29 मई, 2012

अपनी तलाश में - ऐसी हूँ मैं !



मैं गले की तरह रुंध जाती हूँ
बन जाती हूँ सिसकियाँ
चित्रित हो जाती हूँ
आंसुओं के धब्बों सरीखे !
हो जाती हूँ सर्वशक्तिमान
सिसकियों के मध्य से उठाती हूँ जज्बा
और आंसुओं को हटाकर
मुस्कान का आह्वान करती हूँ !
मैं हो जाती हूँ खुद रहस्य
और उन रहस्यों का करती हूँ सामना
जो विघ्न के उद्देश्य से
छद्म रूप धरते हैं !
मैं बन जाती हूँ बारिश की बूंदें
धरा के अंतस्तल तक पहुँचती हूँ
उसके भावों को पढ़ती हूँ
उसकी ताप को शीतलता देती हूँ !
एक धवल बादल बन
करती हूँ आकाशीय परिक्रमा
निशा में विचरते ग्रह नक्षत्रों से
चाँद तारों से
सूरज और उसकी किरणों से
तादात्म्य जोड़ती हूँ !
जीवन की परिभाषा इन्द्रधनुष में पाती हूँ
जो क्षणांश के लिए आकाश पर उभरता है
जब तक अर्थ लूँ
सारे रंग गायब ....
बस इतनी स्मृति शेष होती है
कि सात रंग हैं जीवन के
जो क्षणिक हैं !
एक इन्द्रधनुष के लिए
मुसलाधार बारिश होती है
यूँ ही कभी दिखे - ऐसा कम होता है ...
तो दर्द जब गहरा होता है
हिम्मत जब जवाब देने लगती है
तो सात रंग उतरते हैं कुछ पल के लिए
मैं उन रंगों को सोख बनती हूँ इन्द्रधनुष
ताकि जब कोई हौसला अवश शिथिल कहीं बैठा मिले
तो मैं इन्द्रधनुष दे सकूँ
कभी समय से पहले
कभी समय के बाद ...
जब तक मैं हूँ
मैं खुद में एक आविष्कार करती हूँ
.....
ऐसी हूँ मैं !

32 टिप्‍पणियां:

  1. मैं उन रंगों को सोख बनती हूँ इन्द्रधनुष
    ताकि जब कोई हौसला अवश शिथिल कहीं बैठा मिले
    तो मैं इन्द्रधनुष दे सकूँ

    इस आविष्कार में आप कितनी सफल हैं...यह शायद आपको भी नहीं मालूम!!!

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  2. हो जाती हूँहैं सर्वशक्तिमान ....
    सिसकियों के मध्य से उठाती हूँहैं जज्बा
    जीवन की परिभाषा इन्द्रधनुष में पाती हूँहैं
    जो क्षणांश के लिए आकाश पर उभरता है
    मैंवे उन रंगों को सोख बनती हूँहैं इन्द्रधनुष
    ताकि जब कोई हौसला अवश शिथिल कहीं बैठा मिले
    तो मैंवे इन्द्रधनुष दे सकूँसकें
    उत्तम सोच की अद्धभुत अभिव्यक्ती .... !!

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  3. अपने अन्दर की तलाश ही सबसे कठिन होती है । आपने बडी सच्चाई के साथ एक गहन प्रयास किया है । बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  4. बस इतनी स्मृति शेष होती है
    कि सात रंग हैं जीवन के
    जो क्षणिक हैं !...

    आपके इन्द्रधनुष में तो १४ रंग हैं दी......

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  5. अपने मनोभावों को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं बहुत बढिया रचना है बधाइ\

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  6. स्त्री का अस्तित्व ऐसा ही है... इंद्रधनुष बनकर बिखरती है धुले आसमान में.. खुद तपकर शीतलता देती है, खुद आंसुओं में धुलकर मुस्कुराहट देती है.. मनुष्य के जीवन के सात रंग उसी में समाहित हैं..

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  7. हो जाती हूँ सर्वशक्तिमान
    सिसकियों के मध्य से उठाती हूँ जज्बा
    और आंसुओं को हटाकर
    मुस्कान का आह्वान करती हूँ !
    मैं हो जाती हूँ खुद रहस्य

    बहुत सुंदर और अद्भुत काव्या! आभार इस सुंदर श्रंखला के लिये...

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  8. ताकि जब कोई हौसला अवश शिथिल कहीं बैठा मिले
    तो मैं इन्द्रधनुष दे सकूँ
    कभी समय से पहले
    कभी समय के बाद ...
    हर रंग में जिन्‍दगी है जिन्‍दगी के साथ ...
    कल 30/05/2012 को आपकी इस पोस्‍ट को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    '' एक समय जो गुज़र जाने को है ''

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  9. मैं उन रंगों को सोख बनती हूँ इन्द्रधनुष
    ताकि जब कोई हौसला अवश शिथिल कहीं बैठा मिले
    तो मैं इन्द्रधनुष दे सकूँ

    .....बहुत खूब! एक सशक्त अभिव्यक्ति...आभार

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  10. मैं उन रंगों को सोख बनती हूँ इन्द्रधनुष
    ताकि जब कोई हौसला अवश शिथिल कहीं बैठा मिले
    तो मैं इन्द्रधनुष दे सकूँ

    यही तो है जीवन का परम सत्य, हौसला शिथिल न हो तो फैसले सजीव हो उठते है

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  11. हो जाती हूँ सर्वशक्तिमान
    सिसकियों के मध्य से उठाती हूँ जज्बा
    और आंसुओं को हटाकर
    मुस्कान का आह्वान करती हूँ !
    मैं हो जाती हूँ खुद रहस्य...एक अंतहीन तलाश की गहन अभिवयक्ति......

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  12. यही हिम्मत और होंसला इंसान को आगे बढाता है
    सार्थक सोच इन सब के लिए आवश्यक होता है,
    आप ऐसी ही रहें

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  13. मन के भावों को बाँध कर एक सकारात्मक अभिव्यक्ति.

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  14. मैं उन रंगों को सोख बनती हूँ इन्द्रधनुष
    ताकि जब कोई हौसला अवश शिथिल कहीं बैठा मिले
    तो मैं इन्द्रधनुष दे सकूँ!!
    वाकई आप ऐसा करती है ...मैं भी बढ़ू और मेरे साथ और लोंग भी , आप ऐसी ही हैं !

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  15. कमाल का पोर्ट्रेयल है खुद का.. बहुत ही सुन्दर!! परसों निकल रहा हूँ दीदी..देखिये कब फिर जुड पाता हूँ.. आशीष दें!!

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  16. umda umda umda aur umda....jab bhi aapka likha padti hoon..tab tab apne antarmann mein jhaakne kagti hoon..

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  17. इन्द्रधनुष सी ना जाने कितने ही रंग खुद में समेटे
    स्त्री सदा खुद में आविष्कार करती रहती है..
    कभी दुःख में ख़ुशी बनकर
    कभी सहारा बनकर.. एक सुन्दर भावना बनकर,
    कभी शक्ति बनकर , और जब काली छाया घेरती है
    तो वो देती है एक नया रंग...
    बेहद खुबसूरत गहन भाव व्यक्त करती बेहतरीन रचना:-)

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  18. शब्दातीत प्रशंसनीय काव्य..

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  19. आपकी खुद की तलाश की ये यात्रा अद्बुत अनुभवों से भरी रही..

    बहुत ही प्रेरणास्पद, विचारणीय प्रस्तुति. कुछ हद तक हमें भी मजबूर कर रही तलाशने को अपना असली चेहरा और असली मंजिल भी.

    शुभकामनायें.. आप कामयाबी के शिखर तक पहुंचें.

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  20. बहुत ही खूबसूरती से गूढ़ भावों को अभिव्यक्त करती खुबसूरत रचना दी...
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  21. मैं उन रंगों को सोख बनती हूँ इन्द्रधनुष
    ताकि जब कोई हौसला अवश शिथिल कहीं बैठा मिले
    तो मैं इन्द्रधनुष दे सकूँ
    कभी समय से पहले
    कभी समय के बाद ...
    जब तक मैं हूँ
    मैं खुद में एक आविष्कार करती हूँ
    .....
    ऐसी हूँ मैं !
    ...aapse bahut prerana milti hai.. bahut achhi-sachhi hai aap..
    sundar prerak rachna prastuti hetu aabhar!

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  22. गूढ़ अभिव्यक्ति.....वाह !!!!!!!!!


    सिलसिला अनवरत रोजाना
    खुद की तलाश में खो जाना
    खुद से खुद को शिकवा न रहे
    जीते जी खुद को खोजा ना.

    उत्तर देंहटाएं
  23. हिम्मत जब जवाब देने लगती है
    तो सात रंग उतरते हैं कुछ पल के लिए
    मैं उन रंगों को सोख बनती हूँ इन्द्रधनुष
    ताकि जब कोई हौसला अवश शिथिल कहीं बैठा मिले
    तो मैं इन्द्रधनुष दे सकूँ
    कभी समय से पहले
    कभी समय के बाद ...
    जब तक मैं हूँ
    मैं खुद में एक आविष्कार करती हूँ
    .....

    वाह वाह इंद्रधनु, की ही तरह खूबसूरत अर्थपूर्ण रचना ।

    उत्तर देंहटाएं
  24. तो दर्द जब गहरा होता है
    हिम्मत जब जवाब देने लगती है
    तो सात रंग उतरते हैं कुछ पल के लिए

    बिकुल सत्य है दुःख के पीछे ही कहीं सुख है बस नज़र को फिराने की ही देर है ।

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  25. बहुत सुंदर हमेशा की तरह ....

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  26. हाँ काम वाली की बातों में होतें हैं शब्दों के अपने अक्श ,अनुगूंज और तलाश अपने होने की ...बहुत ही बढ़िया भावाभिव्यक्ति ..... .कृपया यहाँ भी -

    .


    बृहस्पतिवार, 31 मई 2012
    शगस डिजीज (Chagas Disease)आखिर है क्या ?
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    माहिरों ने इस अल्पज्ञात संक्रामक बीमारी को इस छुतहा रोग को जो एक व्यक्ति से दूसरे तक पहुँच सकता है न्यू एच आई वी एड्स ऑफ़ अमेरिका कह दिया है .
    http://veerubhai1947.blogspot.in/

    उतनी ही खतरनाक होती हैं इलेक्त्रोनिक सिगरेटें
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    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं
  27. मैं उन रंगों को सोख बनती हूँ इन्द्रधनुष
    ताकि जब कोई हौसला अवश शिथिल कहीं बैठा मिले
    तो मैं इन्द्रधनुष दे सकूँ
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ .....जीने की इक्षा से ओतप्रोत कविता .....

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छोड़ कैसे दूँ उस छोटे से कमरे में जाना जहाँ पुरानी शीशम की आलमारी रखी है धूल भले ही जम जाए जंग नहीं लगती उसमें  ... ! न उसमे...