01 जुलाई, 2010

बदले रूख



अपनी डायरी के वे पन्ने
जो मेरे सपनों में फड़फड़ाते हुए
पृष्ठ दर पृष्ठ मुझे डराते थे
उन्‍हें मैंने तुम्हारे सुरक्षा के घेरे में रख दिया है
और खुद लौट गई हूँ
परी लोक में ..
मेरे नए पंख मुझसे कह रहे हैं
'एक लम्बी उड़ान
आज तुम्हारे हाथ है'
सम्पूर्ण आकाश, चाँद
आज फिर मेरे दोस्त हैं
आज फिर
मेरी आँखों की झील में
मासूम नन्हें नन्हें ख्याल हैं
किसी बच्चे के हाथों बनी
कागज़ की नाव जैसे
आज
इस नाव के डूबने का कोई खतरा नहीं
आँधियों ने रुख बदल लिया है
कोई पास बैठा लिख रहा है
एक महाकाव्य -- मेरे नाम

33 टिप्‍पणियां:

  1. rashmi ji,
    bahut sahajta se behad gahri bhaawnaayen vyakt karti hain aap...

    इस नाव के डूबने का कोई खतरा नहीं
    आँधियों ने रुख बदल लिया है
    कोई पास बैठा लिख रहा है
    एक महाकाव्य -- मेरे नाम

    bahut sundar, badhai sweekaren.

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  2. आज फिर
    मेरी आँखों के झील में
    मासूम नन्हें नन्हें ख्याल हैं
    किसी बच्चे के हाथों बनी
    कागज़ की नाव जैसे

    वाह...बस नव यूँ ही तैरती रहे और महाकाव्य की रचना हो जाये.....बहुत खूबसूरत ख़याल ..

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  3. आस्था और आशावादिता से भरपूर स्वर इस कविता में मुखरित हुए हैं। जो स्‍वयं को हर परिस्थितियों के अनुसार ढालना जानता है, उसे जीवन जीने की कला आ जाती है।

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  4. मैंने जो बात दो कविताओं में कही वो आपने १ में ही लिख दी.. तभी ना आप मम्मी हैं.. :)

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  5. रश्मि जी आप हर कविता सकारात्‍मक सोच के साथ आ रही है यह बहुत प्रेरक बात है। आपकी कविता पढ़कर ऊर्जा मिलती है।

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  6. इस नाव के डूबने का कोई खतरा नहीं
    आँधियों ने रुख बदल लिया है
    कोई पास बैठा लिख रहा है
    एक महाकाव्य -- मेरे नाम
    bahut bahut ,bahut hi sundar rachna ,ek adbhut ahsaas hai .

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  7. कविता तो माध्यम है, जीवन के प्रति आपके सकारात्मक दृष्टिकोण का....
    बहुत सुन्दर भाव...

    प्रणाम के साथ शुभकामनाएं....

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  8. कोई पास बैठा लिख रहा है
    एक महाकाव्य -- मेरे नाम

    :)
    :)
    :)

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  9. ये मन जो है ना पता नहीं क्या क्या सोचता रहता है और फिर से जो उभर आता है वो कुछ ऐसा होता है जैसा आपके शब्दों में .................

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  10. aapkee soch kee udaan barkarar rahe isee duaa ke sath hum sabhee bloggers.........

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  11. ऊर्जावान और सकारात्मक सोच वाली कविता ।

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  12. आज
    इस नाव के डूबने का कोई खतरा नहीं
    आँधियों ने रुख बदल लिया है
    कोई पास बैठा लिख रहा है
    एक महाकाव्य -- मेरे नाम

    Sundar sakaratmak Rachna.

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  13. कविता ऐसी लगी मानो कॉपी के पन्नो से शब्द निकल कर खुद ब खुद जुड़ गए हो
    प्यारी रचना

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  14. वाह रश्मि जी !

    नए पंखों की नयी उड़ान !
    नए दोस्त और आँखों में नए ख्याल ! ना कोई खतरा ना कोई भय
    बस अब चलते जाना है ! बेहद सकारात्मक प्रस्तुति और सुन्दर भाव ! :):)

    बहुत बहुत सुन्दर ! बधाइयाँ आपको :)

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  15. कोई पास बैठा लिख रहा है
    एक महाकाव्य -- मेरे नाम
    वाह्…………कल्पना की उडान गज़ब की है………………बेहतरीन नज़रिया।

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  16. इस नाव के डूबने का कोई खतरा नहीं
    आँधियों ने रुख बदल लिया है
    कोई पास बैठा लिख रहा है
    एक महाकाव्य -- मेरे नाम

    Wo Mahakavya..jab poora ho to share kariyega....akhirkaar ham bhi to dekhe kya likha hai :-)

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  17. यह पंख हमेशा उड़ान भरते रहे, साथ चलते रहे ...
    सच कहते हो - आंधिया रुख बदल रही है, उसे बदलना ही था, एक इतिहास बन ना ही है...जीत होनी ही है... ILu..!

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  18. रेशमी जी आप की कविता हमेशा की तरह लाजवाब है जी बहुत सुंदर

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  19. इस नाव के डूबने का कोई खतरा नहीं
    आँधियों ने रुख बदल लिया है
    कोई पास बैठा लिख रहा है
    एक महाकाव्य -- मेरे नाम ....laajabaab, sundar rachna.

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  20. सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

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  21. इस नाव के डूबने का कोई खतरा नहीं
    आँधियों ने रुख बदल लिया है
    कोई पास बैठा लिख रहा है
    एक महाकाव्य -- मेरे नाम
    सादर प्रणाम !
    ये पंक्तियाँ बहुत सुंदर लगी ,अभिव्यक्ति behad achchi ,
    sadhuwad

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  22. इस नाव के डूबने का कोई खतरा नहीं
    आँधियों ने रुख बदल लिया है
    कोई पास बैठा लिख रहा है
    एक महाकाव्य -- मेरे नाम
    कितना ख़ूबसूरत अहसास है ...

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  23. आपने नहीं छोड़ा है उम्मीद का दामन। यही खास बात है रचना में। यही वक्त की जरूरत भी है।
    अच्छी रचना के लिए बधाई।

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  24. kalpnasheelta se bhari rachna.. sunder abhivyakti, naya vimb... khas taur par antim pankitya.."कोई पास बैठा लिख रहा है
    एक महाकाव्य -- मेरे नाम"

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  25. शब्दों से नया संसार गढ़ लेती हैं आप... नए बिम्ब, नया संयोजन.. नई संवेदना... अद्भुद !

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  26. मेरी आँखों की झील में
    मासूम नन्हें नन्हें ख्याल हैं
    किसी बच्चे के हाथों बनी
    कागज़ की नाव जैसे
    आज
    इस नाव के डूबने का कोई खतरा नहीं
    आँधियों ने रुख बदल लिया है
    कोई पास बैठा लिख रहा है
    एक महाकाव्य -- मेरे नाम

    बड़ी सहजता से इतनी गंभीर बात कह गयीं आप
    एक महाकाव्य -- मेरे नाम !!!!!!!

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  27. अपनी डायरी के वे पन्ने
    जो मेरे सपनों में फड़फड़ाते हुए
    पृष्ठ दर पृष्ठ मुझे डराते थे
    उन्‍हें मैंने तुम्हारे सुरक्षा के घेरे में रख दिया है
    और खुद लौट गई हूँ
    परी लोक में ..

    बहुत खूब .. अपने दर को परे कर मुक्त उड़ान की और जाना ही जीवन है ....

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मृत्यु को जीने का प्रयास

मौत से जूझकर जो बच गया ... उसके खौफ, इत्मीनान, फिर खौफ को मैं महसूस करती हूँ ! कह सकती हूँ कि यह एहसास मैंने भोगा है एक हद तक ...