14 दिसंबर, 2011

परिस्थितियाँ और बहादुर ...



उन्होंने बड़े प्यार से कहा -
'तुम बहुत बहादुर हो "....
.... चेहरे पे मुस्कान उतर आई
वर्षों की परिस्थितियों ने ली अंगड़ाई
और मैंने खुद का मुआयना किया ...

मैं एक डरपोक लड़की
माँ की चूड़ियों में ऊँगली फंसाकर सोती थी
ताकि जब भूत मुझे पकड़ने आए
तो माँ की चूड़ियों में फंसी ऊँगली
माँ को जगा जाए
और मैं बच जाऊँ ....
बेवकूफ सोच ..., पर डर ही इतना प्रबल था !

सब दिन होत न एक समान '
मेरे भी नहीं रहे .....
भूत तो नहीं मिला
हाँ भूत की शक्ल में आदमी मिले
बोलते तो लगता कह रहे हैं -
'कच कच कच कच कच्चे खाँव '
माँ की चूड़ियाँ बहुत दूर थीं
तो कहा -
'जाको राखे साइयां मार सके न कोय '
पर कहते हुए
सरकती रात में दिल धड़कता रहा
कच्चे खाँव के खा जाने का भय
साथ साथ चलता रहा ...

कई दोराहे , चौराहे मिले
पार कर गई ...
मैं मजबूत होती गई या खाली
इससे परे ज़िन्दगी जीती गई !
जब कभी आँखें छलछलायीं
सुना - "अरे तुम तो बहुत बहादुर हो ..."
..... कहनेवालों की नियत गलत नहीं थी
हाँ , सुनकर मैंने खुद को टटोला
क्या यह सच है
कि मैं बहुत बहादुर हूँ
या चलती साँसों के मध्य परिस्थितियों को
बाएं दायें चलकर जीती गई ...
पता नहीं - सच क्या है !
जो भी हो -
कभी खुद पे इतराई
कभी आईने में खुद से पूछा
' तुम बहादुर हो ?'
......................... सिलसिला जारी है .......................

39 टिप्‍पणियां:

  1. परिस्थितियाँ ही कभी-कभी बहादुर बना देती.....हम जो होते नही है वो कर जाते है..... खुद को खुद में तलाशती बेहतरीन रचना.....

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  2. ... सिलसिला जारी है ..
    bahut khoob....aabhar

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  3. ये पंक्तियाँ याद आ रही हैं.
    नहीं आता था उबड खाबड़ रास्तों पर चलना भी,
    जिंदगी सिखा ही देती है,गिरना भी संभालना भी

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  4. कई दोराहे , चौराहे मिले
    पार कर गई ...
    मैं मजबूत होती गई या खाली
    इससे परे ज़िन्दगी जीती गई !

    देखा जिया बहुत कुछ सिखाता समझाता है..... सुंदर रचना

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  5. माँ की चूड़ियों में ऊँगली फंसाकर सोती थी
    ताकि जब भूत मुझे पकड़ने आए
    तो माँ की चूड़ियों में फंसी ऊँगली
    माँ को जगा जाए
    और मैं बच जाऊँ ....bahut khub.....

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  6. कहने वाले की मंशा गलत नहीं होती...उनकी बातों को साबित करने के लिए शायद हम बहादुर बन जाते हैं...

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  7. कभी कभी हम दिखाते हैं कि बहुत बहादुर हैं पर अंदर ही अंदर कितना डरते हैं बता नहीं सकते ... और जब यह तमगा मिल ही जाता है कि "तुम बहादुर हो " तब तो बहादुरी दिखानी ही ठहरी ...
    समय के साथ हर परिस्थिति को झेलते हुए बहादुर बनने का सिलसिला जारी ही रहता है ... अच्छी प्रस्तुति

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  8. बहुत ही अच्छा सिलसिला है जी
    वाकई में 'तुम बहादुर हो .
    आपकी प्रस्तुति अंत:करण को
    प्रकाशित कर देती है.
    बहुत बहुत आभार,रश्मि जी.

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  9. Rashmi ji...

    Harek paristhiti main milti hai...
    Usko hi hardam hai jeet...
    Drudhta se jo kare saamna...
    Jag saara chahe vipreet...

    Dar, bhay sabke andar rahte...
    Sab darte par khud na kahte..
    Vohi 'bahadur' hota jo ho...
    Safal...yahi hai jag ki reet...

    Aap nihsandeh 'bahadur' hain...

    Deepak Shukla

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  10. aksar,doosre jaisa chaahte hain...waise hum ho jaate hain ya banne ka prayaas karte hai ...bahaadur na ho kar bhi waisa dikhana...iasa hii ek prayaas hai.andar se hum bhi waakif hote hain ki jab sab humein sabse bahadur samajh rahe hote hain...us waqt andar se hum sabse kamzor....darpok hote hain

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  11. बहादुर होना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है... जब हम अमृत के पुत्र हैं तो भय किस बात का ?

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  12. सच कहा आपने, अन्ततः यह वाक्य स्वयं से ही कहना पड़ता है।

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  13. अक्सर जिंदगी ही सब कुछ सिखा देती है ।
    परिस्थितियों का सामना करना भी ।
    सुन्दर प्रस्तुति ।

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  14. ये सिर्फ परिस्थितियाँ ही हैं जो हम को हर कदम पर सिखाती चलतीं हैं ...... माँ का जिक्र बहुत प्यारा लगा .... सादर !

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  15. मैं एक डरपोक लड़की
    माँ की चूड़ियों में ऊँगली फंसाकर सोती थी
    ताकि जब भूत मुझे पकड़ने आए
    तो माँ की चूड़ियों में फंसी ऊँगली
    माँ को जगा जाए

    कोमल एहसास है इन पंक्तियों में ...!
    बहुत सुन्दर ...!

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  16. जो दूसरों को बहादुर बनाते हैं खुद भी तो बहादुर होते ही हैं !

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  17. ज़िंदगी बहुत कुछ सिखा देती है...बहुत सुंदर प्रस्तुति..

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  18. परिस्थितियां बहादुर तो बना देती हैं, हम दिखते भी हैं बहादुर पर सवाल उठता है अन्दर...
    "क्या यह सच है
    कि मैं बहुत बहादुर हूँ "

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  19. आपके बहादुर होने में किसे शक है। बेशक यह बहादुरी हममें परिस्थितियों को सामना करके ही आई है।

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  20. संगीता जी ने मेरे मन की बात कह दी……………बहादुर परिस्थितियाँ बना देती हैं मगर मन कितना कम्ज़ोर

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  21. बहुत कुछ सिखा देती है ये जिन्दगी..बहुत सुन्दर..

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  22. परिस्थितियाँ और बहादुरी का सार्थक और अदभुत प्रस्तुती.....

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  23. . कहनेवालों की नियत गलत नहीं थी
    आप सच में बहादुर हैं ...
    इस बात से आप चाहकर भी इंकार नहीं कर सकती :)

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  24. कदम-दर-कदम कुदरत अपने नियम लागू करती जाती है .....
    शुभकामनाएँ!

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  25. 'तुम बहुत बहादुर हो "...

    mujhe pata hai:D

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  26. बहुत सुंदर भाव और रचना ....
    बधाई और शुभकामनायें आपको !

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  27. बहुत सुंदर सारगर्भित रचना अच्छी लगी....

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  28. कल १७-१२-२०११ को आपकी कोई पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  29. मैं मजबूत होती गई या खाली
    इससे परे ज़िन्दगी जीती गई !
    kamma kar di........

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  30. रस्मी जी परिस्तिथियाँ सचमुच ही बहादुर बना देती है ...और कुछ नहीं तो सहने की क्षमता तोबढ़ ही जाती है ..अच्छी रचना आभार

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  31. dusro ke dwara bahadoor kahe jaane par himmat to milti hi hai bhale jeet ho ya haar. maa ki chudi pakadne waale har haath ko bahadoor ban hi jana hot ahai.

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  32. परिस्थितियाँ बहुदुर बना देती हैं या कमजोर इस बात का तो पता नहीं मगर हाँ सिलसिला जारी है और आगे भी जारी रहेगा ...... :)बहुत खूब

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  33. वाह रश्मि दी...
    भला हो नयी पुरानी हलचल का...कई पुरानी उंदर रचनाये पढने मिल जाती हैं..
    सब दिन होत न एक समान '
    मेरे भी नहीं रहे .....
    भूत तो नहीं मिला
    हाँ भूत की शक्ल में आदमी मिले
    बोलते तो लगता कह रहे हैं -
    'कच कच कच कच कच्चे खाँव '

    बहुत बहुत भायी ये कविता मुझे..
    सादर.

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