18 दिसंबर, 2011

कैसे तय होगा



जो मैं कहूँ वो तुम कहो - ज़रूरी नहीं
फिर जो तुम कहते हो वही मैं भी कहूँ - क्यूँ ज़रूरी होता है ?
मैं तो मानती हूँ कि विचारों की स्वतंत्रता ज़रूरी है
अपना अपना स्पेस ज़रूरी है
तुम भी मानते हो ...
तभी मेरी बात से अलग होकर
तुम उसे सहज मानते हो
पर मेरे अलग विचार से
तुम बिफर उठते हो !
यह तो गलत है न ?
विचारों में उम्र , स्त्री पुरुष ,
जाति धर्म का पैमाना नहीं होता
अनुभव मायने रखते हैं
लेकिन अनुभव भी उम्र के मोहताज नहीं होते !
चलो उदाहरण से समझाती हूँ -

बचपन चिंताओं से मुक्त होता है
अतीत, भविष्य के भय से कोसों दूर ...
लेकिन क्या यह अक्षरशः सत्य है ?
नहीं ,
जिन घरों में शांति नहीं होती
जिन घरों में रोटी नहीं होती
जिन घरों में धमकियां होती हैं
.... वे किसी दिन की शांति में भी डरे ही होते हैं
एक दिन भरपेट खाकर भी वे भविष्य से भयभीत रहते हैं
एक दिन कोई सर पे हाथ रखता है
तो वे बिना धमकी आशंकित होते हैं
शांति में धमाकों की आवाज़ सुनते हैं
....... तो कैसे तय होगा कि तुमने जो कहा वही सही है
मेरी या उन बच्चों की सोच गलत ?

त्योरियों पर नियंत्रण रखो
और सही जवाब दो ...

41 टिप्‍पणियां:

  1. मतभिन्‍नता के लिए जगह तो होनी ही चाहिए।

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  2. anubhav bhi umra ke mohtaaj nahi hote sarasar satya kaha.ek sateek satya.bahut achchi rachna.

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  3. एक बात सबके लिये सही हो ही नही सकती सबका परिवेश अलग होता है ………इसलिये जवाब भी अलग अलग ही होगा

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  4. कथनी, करनी और विचार सभी में संतुलन और सामंजस्य शांति बनाये रखने के लिए आवश्यक है.

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  5. विचारों में भिन्नता हो सकती है...यह सहज स्वीकार्य
    होना चाहिए|

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  6. व्यक्ती के अपने अनुभव से उसके विचारो में भी भिन्नता आ
    जाती है ,,इसलिये यह जरुरी नही कि जो बात हमारे लिये
    सही हो वो सभी के लिये हि सही हो...
    अच्छी अभिव्यक्ती

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  7. सभी के विचारो का अपना एक नजरिया होता है...... ये अपने अनुभव पर निभर करता है...... जो हमें सही लगे वो सबी कोसाही लगे ये जरुरी नही...... गहन अभिवयक्ति.....

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  8. सबको सब में जीना आये,
    मुझमें तुझमें न भरमाये।

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  9. अपना अपना स्पेस ज़रूरी है .........kash sare log ise samajh pate....

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  10. यदि यह बात समझ आ जाये तो बात ही क्या ? हर कोई खुद को ही सही समझने का दावा करता है ..

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  11. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा आज दिनांक 19-12-2011 को सोमवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  12. वे किसी दिन की शांति में भी डरे ही होते हैं
    एक दिन भरपेट खाकर भी वे भविष्य से भयभीत रहते हैं
    एक दिन कोई सर पे हाथ रखता है
    तो वे बिना धमकी आशंकित होते हैं
    शांति में धमाकों की आवाज़ सुनते हैं
    .......

    शांति तो वहीँ होती है जहाँ मन को विश्वास हो कि धमाकों में भी कोई है जो सर पर हाथ रखकर कहेगा डरों मत मैं हूँ ....डरके साये में न तो सम्मान की भावना पलती है न प्रेम

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  13. यही 'स्पेस' यदि समझ में आ गया तो स्वर्ग धरा पर उतर आये,बड़े ही सूक्ष्म बिन्दु को हाईलाइट किया है.भला अनुभव से बढ़कर क्या .....

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  14. कविता में संवाद संप्रेषण की दुरूहता को निर्भयता से रेखांकित किया गया है।
    बहुत सुंदर।

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  15. त्योरियों पर नियंत्रण किसके पास है ?
    स्वतंत्र अभिव्यक्ति की सिर्फ बात करते है
    पर सच में मन के किसी तल पर उन्हें बर्दाश नहीं
    करते है लोग ! कुछ दिन पूर्व प्रसिद्ध न्यायविद प्रशांत भूषण जी के
    चेंबर में घुसकर मारने पीटने की घटना अभी ताज़ी है !

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  16. त्योरियों पर नियंत्रण किसके पास है ?
    स्वतंत्र अभिव्यक्ति की सिर्फ बात करते है
    पर सच में मन के किसी तल पर उन्हें बर्दाश नहीं
    करते है लोग ! कुछ दिन पूर्व प्रसिद्ध न्यायविद प्रशांत भूषण जी के
    चेंबर में घुसकर मारने पीटने की घटना अभी ताज़ी है !

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  17. सही जवाब ... बहुत गंभीर बात है
    लेकिन विचारणीय भी ...

    लेखन की सशक्‍तता हर शब्‍द में मुखर हो रही है
    ...आभार इस बेहतरीन अभिव्‍यक्ति के लिए ।

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  18. बहुत सटीक अभिव्यक्ति ..
    रिश्तों में वैचारिक स्वतंत्रता ही एक दुसरे के प्रति सही मायने में प्रेम और आदर भाव उत्पन्न करती है....
    बहुत सुन्दर रचना.

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  19. सार्थक संवाद करती रचना पर्सनल स्पेस देना माने दूसरे के विचारों का सम्मान करना उसे विमत की मोहलत देना .

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  20. बिलकुल सही कहा आपने पूरी तरह से सहमत हूँ !
    सुंदर प्रस्तुति !
    आभार !

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  21. सोचने की जहमत ही कहाँ करता है कोई.

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  22. सही कहा है स्पेस बहुत जरूरी है ... खुल के सांस लेने के लिए ... प्यार करने के लिए भी ..

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  23. रश्मि जी, सदा की तरह एक सशक्त कृति. इस जग में कुछ भी अटल सत्य जैसा नहीं सब सापेक्ष है... हर किसी को अपने अपने रास्ते से सत्य तक पहुंचने का प्रयास करना है...

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  24. खुबसूरत रचना , खासकर ये लाइनें :-
    विचारों में उम्र , स्त्री पुरुष ,
    जाति धर्म का पैमाना नहीं होता
    अनुभव मायने रखते हैं
    or
    त्योरियों पर नियंत्रण रखो
    और सही जवाब दो !

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  25. अनुभव मायने रखते हैं
    लेकिन अनुभव भी उम्र के मोहताज नहीं होते !
    पूर्णतया सहमत हूँ आपके विचारों से...गहन अभिवयक्ति.....

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  26. यहाँ त्यौरियां ही तो सबसे ज्यादा अनियंत्रित हैं दी....
    सुन्दर रचना....
    सादर...

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  27. अपनी रचना के माध्यम से बहुत ही सही सन्देश दिया है आपने ......

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  28. पूरक ...में ही पूर्णत का आभास जरुरी है

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  29. sach hai mam anubhav bhi umra ke mohtaj nahi hote .par ye sab kaha samajhate hai.........hamesha ki tarah superb poetry.

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  30. बिलकुल सही कहा आपने..बहुत सटीक अभिव्यक्ति ..आभार..

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  31. बहुत ही सटीक प्रश्न उठाये हैं.

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  32. बहुत सुन्दर ..हर बात के मायने सभी के लिए अलग अलग होते हैं ....

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  33. सन्देश देती सुंदर रचना,...बेहतरीन पोस्ट

    काव्यान्जलि ...: महत्व .....

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  34. एक का सही दूसरे का गलत हो सकता है ... सलीब अपनी अपनी । सुंदर रचना

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  35. हर कोई एकसा नहीं होता इसलिए एक सा सोच भी नहीं सकता तो ज़हीर है जवाब भी अलग-अलग ही होंगे बशर्ते॥ लोग सोचने का कष्ट तो करें ....

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