28 अप्रैल, 2011

तपस्वियों सी आस्था !!!



वह पल -
निःसंदेह
न आकर्षण था
न कोई गलत भावना
न बेवकूफी न नाटक ....
रात से सुबह तक
मेघ बरसते रहे
और हमदोनों हथेलियों में
सागर को भरते रहे !

न व्यर्थ का शर्माना था
न दिखावे की ललक
एक अविराम दीया
अनवरत हमारे मध्य जलता रहा....

रास्ते बदले
चेहरे बदले
बालों पर अनुभवों की सफेदी उतर आई
पर सोच नहीं बदली !
रात गए एक दीया हमारे मध्य
अदृश्य बना जलता ही रहा
कभी तुमने ओट दिया
कभी मैंने ...

पहाड़ टूटकर बिखर गए
न जाने कितने मौसम बदले
आग की तपिश थमी
पुरवा ने द्वार खोले ...
तब माना -
कितनी निष्ठा से प्रभु ख़ास रिश्ते बनाता है
किसी भी नाम से परे ...
चाहो तो कई नाम
ना चाहो तो बेनाम
पर तपस्वियों सी आस्था !!!

43 टिप्‍पणियां:

  1. एक गमभीर रचना ... 'तपस्विओं की आस्था' का विम्ब सर्वथा नवीन है.. बढ़िया कविता

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  2. कितनी निष्ठा से प्रभु ख़ास रिश्ते बनाता है
    किसी भी नाम से परे ...
    चाहो तो कई नाम
    ना चाहो तो बेनाम
    पर तपस्वियों सी आस्था !!!


    आपकी रचना बहुत अर्थ संप्रेषित करती है ....जीवन को नए आयाम देती है .....आपका शुक्रिया

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  3. प्यार का विस्तृत रूप समझाती हुई गंभीर गहन रचना ..
    बहुत सुंदर .

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  4. वाह वाह वाह ..कितनी पाक ..खूबसूरत, और गहरी रचना रच डाली है आपने.

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  5. कितनी निष्ठा से प्रभु ख़ास रिश्ते बनाता है
    किसी भी नाम से परे ...
    चाहो तो कई नाम
    ना चाहो तो बेनाम
    पर तपस्वियों सी आस्था !!!

    हर शब्‍द गहरे भाव के साथ ... जीवन का सार लिये जहां प्रत्‍येक शब्‍द जीवंत हो उठता है .. लाजवाब करती अभिव्‍यक्ति ।

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  6. निष्ठा, धैर्य और कर्तव्य तप ही तो है।
    अभ्यांतर तप, समर्पण का तप!!
    तप सदैव अनुमोदनीय ही होते है।

    सार्थक समदृष्टि की श्रेष्ठ रचना!! बधाई!!

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  7. न व्यर्थ का शर्माना था
    न दिखावे की ललक
    एक अविराम दीया
    अनवरत हमारे मध्य जलता रहा....

    बहुत ही गंभीर रचना है...आभार !

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  8. निष्पाप प्रेम की पाक अभिव्यक्ति ।

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  9. ओह! जैसे खुद को जी रही हूँ हर शब्द में.ऐसा ही खूबसूरत एक दिया जलाया मैंने भी और जल रहा है ....हर नाम ,हर रिश्ते से परे.....मंदिर के दीये सा,हवन की अग्नि सा.......एक दिया???? नही...अनगिनत दीये जलाए मैंने और शायद...उसने भी.पदम,वीरजी,दादा,मिन्नी,एन्जिलजी,नन्नू,मिन्नी,सुवी,गरिमा,गोस्वामीजी ....मेरे जीवन को जगमगाया इन्होने.रिश्तों से परे ये सब मिले .मेरी ओक्सीजन बन गये. मुझसे पूछ-'हम कौन है?'
    ''तुम ही हो माता,पिता तुम्ही हो बन्धु,सखा तुही हो,
    तुम ही हो साथी तुम ही सहारे कोई ना अपना सिवा तुम्हारे'
    तुमने लिखा,मैं जी रही हूँ इन शब्दों को.इसलिए विश्वास करती हूँ इन शब्दों पर. ....मेरे लिए ईश्वर से कम नही ये तपस्वी,तपस्या और इनका प्रेम ...मन को उस ऊँचाई तक ले जाता है जहां ईश्वर मुझसे दूर नही रहता.
    प्यार

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  10. रात से सुबह तक
    मेघ बरसते रहे
    और हमदोनों हथेलियों में
    सागर को भरते रहे !

    न व्यर्थ का शर्माना था
    न दिखावे की ललक
    एक अविराम दीया
    अनवरत हमारे मध्य जलता रहा....

    बहुत ही भावुक कविता है.... ! कविता का यह अंश मन को छू गया.

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  11. रात से सुबह तक
    मेघ बरसते रहे
    और हमदोनों हथेलियों में
    सागर को भरते रहे !

    न व्यर्थ का शर्माना था
    न दिखावे की ललक
    एक अविराम दीया
    अनवरत हमारे मध्य जलता रहा....

    बहुत ही भावुक कविता है.... ! कविता का यह अंश मन को छू गया.

    उत्तर देंहटाएं
  12. और हमदोनों हथेलियों में
    सागर को भरते रहे !
    ------

    रात गए एक दीया हमारे मध्य
    अदृश्य बना जलता ही रहा
    कभी तुमने ओट दिया
    कभी मैंने ...
    -------
    rishton ki gahan anubhuti aur abhivyakti h is kavita me....
    ati sunder..badhai..

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  13. मैंने बहुत पहले लिखा था कहीं कि, आपका एक एक शब्द पढने की इच्छा होती है कहीं कुछ छूट ना जाये ....मेरे लिए तो आपका लेखन गुरुकुल है दीदी ...हर बार कि तरह ही आपके शब्दों पर टिप्पड़ी करने में असमर्थ है आपका यह बच्चा !

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  14. चाहो तो कई नाम
    ना चाहो तो बेनाम
    पर तपस्वियों सी आस्था !!! kya kahe madam.apki ki kisi bhi kavita pe comments karna suraj ko roshni dikhane ke brabar hai... bhut hi accha likhti hai aap...

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  15. कितनी निष्ठा से प्रभु ख़ास रिश्ते बनाता है
    किसी भी नाम से परे ...
    चाहो तो कई नाम
    ना चाहो तो बेनाम
    पर तपस्वियों सी आस्था !!!

    ..प्रेम के गहन रूप को चित्रित करती सुन्दर भावपूर्ण रचना..आभार

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  16. बालों पर अनुभवों की सफेदी उतर आई
    पर सोच नहीं बदली !
    रात गए एक दीया हमारे मध्य
    अदृश्य बना जलता ही रहा
    कभी तुमने ओट दिया
    कभी मैंने ...

    और तपस्वियों सी आस्था ....मन के भावों को सुन्दर शब्द दिए हैं ...लोग आस्था पर भी तर्क करते हैं ...

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  17. मोहक भावुक प्रेमाभिव्यक्ति ...

    सुन्दर,बहुत ही सुन्दर...

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  18. आस्था किसी भी रिश्ते में तपस्वियों सी न हो तो रिश्ते बेमानी हैं...रिश्ते धोने की चीज़ तो नहीं हैं...कम से कम...

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  19. कुछ रिश्तो का नाम नहीं होता
    जीने का अंजाम नहीं होता
    बंद मुठी में जीये जाते है
    खुले तो वही बदनाम कहलाते है

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  20. bas pavitra ehsaas hain ye ..shabd to bas ban gaye uske saakshi ..

    sunder rachna...

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  21. तपस्वियों सी आस्था एक अनूठा दर्शन प्रतिबिंबित किया आपने अपनी सुन्दर अभिव्यक्ति में.

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  22. बहुत भाव पुर्ण ओर गहरे अर्थ लिये एक अति सुंदर कविता, धन्यवाद

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  23. रात गए एक दीया हमारे मध्य
    अदृश्य बना जलता ही रहा
    कभी तुमने ओट दिया
    कभी मैंने ...


    कम शब्द में बहुत कुछ कह जाते है आप..

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  24. तपस्वियों सी आस्था लिए अनाम रिश्ते ...
    यह दीपक और इसकी लौ सलामत रहे !

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  25. दिल को छू गयी आपकी ये रचना.........उम्र का कोई पड़ाव हो प्यार के भाव में कोई परिवर्तन नहीं आता..वो वैसा ही रहता हमेशा...........

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  26. बहुत ही सुन्दर रचना है दीदी,

    खास कर ये पंक्तियाँ कितनी सुन्दर है ...

    "रात गए एक दीया हमारे मध्य
    अदृश्य बना जलता ही रहा
    कभी तुमने ओट दिया
    कभी मैंने ..."

    किसी भी रिश्ते को जिंदा रखने के लिए दोनों तरफ से पुरजोर कोशिश होनी होती है ...

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  27. "रात से सुबह तक
    मेघ बरसते रहे
    और हमदोनों हथेलियों में
    सागर को भरते रहे !"
    "रात गए एक दीया हमारे मध्य
    अदृश्य बना जलता ही रहा
    कभी तुमने ओट दिया
    कभी मैंने ...''
    दीदी,इस बिम्ब नें ही सबकुछ कह दिया.दोनों अपना-अपना काम करते रहे.आस्था और तप का इससे बड़ा और अच्छा उदहारण क्या होगा.
    कहने को कुछ नहीं है ,बस पढ़ते रहना चाहता हूँ....

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  28. ये तपस्‍या और आस्‍था दोनों बहुत जरूरी हैं।

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  29. प्यार का विस्तृत रूप समझाती हुई गंभीर गहन रचना|धन्यवाद|

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  30. तपस्वियों सी आस्था, पर्वत जैसी।

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  31. प्रेम अपने आप में एक तपस्या ही तो है ...
    बहुत ठहरी हुई .. लाजवाब रचना ...

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  32. कितनी निष्ठा से प्रभु ख़ास रिश्ते बनाता है
    किसी भी नाम से परे ...
    चाहो तो कई नाम
    ना चाहो तो बेनाम
    पर तपस्वियों सी आस्था !!!
    man ko chhoo gayi ,yahi pavitra bhavna jinda rahe aur kya chahiye .

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  33. aap bahut acha likhti hai. Kya mai aapke blog ko apne blog me add kar sakta hu?

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  34. सुंदर भाव का सम्प्रेषण ....आपका आभार

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  35. प्यार का इतना सुन्दर वर्णन.......... पढ़ के बहुत अच्छा लगा

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  36. पहाड़ टूटकर बिखर गए
    न जाने कितने मौसम बदले
    आग की तपिश थमी
    पुरवा ने द्वार खोले ...
    तब माना -
    कितनी निष्ठा से प्रभु ख़ास रिश्ते बनाता है....
    बहुत खूब

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