18 अप्रैल, 2018

यह अँधेरा तुम्हारे घर से कभी नहीं जाएगा ...



मैं हूँ,
पर शायद कहीं नहीं हूँ !
कहीं नहीं होने का तात्पर्य बस इतना है
कि तुमसब मुझे देखकर अनदेखा कर रहे
लेकिन  ... मैं हूँ न !
मैं वही कन्या हूँ
जिसे तुमने पूजने के बहाने बुलाया था
और मंदिर के सारे दीये बुझा डाले थे
...
तुम्हें लगा, अन्धेरा हो गया
तुम्हारा विकृत चेहरा किसी को नहीं दिखा
... और न्याय की ऐसी की तैसी
हमेशा की तरह लोग चीखेंगे
नारे लगाएंगे
फिर सब खत्म !
मुर्ख हो तुम
और ऐसा सोचनेवाले !
मंदिर और प्रकृति की दीवारों ने देखा है तुम्हें
मुमकिन है,
कोई आदमी तुम्हें भूल जाए,
कोई इंसान तुम्हें एक बार में ही मार डाले
लेकिन मैं ऐसा नहीं करुँगी !
तुमने पूजने के लिए बुलाया था न
मैं लहूलुहान बैठी हूँ
तुम्हारे आँगन में
अपनी सहस्रों भुजाओं से
मैं तुम्हें धीरे धीरे खत्म करुँगी
वह सारे दृश्य तुम्हारे आगे लाऊँगी
जो तुमने अँधेरे में दफना दिया !
हैवानियत कभी दफ़न नहीं होती,
यह और कोई जान पाए या नहीं
तुम जानोगे
तुम्हारी सुरक्षा में खड़े लोग जानेंगे
कि अँधेरा कैसे बोलता है !
और यह अँधेरा तुम्हारे घर से कभी नहीं जाएगा  ...

9 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद मार्मिक...और कटु यथार्थवादी रचना

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  2. भावपूर्ण रचना प्रस्तुति आभार

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  3. हाँ यही सच है वो है तो पर कहीं नहीं है।

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  4. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 19.04.2018 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2945 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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  5. नमस्ते,
    आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
    ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
    गुरूवार 19 अप्रैल 2018 को प्रकाशनार्थ 1007 वें अंक में सम्मिलित की गयी है।

    प्रातः 4 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक अवलोकनार्थ उपलब्ध होगा।
    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर।
    सधन्यवाद।

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  6. अब बिखर गई धीरज की पूंँजी ।

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  7. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 18 अप्रैल - विश्व विरासत दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  8. भावपूर्ण, शानदार अभियक्ति,सच हैवानियत कभी दफ़्न नही होती

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