19 सितंबर, 2011

रात की झिड़कियां



जब जब मैं हठी की तरह सोती नहीं
करवटें बदलती हूँ
यादों की सांकलें खटखटाती हूँ -
चिड़िया घोंसले से झांकती है
चाँद खिड़की से लगकर निहारता है
हवाओं की साँसें थम जाती हैं
माथे पर बल देकर रात कहती है
'सांकलों पर रहम करो
यादों पर अपनी पकड़ ढीली करो
पीछे कुछ भी नहीं ....
दिल पर जोर न पड़े
आँखों के नीचे स्याह धब्बे न पड़े
इसीलिए न मैं आती हूँ
करवटों से कुछ नहीं होगा
उलजलूल के सिवा कुछ भी पल्ले नहीं पड़ेगा
सो जाओ ..... '
और इस प्यार भरी झिड़की के सम्मान में
रात के तीसरे पहर मैं सो जाती हूँ
चिड़िया एक अंगड़ाई ले दुबक जाती है
कहती है - आज देर से उठूंगी
चाँद चलने की तैयारी करता है
हवाएँ साँसें लेने लगती हैं
मुझे छूकर थपकियाँ देती हैं
रात अलसाई अपने चादर समेटने लगती है
........ क्या करूँ , होता है ऐसा कई बार ...
सब कहते हैं - इस उम्र में ऐसा होता है
पर मुझे तो सब यादों का तकाजा ही लगता है
तभी तो -
नींद की दवा भी हार हार जाती है
रात की झिड़कियां और हवाओं की थपकियाँ ही
हठ की दीवारें गिरा
पलकें बन्द कर जाती हैं

47 टिप्‍पणियां:

  1. वाह दीदी बहुत दिन बाद फिर आपके ब्लॉग पर आना हुआ और आके एक बहुत सुन्दर, कोमल एहसासों से भरी हुई, अलसाती सी कविता पढ़ने को मिली ... बहुत अच्छा लगा ...

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  2. लो जी जब आप यह कविता लिख रही होंगी, हम उसी समय इसी अहसास से गुजरे हैं। बीती रात कुछ इसी तरह कटी। सुंदर अभिव्‍यक्ति।

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  3. कभी कभी ऐसा होता है जब यादें बसेरा कर लेती हैं ।

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  4. wow... bahut sundar...
    waise ye us umra ka nahi har umra ka haal hai... medicines k oopar thapkiyon ki hee jeet hoti hai hamesha... :)

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  5. एक गंभीर चिंतन से गुजरती व्यापक फलक की कविता...

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  6. आँखे नींद और रात एक दुसरे के पूरक

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  7. शब्द-चित्र ने एक अलग समां बांध दिया है..

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  8. वाह! सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति.


    मेरा ब्लॉग आपको याद कर रहा है,रश्मि जी.

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  9. रात की झिड़कियां और हवाओं की थपकियाँ ही
    हठ की दीवारें गिरा
    पलकें बन्द कर जाती हैं
    गहन भावों का समावेश हर पंक्ति में ...।

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  10. गंभीर अभिव्यक्ति .........बेहतरीन

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  11. रात के तीसरे पहर में मैं सो जाती हूँ
    चिड़िया एक अंगड़ाई ले दुबक जाती है
    कहती है - आज देर से उठूंगी
    चाँद चलने की तैयारी करता है
    हवाएँ साँसें लेने लगती हैं
    मुझे छूकर थपकियाँ देती हैं
    रात अलसाई अपने चादर समेटने लगती है
    ........ क्या करूँ , होता है ऐसा कई बार ...

    बहुत सुन्दर, कोमल एहसास... पढकर बहुत अच्छा लगा ... होता है अक्सर ऐसा...

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  12. चिड़िया एक अंगड़ाई लेकर दुबक जाती है कहती कल सुबह देर से उठूँगी
    छान चले की तैयारी करता है हवायें सांस लेने लगती है
    वाह... सभी के मन की बात कह डाली आपने, हमेशा की तरह बेहतरीन अभिवक्ती ....

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  13. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

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  14. आज देर से उठूंगी
    चाँद चलने की तैयारी करता है
    हवाएँ साँसें लेने लगती हैं
    मुझे छूकर थपकियाँ देती हैं
    गहन भावों को शब्दों में बांधा है आपने......खूबसूरत और संवेदनशील रचना !

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  15. नींद की दवा भी हार हार जाती है
    रात की झिड़कियां और हवाओं की थपकियाँ ही
    हठ की दीवारें गिरा
    पलकें बन्द कर जाती हैं

    ...कोमल अहसासों से परिपूर्ण बहुत सशक्त अभिव्यक्ति..आभार

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  16. ऐसी झिड़कियाँ बहुत आवश्यक हैं।

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  17. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  18. बहुत सुन्दर, कोमल एहसासों से भरी हुई, खूबसूरत और संवेदनशील रचना ...आभार

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  19. bilkul ek pari-katha jaisi kavita... man ko mohne wali.. khoyi khoyi..
    badi mushkil se vapas aa saki mai reality me.. aap bhi na ma'am! kitna pyara likhte ho! :)

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  20. नींद की दवा भी हार हार जाती है
    रात की झिड़कियां और हवाओं की थपकियाँ ही
    हठ की दीवारें गिरा
    पलकें बन्द कर जाती हैं.

    रश्मि जी ,

    जो मेरे साथ होता है वो आपने कैसे लिख दिया :):) ...बहुत सही और यथार्थ चित्रण कर दिया ..

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  21. तभी तो -
    नींद की दवा भी हार हार जाती है
    रात की झिड़कियां और हवाओं की थपकियाँ ही
    हठ की दीवारें गिरा
    पलकें बन्द कर जाती हैं... सच को अपने शब्दों में पिरो दिया है....

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  22. आँखों के सामने से कई रातें गुजर गईं.

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  23. गंभीर भावों का बहुत सरलता से प्रवाह हो रहा इस कविता में. बहुत सुंदर.

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  24. रात की झिड़कियां और हवाओं की थपकियाँ ही
    हठ की दीवारें गिरा
    पलकें बन्द कर जाती हैं
    bahut khoobsurat....aabhar

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  25. सुंदर शब्द चित्रण और कुशल अभिव्यक्ति!!

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  26. Sabse pahle to mafiiiiiii! kaafi dino baad aana huaa. or aana sarthk bhi huaa ..bahut umda kavita padhne ko mili ?dhanywaad !

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  27. नींद की दवा भी हार हार जाती है
    रात की झिड़कियां और हवाओं की थपकियाँ ही
    हठ की दीवारें गिरा
    पलकें बन्द कर जाती हैं

    Bahut hi Sunder....

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  28. रात की झिड़कियां और हवाओं की थपकियाँ बेहद शानदार लाजवाब हैं....

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  29. बहुत -बहुत सुन्दर रचना.नींद ना आने के सही कारण को ढूंढ लिया,आपने .यादों पर अपनी पकड़ ढीली करो
    पीछे कुछ भी नहीं ....

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  30. जब झिडकियों से काम चलता है तो नींद की दवा की जरुरत कहाँ ...
    मगर ..नींद क्यूँ रात भर नहीं आती !!!

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  31. कभी कभी कुछ प्यारी झिडकियां दावा का सा असर करती हैं
    बहुत प्यारी कविता

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  32. सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति.

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  33. ऐसे शब्द और ऐसे भाव अन्यत्र मिलने दुर्लभ हैं...अप्रतिम रचना है आपकी...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  34. वाह ! बहुत सुंदर, कुछ लोग हैं जो नींद के न आने पर दिन भर खफा हो रहते हैं..और आप हैं कि इतनी प्यारी कविता में उस अनुभव को ढाल दिया...कवि का दिल वह पारस है जिसे छूकर हर शै स्वर्ण हो जाती है..

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  35. नींद की दवा भी हार हार जाती है
    रात की झिड़कियां और हवाओं की थपकियाँ ही
    हठ की दीवारें गिरा
    पलकें बन्द कर जाती हैं
    ...man ki gahrayee mein utar kar andolit karti sundar bhavpurn rachna prastuti hetu aabhar!

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  36. आदरणीया
    बहुत भावुक रचना है.....

    प्यार भरी झिड़की के सम्मान में
    रात के तीसरे पहर में मैं सो जाती हूँ
    चिड़िया एक अंगड़ाई ले दुबक जाती है
    कहती है - आज देर से उठूंगी
    चाँद चलने की तैयारी करता है
    हवाएँ साँसें लेने लगती हैं
    मुझे छूकर थपकियाँ देती हैं
    बहुत उम्दा..... aanandvibhor kar dene wali panktiyan.....!

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  37. पर प्रश्न तो वहीँ खड़ा है ना
    यक्ष की भांति .... अनुत्तरित
    ये यादें होती ही क्यूँ हैं .. ?
    किसी के जाने के साथ
    ये भी क्यूँ नहीं चली जातीं
    क्यूँ नहीं जीने देती ये हमें
    क्या रात ... क्या दिन .. !!
    नहीं है हमें इनकी ज़रूरत
    आखिर क्यूँ नहीं समझतीं .. ?

    जब भी बेशर्म बन धकेलते हैं
    हम इन्हें दरवाजे से बाहर
    ये उतनी ही द्रुत गति से
    पलट वार करती हैं
    क्या दुसरे ... क्या तीसरे ... और क्या चौथे
    जिस पहर भी आँख खुले
    ये मुहँ बाये सामने खड़ी होती हैं
    क्यूँ......?

    sunder rachna Dii....pr mera prashn yathavat hai....utter dain

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  38. kuchh aisa hi hota hai kabhi kabhi lekin ye aankhon se door neend ke bina gujare pal kuchh de jate hain aur vahi ahsaas aisi sundar rachna ke vaayas hote hain

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  39. दी , आपबीती सी लगती है ...हमारे मन में ऐसे कैसे झाँक लेती हैं आप ...सादर !

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  40. पर मुझे तो सब यादों का तकाजा ही लगता है
    तभी तो -
    नींद की दवा भी हार हार जाती है !

    आभार...

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  41. नींद की दवा भी हार हार जाती है
    रात की झिड़कियां और हवाओं की थपकियाँ ही
    हठ की दीवारें गिरा
    पलकें बन्द कर जाती हैं
    sahi kaha yun hin karvat badalte badalte raat hamein sulaa deti hai warna dawa mein itni shakti kahan ki yaadon ko hata kar neend la de.

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