16 जून, 2011

प्रतिविम्बित अक्स





आदमकद शीशे सा उसका व्यक्तित्व
और तार तार उसकी मनःस्थिति !
मैं मौन उसे सुनती हूँ
आकाश में प्रतिविम्बित उसका अक्स
घने सघन मेघों सा बरसता जाता है
धरती सी हथेली पर !
नहीं हिलने देती मैं हथेलियों को
नहीं कहती कुछ...
कैसे कहूँ कुछ
जब वह आकाश से पाताल तक
अपने सच को कहता है !
ओह ... सच की सिसकियाँ
मेरे मौन की गुफा में
पानी सदृश शिवलिंग का निर्माण करती हैं
........
अदभुत है यह संरचना
सबकुछ निर्भीक
शांत
स्व में सुवासित होता !
गंगा आँखों से निःसृत होती है
त्रिनेत्र से दीपक प्रोज्ज्वलित होता है
अपने ही संकल्प परिक्रमा करते हैं
निर्णय मंदिर की घंटियों में
उद्घोषित होते हैं
द्वार पूर्णतया खुले होते हैं
पर दर्शन वही कर पाता है
जो सत्य के वशीभूत होता है !

33 टिप्‍पणियां:

  1. गंगा आँखों से निःसृत होती है
    त्रिनेत्र से दीपक प्रोज्ज्वलित होता है
    अपने ही संकल्प परिक्रमा करते हैं
    निर्णय मंदिर की घंटियों में
    उद्घोषित होते हैं
    द्वार पूर्णतया खुले होते हैं
    पर दर्शन वही कर पाता है
    जो सत्य के वशीभूत होता है !

    कितनी गहराई से प्रत्‍येक शब्‍द में हर भाव को समेटकर इस रचना में आपने एक सच कहा है ...और इसके आगे मैं नि:शब्‍द हूं ... ।

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  2. द्वार पूर्णतया खुले होते हैं
    पर दर्शन वही कर पाता है
    जो सत्य के वशीभूत होता है !

    मानो तो गंगा माँ हूँ न मानो तो बहता पानी , प्रश्न आस्था का है बात बेहद सटीक और सारगर्भित

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  3. अन्तर्मन को सार्थक बिंब से साकार कर दिया।
    अद्भुत रचना!! आभार!!

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  4. पर दर्शन वही कर पाता है
    जो सत्य के वशीभूत होता है !

    यही जीवन सत्य है………सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  5. SATIK OR ACHI RACHNA LIKHI HAI MAM. . . .
    JAI HIND JAI BHARAT

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  6. कुछ कुछ कहती हैं ये पंक्तियाँ .बेहतरीन अभिव्यक्ति.

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  7. निर्णय मंदिर की घंटियों में
    उद्घोषित होते हैं
    द्वार पूर्णतया खुले होते हैं
    पर दर्शन वही कर पाता है
    जो सत्य के वशीभूत होता है !

    सहजता से कह दी है सत्यता की बात ...सुन्दर अभिव्यक्ति

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  8. बहुत सुन्दर कविता... मन की स्थिति का सुन्दर चित्रण....

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  9. रश्मिप्रभा जी...........बहुत सुन्दर...सच,दर्शन उसे ही हो पाते हैं जो सत्य के वशीभूत होता है...........मुझे स्व में सुवासित होना की परिकल्पना बहुत अच्छी लगी

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  10. निर्णय मंदिर की घंटियों में
    उद्घोषित होते हैं
    द्वार पूर्णतया खुले होते हैं
    पर दर्शन वही कर पाता है
    जो सत्य के वशीभूत होता

    aksar yahi hota hai, hum satya dekhna hi nahi chahte....

    bahut achhi rachna....

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  11. द्वार पूर्णतया खुले होते हैं
    पर दर्शन वही कर पाता है
    जो सत्य के वशीभूत होता है !

    जीवन के सत्य को परिभाषित करती बेहतरीन अभिव्यक्ति..... बहुत सुन्दर..

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  12. आपकी इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी है!

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  13. सत्य वचन...दर्शन का पात्र भी वही है...

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  14. पर दर्शन वही कर पाता है
    जो सत्य के वशीभूत होता है !
    मन:स्थिति की सूक्ष्मता ..

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  15. बहुत ही मर्म स्पर्शी दार्शनिक रचना ..सत्य की खोज रत मन का चिंतन....अपार शुभ कामनाएं...

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  16. antarman ki gahraayi ko shabdo me piro diya apne... bhut khubsurat...

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  17. पर दर्शन वही कर पाता है जो सत्य के करीब हो ...
    निर्भीक सत्य !

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  18. sankalp nirny ke madir ka parikrma karte hai...Vaah Rashmi ji ....behad umda soch aur khyaal...

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  19. संकल्प की नाव ..... सत्य की पताका..... मौन की नदी में.... सफ़र स्वयं से स्वयं तक का.....! :)
    अद्भुद ...! :)

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  20. गंगा आँखों से निःसृत होती है
    त्रिनेत्र से दीपक प्रोज्ज्वलित होता है
    अपने ही संकल्प परिक्रमा करते हैं

    कैसी अनोखी है यह पूजा ! बहुत सुंदर !

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  21. ओह ... सच की सिसकियाँ
    मेरे मौन की गुफा में
    पानी सदृश शिवलिंग का निर्माण करती हैं

    एक दम नयी बात....अद्भुत दिव्य..अपना एक शेर याद आ गया

    "इक गुफा सी है मन में मेरे
    जिसमें बैठा है तू ध्यान में"...

    सादर

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  22. द्वार पूर्णतया खुले होते हैं
    पर दर्शन वही कर पाता है
    जो सत्य के वशीभूत होता है !

    ....बहुत सटीक और गहन सत्य..आभार

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  23. सच्‍चाई की राह .. सच्‍चाई की बातों में आपका कोई सानी नहीं ...आपकी सोच को मेरा नमन है...

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  24. पर दर्शन वही कर पाता है
    जो सत्य के वशीभूत होता है !
    ...बिलकुल सत्य ....
    सच का जीवन दर्शन कराती सुन्दर रचना के लिए आभार

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  25. पर दर्शन वही कर पाता है
    जो सत्य के वशीभूत होता है !

    sahi kaha mausi....

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  26. रश्मिप्रभा जी,

    चिंतन के सनातन बोझ से मुक्त करती हुई सत्य के शास्वत स्वरूप से अंत्अर्निहित साक्षात्कार से संवाद कराती हुई कविता अपने प्रतीकों से नई ऊँचाईयाँ पाती है।

    आपकी लेखनी को नमन.....

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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  27. बहुत गहरे उतर कर लिखा है अध्यातम और दर्शन का अद्भुत मिलन
    आभार

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प्रभु

देनेवाले, तेरा दिया तुझे ही देकर सब बहुत खुश हैं ! सोने से तुम्हें सजाकर डालते हैं एक उड़ती दृष्टि अपने इर्दगिर्द और मैं तोते की...