीक कर दिया और वापस अब लौट पाई हूँ.]

रचना दीक्षित ने कहा…

'मैं धुली धुली पत्तियों सी हो जाऊँ'
बहुत सुन्दर !!!

बहुत अच्छी लगी ये रचना इस गर्मी में प्री मानसून का जैसा सहारा दे गयी

ज्योति सिंह ने कहा…

bahut hi sundar rachna ,nami liye

jenny shabnam ने कहा…

rashmi ji,
virah kee peeda aur kaamnaaon ki aasha ki bahut sundar prastuti. bahut badhai sweekaren.