08 अप्रैल, 2011

व्यवहारिक



रिश्तों की मौत हुई...
चार कांधा देने को भी
कोई तैयार नहीं !
प्रत्यक्ष गवाह बन जाने की फिक्र ने
मौत से उदासीन कर दिया ...
शोक सभा में भी
कोई कितने दिन शामिल रहे
एक दिन की अतिरिक्त छुट्टी में
एक दिन की तनख्वाह कट जाती है !
अब यह भार
कौन वहन करे
कुछ और रिश्ते ही मर जायेंगे न
चलता है .....
मरना ही है एक दिन -
व्यवहारिक होकर सोचते हैं समझदार लोग !
रिश्तों में प्यार की जगह
व्यवहारिकता का घुन लग चुका है
क्या करें बिचारे लोग -
व्यवहारिक होना पड़ता है !!!

40 टिप्‍पणियां:

  1. वाकई बहुत व्यावहारिक हो गए हैं लोग..समय का तकाजा है क्या करें
    बहुत सही लिखा है आपने.

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  2. बहुत ही कटु सत्य कहती हुई -
    आज की मानसिकता पर तीखा प्रहार करती हुई -
    बहुत गूढ़ रचना ...!

    utkrist lekhan ke liye badhai...!

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  3. आज के समय पर सटीक कटाक्ष. बढ़िया कविता.

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  4. रिश्तों में प्यार की जगह
    व्यवहारिकता का घुन लग चुका है
    क्या करें बिचारे लोग -
    व्यवहारिक होना पड़ता है !!!

    बहुत सटीक प्रस्तुति..आज रिश्तों में प्यार बचा कहाँ है, केवल व्यवहारिकता या दिखावे के लिये रह गए हैं सभी रिश्ते..बहुत मर्मस्पर्शी...

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  5. कितना कडवा सत्य है यह. आज हम वाकई में ऐसा ही सोचने लगे हैं . एक तीक्ष्ण प्रहार है ये आज की मानसिकता पर ...

    anita agarwal

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  6. दीदी ...आपकी लेखनी का जवाब नहीं

    व्यवहारिक.......
    क्या सच में रिश्तो का रूप इतना बदल चुका है ?
    क्या सच में मानव भावनांए मर चुकी है ?
    या
    हम जैसे लोग पूरे ढर्रे पर ही चल रहे है

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  7. दीदी,बड़े शहरों में ऐसी विवशताएँ अधिक है क्योंकि यहाँ अपने बच्चों को संस्कार देने का समय ही नहीं है लोगो के पास.यह कैसी व्यस्तता और विवशता है मैं आजतक समझ नहीं पाया .आज व्यवहार में भी अपनापन कम और बनावटीपन अधिक आ गया है.सामाजिक सरोकारों से अवगत करती सुंदर रचना

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  8. आदरणीय रश्मि जी
    नमस्कार !
    बहुत सटीक
    तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार......

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  9. रिश्तों की मौत हुई...
    चार कांधा देने को भी
    कोई तैयार नहीं !
    प्रत्यक्ष गवाह बन जाने की फिक्र ने
    मौत से उदासीन कर दिया ...
    शोक सभा में भी
    कोई कितने दिन शामिल रहे
    .....बढ़िया कटाक्ष
    कमाल की लेखनी है आपकी लेखनी को नमन बधाई

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  10. व्यावहारिक होता जा रहा मनुष्य और सूखते जा रहे रिश्ते समाज में खोखलापन ला रहे हैं ऐसे समय में इस तरह की रचना सफलतापूर्वक ध्यानाकर्षण कर रही है, असर कर रही है।

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  11. आदरणीय रश्मि जी नमस्कार !
    क्या सच में मानव भावनांए मर चुकी है ?
    सुन्दर अभिव्यक्ति....

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  12. रिश्तों में प्यार की जगह
    व्यवहारिकता का घुन लग चुका है....मौजूदा दौर के कडवे सच को रख दिया है आपने..
    देवेंद्र गौतम

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  13. रिश्तों में प्यार की जगह
    व्यवहारिकता का घुन लग चुका है

    यही आधुनिक जीवन का कटु सत्य है !

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  14. ये बहुत अच्छी रचना है ...
    प्यार के दो शब्द कभी कभी अमृत तुल्य होते हैं..

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  15. अब यह भार
    कौन वहन करे
    कुछ और रिश्ते ही मर जायेंगे न
    चलता है .....
    मरना ही है एक दिन -
    व्यवहारिक होकर सोचते हैं समझदार लोग !
    रिश्तों में प्यार की जगह
    व्यवहारिकता का घुन लग चुका है ....!!

    हकीकत बयां करती यह अभिव्‍यक्ति ।

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  16. व्यावहारिकता So called समझदार लोगो की सोच है ... हम तो ठहरे एहसासों के धनि, जहा सिर्फ जज्बातों का व्यवहार होता है ...ILu..!

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  17. अब यह भार
    कौन वहन करे
    कुछ और रिश्ते ही मर जायेंगे न
    चलता है .....
    मरना ही है एक दिन -

    सच आज रिश्ते के बोझ को कोई नहीं ढोता ... आज व्यवहार भी स्वार्थपरक हो गया है ...अच्छी नज़्म

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  18. क्या व्यवहारिकता मजबूरी है,या आदत बनती जा रही है संवेदनाओं की कमी के कारण.विचारणीय अभिव्यक्ति के लिये आभार.
    मेरी नई पोस्ट 'वन्दे वाणी विनयाकौ'पर आपके दर्शन अपेक्षित हैं.

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  19. प्रत्यक्ष गवाह बन जाने की फिक्र ने
    मौत से उदासीन कर दिया ...

    सही रूप तो यहीं दिखता है .....):

    रिश्तों में प्यार की जगह
    व्यवहारिकता का घुन लग चुका है.....

    प्रत्यक्ष भावनाओं को सही उकेरा है आपने ....

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  20. प्रत्यक्ष गवाह बन जाने की फिक्र ने
    मौत से उदासीन कर दिया ...
    शोक सभा में भी
    कोई कितने दिन शामिल रहे
    ..
    ..
    कभी-कभी मैं सोंचता हूँ लावारिश हालत में मरना ज्यादा अच्छा होता है दीदी...ना बच्चों को कोई कष्ट ना रिश्तेदारों को ना समाज को हर तरफ शांति ही शांति !!
    आपने भविष्य दिखाया दीदी !!थैंक्स

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  21. सामाजिक सरोकार और रिश्तों के निर्वहन को भी औपचारिक बना दिया है इस तथाकथित व्यवहारिकता ने तो ..

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  22. क्या करे ये बेचारे व्यवहारिक लोग !
    कटु सत्य !

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  23. कितना सच हो गया है यह कडवा सच !! हे नेहरु चाचा बदल गयी दुनिया !!
    "प्रत्यक्ष गवाह बन जाने की फिक्र ने
    मौत से उदासीन कर दिया ..."....... अन्दर तक चुभ गयी.
    ........ कविवर बच्चन की ये पंक्तियाँ है न ,
    फिर भी मदिरालय के अन्दर , मधुघट हैं मधु के प्याले हैं.

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  24. कितना सच हो गया है यह कडवा सच !! हे नेहरु चाचा बदल गयी दुनिया !!
    "प्रत्यक्ष गवाह बन जाने की फिक्र ने
    मौत से उदासीन कर दिया ..."....... अन्दर तक चुभ गयी.
    ........ कविवर बच्चन की ये पंक्तियाँ है न ,
    फिर भी मदिरालय के अन्दर , मधुघट हैं मधु के प्याले हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  25. व्यवाहारिक संबन्धों की पराकाष्ठा की परिणति है यह ।

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  26. सामाजिक संबंधों में घुन लगा दिया है भ्रष्टाचार ने।

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  27. रिश्तों में प्यार की जगह
    व्यवहारिकता का घुन लग चुका है
    क्या करें बिचारे लोग -
    व्यवहारिक होना पड़ता है !!!
    ...सच प्यार भी अब प्यार जैसा बहुत कम दिखता है और रिश्ते निभाने भर के नाम से चल रहे हैं ...
    आज के हालातों का यथार्थ चित्रण ................आभार

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  28. bhut acchhi rachna...kbhi kbhi u bhi hota hai insan ko baybaharik hona pdta hai..yhi dastur hai zivan ki...aapne bhut saty likha hai...badhai

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  29. अब यह भार
    कौन वहन करे
    कुछ और रिश्ते ही मर जायेंगे न
    चलता है .....
    मरना ही है एक दिन -
    --
    हकीकत बयान करती हुई सुन्दर रचना!

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  30. व्यवहारिक होकर सोचते हैं समझदार लोग !
    रिश्तों में प्यार की जगह
    व्यवहारिकता का घुन लग चुका है

    आज के दौर का कड़वा सच.....

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  31. रिश्तों में प्यार की जगह
    व्यवहारिकता का घुन लग चुका है
    sach kaha hai.....kitne dukh ki baat hai.

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  32. vyawahaarikta ke bina aaj khud ko sthaapit karna mushkil hai, chaahe waqt khushi ka ho ya fir apno ke gujar jaane ka. samay sab sikha deta...achhi rachna, badhai.

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  33. गहरा कटाक्ष्……………तीखा प्रहार किया है।

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  34. रिश्तों में प्यार की जगह
    व्यवहारिकता का घुन लग चुका है
    क्या करें बिचारे लोग -
    व्यवहारिक होना पड़ता है !!!

    पर यह ठीक नही --ऐसे तो रिश्तो की नाजूक दीवारों में दरार आ सकती है ?

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  35. 'जाने दो'
    आसान होता है कहना
    पर दर्द
    अपमान के दंश
    कभी जाते नहीं हैं !
    'जाने दो' तो पलायन है
    या फिर 'स्व' की रक्षा
    ....
    बहुत सुन्दर पंक्तियां.

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ये तो मैं ही हूँ !!!

आज मैं उस मकान के आगे हूँ जहाँ जाने की मनाही थी सबने कहा था - मत जाना उधर कमरे के आस पास कभी तुतलाने की आवाज़ आती है कभी कोई पु...