03 जून, 2010

अगले जनम .....




गरीबी !
नन्हीं-नन्हीं खुशियाँ
नन्हें-नन्हें ख्वाब..
पैसे के लिए
बेटी को बेचना
सपनों को मिट्टी में मिलाना
बड़े ठाकुर की शतरंज का प्यादा बनाना
पूरी सांसें दूसरों की धरोहर ...!
फिर भी कहना
'अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो'-- क्यूँ?

कितने जन्म?
कितने जनम सज़ाएआफ़्ता ज़िन्दगी के लिए ?
बहुत हुआ खेल
अब तो सबको बेटा ही दीजो प्रभु
बेटी का नामोनिशान ही मिटा दीजो प्रभु
सिक्के के दूसरे पहलू का खेल
दिखा दीजो प्रभु ...

अगले जनम ये सबक सीखा ही दीजो
किसी के घर में बेटी ना दीजो

50 टिप्‍पणियां:

  1. अगले जनम ये सबक सीखा ही दीजो
    किसी के घर में बेटी ना दीजो !

    ****************************

    अकथनीय हूँ माँ !

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  2. मम्मी जी.... बहुत ही मार्मिक कविता....

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  3. Rashmi ji kahin aisa ho gaya to sochiye kya hoga...sthiti sudhar rahi hai...aage aur sudhregi...

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  4. are Rashmijee ye kya mang rahee hai aap prabhu se.......
    ghor anarth ho jaega............
    ye to aapne srushtee ka vinash hee mang liya.............
    kisee bhee kuruti ke aage ghutane nahee tekana chahiye...............
    shiksha jagruti la saktee hai...........
    aise asha ka daman mat chodiye..........

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  5. are Rashmijee ye kya mang rahee hai aap prabhu se.......
    ghor anarth ho jaega............
    ye to aapne srushtee ka vinash hee mang liya.............
    kisee bhee kuruti ke aage ghutane nahee tekana chahiye...............
    shiksha jagruti la saktee hai...........
    aise asha ka daman mat chodiye..........

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  6. आज तो मेरे दिल की बात कह दी आपने ..बेशक कड़वी है पर सच्ची है ...

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  7. समाज की त्रासदी झेलती लड़कियों से द्रवित मन और क्या दुआ मांग सकता है.....हृदयस्पर्शी रचना

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  8. इस कटु यथार्थ पर क्या कहूं।
    बस यही

    बादलों से उलझी हुई चांदनी
    आके सिरहाने गुमसुम खड़ी हो गई।
    बाप के शीश पे उम्र के बोझ सी
    एक नन्हीं सी बेटी बड़ी हो गई।

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  9. अरे इतनी बड़ी बद्दुआ ना दें..!
    उस सीरियल की बकवास में क्यों पड़ती हीं..?
    सीरियल देखना ही है तो झांसी की रानी देखिये.. ..फिर आप कहेंगी भारत को अभी और झांसी की रानी की जरूरत है.

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  10. रश्मि जी , बेचैन कर दिया न आपको भी इन बे-सिरपैर के नाटकों नें, जब इस नाटक का शीर्षक सुना था तब लगा था नारी सशक्तिकरण से जुड़ा कुछ होगा पर...
    एक फायदा हुआ अच्छी रचना पढने को मिल गई :-)

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  11. रश्मि जी , बेचैन कर दिया न आपको भी इन बे-सिरपैर के नाटकों नें, जब इस नाटक का शीर्षक सुना था तब लगा था नारी सशक्तिकरण से जुड़ा कुछ होगा पर...
    एक फायदा हुआ अच्छी रचना पढने को मिल गई :-)

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  12. रश्मि जी , बेचैन कर दिया न आपको भी इन बे-सिरपैर के नाटकों नें, जब इस नाटक का शीर्षक सुना था तब लगा था नारी सशक्तिकरण से जुड़ा कुछ होगा पर...
    एक फायदा हुआ अच्छी रचना पढने को मिल गई :-)

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  13. बिल्कुल सही! लोग दोहरा चरित्र छोड़ेंगे नहीं ...दोयम दर्जा ही दिया जाता है. भाषणबाजी बहुत आती है सबको ऐसा होना चाहिए .....लेकिन जब करने कि बारी आती हैं तो दुबक जाते हैं.......स्त्री-विहीन समाज हो तो शायद श्रृष्टि-कर्ता भी सोचे ......वरना पक्षपात तो उसने भी कम ना किया

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  14. युग युग से ये बात चला आ रहा है कि हर घर में सबको बेटा ही चाहिए! आखिर लोग ये क्यूँ नहीं समझते की आज के ज़माने में बेटा बेटी में कोई फर्क नहीं है !

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  15. बहुत दुखी मन से लिखी है आज आप ने यह कविता, जरुर आज आप के दिल को ठेस लगी है.... अजी अगए बेटी ना हुयी तो बेटा कहां से आयेगा? ऎसा कहे जो बेटी की इज्जत ना करे जो नारी की इज्जत ना करे उसे कुछ ना दिजो भगवान

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  16. अरे, ऐसी मायूसी भरी बात!!

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  17. इस प्रार्थना में किसी की भलाई नहीं है !!
    पर काश ये बात समाज समझ पाता !!

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  18. Namaskar..

    Beti na hogi duniya main..
    Bete kahan se aayenge..
    Har ghar main bete hi bete..
    Agar janm ab payenge..

    Ek dooje bin purn na koi..
    Stri, Purush adhure hain..
    Dono hi jab sang hain hote..
    Tabhi jagat main pure hain..

    Dua humari bhi ab ye hai..
    Eshwar teri dua sune..
    Agle janm main tujhko bhi wo..
    Purush bana, insaaf kare..

    DEEPAK..

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  19. कईयों के दर्द को बताया है इस कविता ने...

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  20. bahut he bhaavpurn, jwalant or umda rachna... bitiya ke bina bete ke ichcha rakhna bhi to asambhav hai, lekin is bhulakkad samaj ko koi kaise samjhaye, ki beti he maa, patni or behan hoti hai, pidhi ke sanchaar ka amulya shrot hoti hai... mai to prabhu se bas itna he kahunga, prabhu mohe is janam me ek bitiya jarur dijo!!

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  21. " लाली " और उस जैसी लड़कियों के हालात देखकर तो मन यही कहता है कि किसी को बेटी ना दीजो ..मगर फिर सामने किरण बेदी , कल्पना चावला आदि सामने आ खड़ी होती हैं ...
    सच कहूँ तो छुटपन में मन यही कहता था कि किसी जन्म किसी को बिटिया ना कीजो ...मगर धीरे धीरे बिटियां होने का एहसास लुभाता गया...
    और अब तो मन यही कहता है ...
    अगले जन्म चाहे मोहे बिटिया ना कीजो
    मगर मोहे बिटिया ही दीजो ...

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  22. झाँसी की रानी उदहारण हैं...पर झाँसी की रानी को शुरू से अंत तक क्या मिला?
    लडकियां उदाहरण बनकर भी आग पर खड़ी होती हैं,( कुछ घरों की बात छोड़ दें )
    इसे बददुआ क्यूँ कहें?.... सब दिल से बस लड़के की ख्वाहिश करते हैं. रखिये दिल पर
    हाथ और सोचिये गहराई से , बात कितनी बड़ी है, इसे यूँ हल्का न बनाइये ......

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  23. ...क्या नाराजगी है ... इतना क्रोधित होकर भाव अभिव्यक्त करना .... सिस्टम बिगड जायेगा ... त्राही त्राही मच चायेगी !!!!

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  24. nare jivan sach karuna se bhra...

    sachi aaj apne mare sabdo ko apne jaban me he kaha hai aap ko sat sat pranam....

    ham aaj isvar se prthana sab ke ghar bata he ho chaho.... dekhte hai ... tab kitna yaha nare ko castu smjte hai purus.....

    उत्तर देंहटाएं
  25. ane wala samay betiyon ka hi hai...ek nay soch ke or prerit karti kavita... suner

    उत्तर देंहटाएं
  26. bahut khub


    ek achi ke dard ko baya kiya aap ne


    शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !! शुभकामनाएं !!

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  27. Di problem ye hai ki adhiktar maayen bhi ye chahti hai ki mohe bitia na dijo.........:(

    aur ye baat desh ke unn rajyon me jayda hai, jahan sikshha jayda hai...!!

    pata nahi kabh sudhrega!!

    as usual! ek achchhi rachna......

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  28. sundar rachna..par ab waqt badal raha hai..!hum bhi kisi se kam nahi :)

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  29. अगले जनम ये सबक सीखा ही दीजो
    किसी के घर में बेटी ना दीजो
    ..........ohh,bahut dardanaak

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  30. हम तो हमेशा से कहते आ रहे है की "अगले जन्म मोहे बिटिया ना कीजो" और अगर कीजो तो "तुमरी ही कोख दीजो".....ILu...!

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  31. "ये रोष जायज है मान लिया...

    मगर उसमे मेरी खता क्या है.....?"

    आपकी अभिव्यक्ति पढ़ कर एक बेटे ने जो सोचा वो यही था....

    कुंवर जी,

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  32. हम्म बेटियों का तो यही हाल है...वाणी ने सही कहा..." अगले जनम बिटिया ना कीजियो ..पर बिटिया जरूर दीजियो

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  33. didi pranam !
    didi , behad dard wala prasan hai , agar aisa hoga to manav shristi ka ant hi samjo , shayad is dour se guzare hai wo aisi hi prathana karte hoge, , kuch kahne me asakasham hoo.
    saadar

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  34. बड़े ठाकुर की शतरंज का प्यादा बनाना
    पूरी सांसें दूसरों की धरोहर ...!
    फिर भी कहना
    'अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो'-- क्यूँ?
    ...Gahre Marm ko chhuti aapki kavita samaj ke katu yatharth ko bayan karti hai..
    ...Sach to yahi hai ki Aaj bhi kuchh anpadh kya padhe-likhe samaj ki susabhya kahe jaane wale logon ki ladkiyon ke prati mansikta dekh yaisa aakrosh upajna jayaj hai......
    ...Gahri samajik bidambana se marmahat swar अगले जनम ये सबक सीखा ही दीजो, किसी के घर में बेटी ना दीजो!

    उत्तर देंहटाएं
  35. रश्मि जी
    आपकी आज की रचना के आगे नतमस्तक हूँ…………एक कडवे सच को उजागर कर दिया।

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  36. yah virodhaabhas mujhe bhi khatakta raha ,dil ki baat ko aapke shabdo ne vyakt kar diye ,bilkul sahi sawal hai aapka .

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  37. बेहद मार्मिक और दारुण है ये कविता. दर्द को जैसे कुरेद कर रख दिया है .

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  38. पढ़ा,दुःख हुआ.
    जैसे आपके आक्रोश,दुःख पीड़ा के तेज बहाव में बहने सी लगी.
    औरत का अर्थ दुःख ही तो नही.
    कौन कहता है हमें प्यार और सम्मान नही मिलता?
    क्या कभी महसूस नही किया किसी ऩे कि हमारे बिना आदमियों के जीवन सूने हैं .
    नही जी सकते वो हमारे बिना.
    हमने माँ,बेटी,बहिन,पत्नी,प्रेमिका और भी जाने कितने रिश्तों के रूप में हमने इनके जीवन को संवारा है...........तो क्या इनने नही ?
    क्यों हम एक तरफ़ा ही सोचते हैं ?
    पुरुष हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा है.
    कहीं किसी के साथ अन्याय हुआ है तो इसका अर्थ यह तो नही कि हम समस्त पुरुष जाति /वर्ग को मुजरिम के कठघरे में खड़ा कर दें ?
    पिता,भाई,पति,पुत्र,ससुर,देवर,जेठ,चाचा,मामा,नाना,दादा ,पोते ,दोहिते और मित्र कितने रूप है इस पुरुष के .ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है स्त्री और पुरुष दोनों.
    मैं तो हर जन्म में लडकी ,औरत ही बनाना चाहूंगी.
    फिर भी कोई पत्थर मुझ तक आता है तो कुश होऊंगी कि चलो पहला पत्थर मारने वाला कोई गैर नही मेरा अपना था.
    यूँ............इतना कमजोर क्यों बनाये खुद को कि कोई अत्याचार कर सके.
    क्या उसमे भी कहीं ना कहीं किसी स्त्री की ही मुख्या भूमिका नही होती ?
    फिर पुरुष वर्ग से इतनी नाराजगी........?
    कि किसी घर में बेटी हो ही ना,ना बिलकुल नही.
    यूँ श्राप ना दो दुखी हो के.

    उत्तर देंहटाएं
  39. rashmiji kya kahoo ?
    betiyo ke dard ko maa hi smjh sakti hai ,mhsus kar sakti hai kintu kabhi kabhi mjboori samne aajati hai .

    उत्तर देंहटाएं
  40. '' पढ़ा,दुःख हुआ.जैसे आपके आक्रोश,दुःख पीड़ा के तेज बहाव में बहने सी लगी.
    औरत का अर्थ दुःख ही तो नही.
    कौन कहता है हमें प्यार और सम्मान नही मिलता.
    क्या कभी महसूस नही किया किसी ऩे कि हमारे बिना आदमियों के जीवन सूने हैं .
    नही जी सकते वो हमारे बिना.
    हमने माँ,बेटी,बहिन,पत्नी,प्रेमिका और भी जाने कितने रिश्तों के रूप में हमने इनके जीवन को संवारा है...........तो क्या इनने नही ?
    क्यों हम एक तरफ़ा ही सोचते हैं ?
    पुरुष हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा है.
    कहीं किसी के साथ अन्याय हुआ है तो इसका अर्थ यह तो नही कि हम समस्त पुरुष जाति /वर्ग को मुजरिम के कठघरे में खड़ा कर दें ?
    पिता,भाई,पति,पुत्र,ससुर,देवर,जेठ,चाचा,मामा,नाना,दादा ,पोते ,दोहिते और मित्र कितने रूप है इस पुरुष के .ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है स्त्री और पुरुष दोनों.
    मैं तो हर जन्म में लडकी ,औरत ही बनाना चाहूंगी.
    फिर भी कोई पत्थर मुझ तक आता है तो कुश होऊंगी कि चलो पहला पत्थर मारने वाला कोई गैर नही मेरा अपना था.
    यूँ............इतना कमजोर क्यों बनाये खुद को कि कोई अत्याचार कर सके.
    क्या उसमे भी कहीं ना कहीं किसी स्त्री की ही मुख्या भूमिका नही होती ?
    फिर पुरुष वर्ग से इतनी नाराजगी........?
    कि किसी घर में बेटी हो ही ना,ना बिलकुल नही.
    यूँ श्राप ना दो दुखी हो के.''

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  41. Dil ko chhu gai di aapki kavita.

    bahut dino baad blog par aane ke liye mafi chahunga...
    di aapne mujhe apni book nahi bheji...mai intejar kar raha hun..aapke kahe ke mutabit maine aapko address bhi diya tha...mai delhi me nahi hun is liye mujhe book nahi mili par padhne ki jigyasha hai...

    Ravi Rajbhar
    C/o M/s Om Engineer's
    D-1, Industrial Estate
    Sahadatpura Maunath Bhanjan, Mau(U.P) 275101

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  42. बहुत ही मार्मिक ... इस बेटे की ललक में न जाने अभी क्या कुछ देखना बाकी है इस समाज को ....

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  43. rashmi ji,
    betiyon ke sath jo kuchh ho raha ya dekhti hun, to sach kahun main bhi kah deti hun ki beti na hin ho to achha hai. par is sthiti ke doshi to hum aap aur hamara samaj hin hai, jiske badalne ki koi ummid nahin dikhti. achha hin hai ki stree jaati ka ant ho jaye fir dunia ke vinaash ko log dekhe aur stree ki mahatta samjhenge. janti hun ye bhi na hoga par mann to sach mein ho jata hai aisa.
    bahut achhi rachna, badhai aapko.

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  44. सच में बेटी का दर्द कोई नही जानता ।चाहे कितने भी जतन कर लो बेटियों की किस्मत अभी भी बदली न जा सकी है

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  45. ख्वाब टूटे उनके .. घुटते रहे ..सहते रहे ...और पूछते रहे ...
    क्या ये थी बिटिया होने की सजा .....

    सवेंदनशील

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