25 मई, 2010

लौटो , लौट आओ


कुछ कदम पीछे लौटो
आगे विनाश है
सब ख़त्म होनेवाला है
...
पीछे मुड़ो
किसी हल्की सी बात पर
घंटों हंसो
तनी नसों को आराम दो

लौटो , लौट आओ
दोष किसी और का नहीं
संभवतः
दोष तुम्हारा भी नहीं
दोष ' और ' की चाह
प्रतिस्पर्धा की दौड़ की है
क्या मिलेगा गुम्बद पे जाकर ?

अभी भी वक़्त है
पीछे मुड़ो
बनावटीपन का चोला उतारकर
माँ के हाथों एक निवाला आशीषों का लो
भाई बहनों संग कोई खेल खेलो
जकड़े दिल दिमाग
अकड़े शरीर से निजात पाओ
आओ....

फिर न कहना
'हमें पुकारा नहीं'

39 टिप्‍पणियां:

  1. राम राम जी,

    एक सही पुकार,अभी समय है लौटने........

    कुंवर जी,

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  2. माँ के हाथों एक निवाला आशीषों का लो
    भाई बहनों संग कोई खेल खेलो
    जकड़े दिल दिमाग
    अकड़े शरीर से निजात पाओ
    आओ....

    फिर न कहना
    'हमें पुकारा नहीं'


    आज के तनाव और स्पर्धा से मुक्त होने का कितना आसान जरिया बताया है....सुन्दर अभिव्यक्ति

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  3. लौटो , लौट आओ
    .....क्या मिलेगा गुम्बद पे जाकर ?
    bahut gehri rachna... aaj ke aapadhapi bhare jiwan aur isme bebajah confusion ko ek pankti me aapne disha de di hai...

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  4. लौटने के लिए अपने ही कदम चाहिए
    वे कदम कहाँ जो
    लौट आने कि सोचें
    आसमान छूने कि ललक ने
    दिमाग सुन्न कर दिया.
    टकरा कर हदों से
    खुद बा खुद आयेंगे.

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  5. अभी भी वक़्त है
    पीछे मुड़ो
    बनावटीपन का चोला उतारकर...
    बहुत सुंदर रचना.
    धन्यवाद

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  6. Namaskar Rashmi ji..

    Jeevan ke sangharsh main har ek..
    Daud raha hai andha sa..
    Chah sabhi ki sabse aage..
    Pahunche..
    jo kal sapna tha..

    Ek chah jo puri hoti..
    Dooji aage aati hai..
    Bhagam bhag main jeevan ki sandhya vela aa jati hai..

    Kitna sukun hai uske ghar main..
    Agar ye usne jaana hota..
    Maa ki god aur ghar ke ashray..
    Main hi kahin thikana hota..

    Jo sukun apne ghar main hota hai wo aur kahan milega..

    Sundar kavita..

    DEEPAK..

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  7. अगर अभी वक़्त नहीं निकला तो बहुत देर हो जायेगी
    नीचे कुछ लिनक्स दे रही हूँ जो विषय से मिलते जुलते है
    http://sonal-rastogi.blogspot.com/2010/04/blog-post.html
    http://sonal-rastogi.blogspot.com/2010/03/blog-post_10.html
    http://sonal-rastogi.blogspot.com/2010/03/blog-post.html

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  8. प्रतिस्पर्धा की दौड़ की है
    क्या मिलेगा गुम्बद पे जाकर ?
    लौट आओ इससे पहले कि देर हो जाये ..
    ये चित्र और पंक्तियाँ निरुपमा और उसके जैसी लड़कियों की याद दिला रही हैं ...

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  9. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति, बेहतरीन शब्दों की सजावट ...
    इससे पहले कि बहुत देर हो जाये...लौटना ही होगा !

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  10. बहुत सुकून दिया आपकी इस रचना ने । आपकी इस रचना से आपकी भावुकता भी झलकती है । सही कहा आपने कि हम जिस 'और' को पाने की चाह में भाग रहे हैं, जिसे मंजिल समझ रहे हैं, वो तो एक मृगतृष्णा है..बनावटीपन है.. असलियत और सुकून की जगह तो वही है जो आपने बताई है । वाह । बेहद ही यथार्थ और भावुकता लिये एक अन्‍तर्मन तक उतर जाने वाली रचना सचमें । एक अच्‍छी रचना के लिये आपका आभार ।।

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  11. वाह बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ एक बेहतरीन रचना!

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  12. अभी भी वक़्त है
    पीछे मुड़ो
    बनावटीपन का चोला उतारकर
    माँ के हाथों एक निवाला आशीषों का लो
    सुन्दर आह्वान, पर लौटता कौन है

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  13. अभी भी वक़्त है
    पीछे मुड़ो
    बनावटीपन का चोला उतारकर
    माँ के हाथों एक निवाला आशीषों का लो
    भाई बहनों संग कोई खेल खेलो
    जकड़े दिल दिमाग
    अकड़े शरीर से निजात पाओ
    आओ....

    ये पंक्तिया ख़ास तौर पर पसन्द आई ..... अच्छी रचना ..पढ़कर अच्छा लगा ...

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  14. बेहतरीन रचना ...... सदैव की भाँति
    आपकी कविताओं में भावनाओं का पुट दर्शनीय होता है.
    एक कसी हुई सशक्त रचना
    बधाई.

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  15. माँ के हाथ का निवाला और भाई-बहनों के साथ खेल... कौन लौटना नहीं चाहेंगा ???
    हम तो लौट आये [:)]...ILu...!

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  16. .... बहुत सुन्दर, प्रसंशनीय!!!

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  17. daudna to zaroori hai...baat aage badhne ki nahi baat peeche choot jaane ki bhi nahi...baat to badalti dooniya ke saath kadam milane ki hain....lekin Nivale kha kar relax lena kaun nahi chahega...so vapas aana achcha hai :-)

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  18. गहरा सन्देश देती ये बेहतरीन कविता खूब जंची मम्मी जी..

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  19. atyant saarthak rachna. aur-aur ki chaah mein hum kahaan bhaage jaa rahe, sab bhool rahe, rishte naate apne...sundar rachna. badhai rashmi ji.

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  20. अभी भी वक़्त है....

    सच वक्त की मांग ही यही है..कितने सुन पाते हैं है या फिर सुन के अनसुना कर देते हैं .

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  21. bahut hi sundar sandesh deti shandar rachna......gahre bhav.

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  22. जकड़े दिल दिमाग
    अकड़े शरीर से निजात पाओ
    आओ....
    बस यह जरूरत है समय की...बहुत सुन्दर कविता...

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  23. अभी भी वक़्त है
    पीछे मुड़ो
    बनावटीपन का चोला उतारकर
    माँ के हाथों एक निवाला आशीषों का लो
    भाई बहनों संग कोई खेल खेलो
    जकड़े दिल दिमाग
    अकड़े शरीर से निजात पाओ
    आओ....

    फिर न कहना
    'हमें पुकारा नहीं'

    Aaj ke bhag daud sahi disha dikhati sundar kavita.

    उत्तर देंहटाएं
  24. अभी भी वक़्त है
    पीछे मुड़ो
    बनावटीपन का चोला उतारकर
    माँ के हाथों एक निवाला आशीषों का लो
    भाई बहनों संग कोई खेल खेलो
    जकड़े दिल दिमाग
    अकड़े शरीर से निजात पाओ
    आओ....

    फिर न कहना
    'हमें पुकारा नहीं'
    बहुत हृदय स्पर्शी रचना, आज का सत्य यही है

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  25. सफलता के अर्श पर गर आपके अपने ही साथ ना हों तो क्या आप वाकई में सफल कहलायेंगे... पैसा सुकून नहीं खरीद सकता, नींद नहीं खरीद सकता... अपनों का प्यार नहीं खरीद सकता... वापस लौट ही आओ अब... अपनों की पुकार पर...

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  26. बहुत ज़रूरत है आज ... इस मारा मारी को भूल कर कुछ पल को आराम करो .. रुक कर अपने आपको देखो ... अच्छी रचना है बहुत ...

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  27. क्या शानदार कविता है....

    फिर न कहना
    'हमें पुकारा नहीं'
    .......आपकी इस खूबसूरत कविता पर एक शेर बरबस याद आ गया......
    "नाहक है गिला हमसे, बेजा है शिकायत भी
    हम लौट के आ जाते आवाज़ तो दी होती"

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  28. puykaar..ke bahaane kai cheezon ki taraf dhyaan kheencha hai aapne..wo cheezen jo sukun deti hain ....behad achhi rachna lagi .. :)

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  29. श्रेष्ठ कवि कर्म करती चेतावनी देती कविता !!! आभार !!!

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  30. भाई बहनों संग कोई खेल खेलो
    जकड़े दिल दिमाग
    अकड़े शरीर से निजात पाओ
    आओ....

    ये पंक्तिया ख़ास तौर पर पसन्द आई ..... अच्छी रचना ..पढ़कर अच्छा लगा ...

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  31. पीछे लौट जाना
    पिछड़ेपन की निशानी लगता है
    पर ऐसा है नहीं..
    आगे बढ़ते जाना
    तरक्की की कहानी लगता है
    पर ऐसा है नहीं..
    रुक जाना या ठहर जाना
    दौड़ते रहना या आगे बढ़ जाना एक सा लगता है
    पर ऐसा है नहीं..
    जो रुक गए उन्हें आगे बढ़ना होगा
    जो दौड़ रहे हैं उन्हें ज़रा ठहरना होगा
    कठिन ये सफ़र लगता है
    पर ऐसा है नहीं..

    उत्तर देंहटाएं
  32. लौटो देखो .. यही कहीं से मुड़ गए थे रास्ते..
    किस और भाग रहे खबर नही..
    अनजान राहों पर बेखबर सही..
    पर पुकार रहे सब पीछे देखो..
    नजर पसरे है अपने वो रास्ते

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