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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

25 May, 2010

लौटो , लौट आओ


कुछ कदम पीछे लौटो
आगे विनाश है
सब ख़त्म होनेवाला है
...
पीछे मुड़ो
किसी हल्की सी बात पर
घंटों हंसो
तनी नसों को आराम दो

लौटो , लौट आओ
दोष किसी और का नहीं
संभवतः
दोष तुम्हारा भी नहीं
दोष ' और ' की चाह
प्रतिस्पर्धा की दौड़ की है
क्या मिलेगा गुम्बद पे जाकर ?

अभी भी वक़्त है
पीछे मुड़ो
बनावटीपन का चोला उतारकर
माँ के हाथों एक निवाला आशीषों का लो
भाई बहनों संग कोई खेल खेलो
जकड़े दिल दिमाग
अकड़े शरीर से निजात पाओ
आओ....

फिर न कहना
'हमें पुकारा नहीं'

39 टिप्पणियाँ:

kunwarji's ने कहा…

राम राम जी,

एक सही पुकार,अभी समय है लौटने........

कुंवर जी,

sangeeta swarup ने कहा…

माँ के हाथों एक निवाला आशीषों का लो
भाई बहनों संग कोई खेल खेलो
जकड़े दिल दिमाग
अकड़े शरीर से निजात पाओ
आओ....

फिर न कहना
'हमें पुकारा नहीं'


आज के तनाव और स्पर्धा से मुक्त होने का कितना आसान जरिया बताया है....सुन्दर अभिव्यक्ति

arun c roy ने कहा…

लौटो , लौट आओ
.....क्या मिलेगा गुम्बद पे जाकर ?
bahut gehri rachna... aaj ke aapadhapi bhare jiwan aur isme bebajah confusion ko ek pankti me aapne disha de di hai...

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

लौटने के लिए अपने ही कदम चाहिए
वे कदम कहाँ जो
लौट आने कि सोचें
आसमान छूने कि ललक ने
दिमाग सुन्न कर दिया.
टकरा कर हदों से
खुद बा खुद आयेंगे.

राज भाटिय़ा ने कहा…

अभी भी वक़्त है
पीछे मुड़ो
बनावटीपन का चोला उतारकर...
बहुत सुंदर रचना.
धन्यवाद

Deepak Shukla ने कहा…

Namaskar Rashmi ji..

Jeevan ke sangharsh main har ek..
Daud raha hai andha sa..
Chah sabhi ki sabse aage..
Pahunche..
jo kal sapna tha..

Ek chah jo puri hoti..
Dooji aage aati hai..
Bhagam bhag main jeevan ki sandhya vela aa jati hai..

Kitna sukun hai uske ghar main..
Agar ye usne jaana hota..
Maa ki god aur ghar ke ashray..
Main hi kahin thikana hota..

Jo sukun apne ghar main hota hai wo aur kahan milega..

Sundar kavita..

DEEPAK..

Sonal Rastogi ने कहा…

अगर अभी वक़्त नहीं निकला तो बहुत देर हो जायेगी
नीचे कुछ लिनक्स दे रही हूँ जो विषय से मिलते जुलते है
http://sonal-rastogi.blogspot.com/2010/04/blog-post.html
http://sonal-rastogi.blogspot.com/2010/03/blog-post_10.html
http://sonal-rastogi.blogspot.com/2010/03/blog-post.html

अमिताभ मीत ने कहा…

बहुत बढ़िया !!

Vinay Prajapati 'Nazar' ने कहा…

बेहतरीन अभिव्यक्ति

दिलीप ने कहा…

waah ek saarthak rachna...achchi pukaar hai...

वाणी गीत ने कहा…

प्रतिस्पर्धा की दौड़ की है
क्या मिलेगा गुम्बद पे जाकर ?
लौट आओ इससे पहले कि देर हो जाये ..
ये चित्र और पंक्तियाँ निरुपमा और उसके जैसी लड़कियों की याद दिला रही हैं ...

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति, बेहतरीन शब्दों की सजावट ...
इससे पहले कि बहुत देर हो जाये...लौटना ही होगा !

नरेन्द्र व्यास ने कहा…

बहुत सुकून दिया आपकी इस रचना ने । आपकी इस रचना से आपकी भावुकता भी झलकती है । सही कहा आपने कि हम जिस 'और' को पाने की चाह में भाग रहे हैं, जिसे मंजिल समझ रहे हैं, वो तो एक मृगतृष्णा है..बनावटीपन है.. असलियत और सुकून की जगह तो वही है जो आपने बताई है । वाह । बेहद ही यथार्थ और भावुकता लिये एक अन्‍तर्मन तक उतर जाने वाली रचना सचमें । एक अच्‍छी रचना के लिये आपका आभार ।।

Babli ने कहा…

वाह बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ एक बेहतरीन रचना!

M VERMA ने कहा…

अभी भी वक़्त है
पीछे मुड़ो
बनावटीपन का चोला उतारकर
माँ के हाथों एक निवाला आशीषों का लो
सुन्दर आह्वान, पर लौटता कौन है

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

अभी भी वक़्त है
पीछे मुड़ो
बनावटीपन का चोला उतारकर
माँ के हाथों एक निवाला आशीषों का लो
भाई बहनों संग कोई खेल खेलो
जकड़े दिल दिमाग
अकड़े शरीर से निजात पाओ
आओ....

ये पंक्तिया ख़ास तौर पर पसन्द आई ..... अच्छी रचना ..पढ़कर अच्छा लगा ...

चैन सिंह शेखावत ने कहा…

बेहतरीन रचना ...... सदैव की भाँति
आपकी कविताओं में भावनाओं का पुट दर्शनीय होता है.
एक कसी हुई सशक्त रचना
बधाई.

ρяєєтι ने कहा…

माँ के हाथ का निवाला और भाई-बहनों के साथ खेल... कौन लौटना नहीं चाहेंगा ???
हम तो लौट आये [:)]...ILu...!

'उदय' ने कहा…

.... बहुत सुन्दर, प्रसंशनीय!!!

Priya ने कहा…

daudna to zaroori hai...baat aage badhne ki nahi baat peeche choot jaane ki bhi nahi...baat to badalti dooniya ke saath kadam milane ki hain....lekin Nivale kha kar relax lena kaun nahi chahega...so vapas aana achcha hai :-)

sakhi with feelings ने कहा…

bahut acha likha hai

दीपक 'मशाल' ने कहा…

गहरा सन्देश देती ये बेहतरीन कविता खूब जंची मम्मी जी..

jenny shabnam ने कहा…

atyant saarthak rachna. aur-aur ki chaah mein hum kahaan bhaage jaa rahe, sab bhool rahe, rishte naate apne...sundar rachna. badhai rashmi ji.

अल्पना वर्मा ने कहा…

अभी भी वक़्त है....

सच वक्त की मांग ही यही है..कितने सुन पाते हैं है या फिर सुन के अनसुना कर देते हैं .

वन्दना ने कहा…

bahut hi sundar sandesh deti shandar rachna......gahre bhav.

rashmi ravija ने कहा…

जकड़े दिल दिमाग
अकड़े शरीर से निजात पाओ
आओ....
बस यह जरूरत है समय की...बहुत सुन्दर कविता...

संत शर्मा ने कहा…

अभी भी वक़्त है
पीछे मुड़ो
बनावटीपन का चोला उतारकर
माँ के हाथों एक निवाला आशीषों का लो
भाई बहनों संग कोई खेल खेलो
जकड़े दिल दिमाग
अकड़े शरीर से निजात पाओ
आओ....

फिर न कहना
'हमें पुकारा नहीं'

Aaj ke bhag daud sahi disha dikhati sundar kavita.

Parul ने कहा…

dil ko choo gayi!

Parul ने कहा…

dil ko choo gayi!

रचना दीक्षित ने कहा…

अभी भी वक़्त है
पीछे मुड़ो
बनावटीपन का चोला उतारकर
माँ के हाथों एक निवाला आशीषों का लो
भाई बहनों संग कोई खेल खेलो
जकड़े दिल दिमाग
अकड़े शरीर से निजात पाओ
आओ....

फिर न कहना
'हमें पुकारा नहीं'
बहुत हृदय स्पर्शी रचना, आज का सत्य यही है

richa ने कहा…

सफलता के अर्श पर गर आपके अपने ही साथ ना हों तो क्या आप वाकई में सफल कहलायेंगे... पैसा सुकून नहीं खरीद सकता, नींद नहीं खरीद सकता... अपनों का प्यार नहीं खरीद सकता... वापस लौट ही आओ अब... अपनों की पुकार पर...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत ज़रूरत है आज ... इस मारा मारी को भूल कर कुछ पल को आराम करो .. रुक कर अपने आपको देखो ... अच्छी रचना है बहुत ...

Apanatva ने कहा…

hitaishee lekhan .

ati sunder .

singhsdm ने कहा…

क्या शानदार कविता है....

फिर न कहना
'हमें पुकारा नहीं'
.......आपकी इस खूबसूरत कविता पर एक शेर बरबस याद आ गया......
"नाहक है गिला हमसे, बेजा है शिकायत भी
हम लौट के आ जाते आवाज़ तो दी होती"

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

puykaar..ke bahaane kai cheezon ki taraf dhyaan kheencha hai aapne..wo cheezen jo sukun deti hain ....behad achhi rachna lagi .. :)

usha rai ने कहा…

श्रेष्ठ कवि कर्म करती चेतावनी देती कविता !!! आभार !!!

संजय भास्कर ने कहा…

भाई बहनों संग कोई खेल खेलो
जकड़े दिल दिमाग
अकड़े शरीर से निजात पाओ
आओ....

ये पंक्तिया ख़ास तौर पर पसन्द आई ..... अच्छी रचना ..पढ़कर अच्छा लगा ...

manish badkas ने कहा…

पीछे लौट जाना
पिछड़ेपन की निशानी लगता है
पर ऐसा है नहीं..
आगे बढ़ते जाना
तरक्की की कहानी लगता है
पर ऐसा है नहीं..
रुक जाना या ठहर जाना
दौड़ते रहना या आगे बढ़ जाना एक सा लगता है
पर ऐसा है नहीं..
जो रुक गए उन्हें आगे बढ़ना होगा
जो दौड़ रहे हैं उन्हें ज़रा ठहरना होगा
कठिन ये सफ़र लगता है
पर ऐसा है नहीं..

sujit kumar lucky ने कहा…

लौटो देखो .. यही कहीं से मुड़ गए थे रास्ते..
किस और भाग रहे खबर नही..
अनजान राहों पर बेखबर सही..
पर पुकार रहे सब पीछे देखो..
नजर पसरे है अपने वो रास्ते