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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

01 फ़रवरी, 2014

एक और दिन जी जाने की मुहर




दरवाजे रोज खोलती हूँ
फिर भी जंग लगे हैं
शायद - इसलिए कि -
मन के दरवाजे नहीं खुलते !!!
तभी, अक्सर
ताज़ी हवाओं का कृत्रिम एहसास होता है
दम घुटता है
कुछ खोने की प्रक्रिया में !
कुछ खोना नहीं चाहता मन
पर इकतरफा पकड़ भी तो नहीं सकता
और  … मैं
प्रत्याशा की भोर में
खोलती हूँ सारे दरवाजे
बहुत शोर होता है
पंछी उड़ जाते हैं भयाक्रांत
मन की हथेली पर रखे दाने
रखे ही रह जाते हैं
.... सोचती हूँ,
बंद रहना,जंग खाना
अपनी विवशता का परिणाम है
या इनके हिस्से की नियति है यह !
वजह जो भी हो,
मैं हर दिन उम्मीदों की तलाश लिए
सोच की धुंध से लड़ती हूँ
ठंड लगने लगती है
शरीर अकड़ जाता है
मन कुम्हला जाता है
पर - मैं हार नहीं मानती !
बचपन से अब तक
आशाओं की चादर बड़ी घनी बुनी है
सिलाई उधड़े
- सवाल ही नहीं उठता !
जानती हूँ
मानती हूँ
रिश्ते बेरंग हों
तो उनको कोई शक्ल देना
बहुत मुश्किल है
अपनी जद्दोजहद से अलग
अपनों के सवालों की जद्दोजहद से भी गुजरना पड़ता है
बार-बार कटघरे में
एक ही जवाब देते-देते ऊब जाता है मन
साँचे में भी रखा रिश्ता
आकारहीन, बेशक्ल हो जाता है
और -
फिर,
अपना ही घर अजायबघर लगता है
चरमराते खुलते दरवाजे की आवाज से
माथे पर पसीना छलछला उठता है
....
कई बार सोचता है मन
कि आज धूप से कट्टी कर लूँ
पर - सुबह,दिन,शाम,रात से परे
जिंदगी खिसकती नहीं
उलझन ही सही -
वो भी ज़रूरी है
एक और दिन जीने के लिए
जी जाने की मुहर लगाने के लिए !!!

30 टिप्‍पणियां:

  1. आशा और निराशा के बीच छुपी है कहीं जीवन जीते रहने की बस एक वजह .....!!वही तो चाहिए ...!!बहुत सुंदर उद्गार दी ....!!

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  2. क्या कहूं..! सफल अभिव्यक्ति की प्रशंसा करूँ या कि अवसाद के इन पलों को भूल धूप-छाँव से मिठ्ठी करने की सलाह दूँ? समझ में नहीं आ रहा।

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  3. मन के जंग लगे किवाड़ों की चरमराहट उष्णता आने नहीं देती रिश्तों में !
    उदास सी रचना कुछ समय की अनुभूतियों में ही जन्मी होगी , शेष तो आशा का समन्दर है !
    चित्र बहुत प्यारा है !

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  4. रिश्ते,
    बड़े अजीब होते है ये रिश्ते
    न हम उनकी अपेक्षाओं पर
    खरे उतरते है न वे हमारी
    अब रिश्तों के साथ तो
    कोई उपाय नहीं कुछ
    करने का न कुछ होने का
    अगर कुछ करना ही है तो
    हमारे मन रूपी दरवाजे को
    जंग लगने से बचाना है
    ताकि सूरज की ताजी
    किरणे भीतर आ सके … !
    आज मन को छू गयी यह रचना !

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  5. दरवाजा खोलना
    और वो भी रोज
    जरूरी भी तो होता है
    क्या पता किसी
    दिन कोई सच में
    आ जाये हवा
    बनकर और
    बंद दरवाजा
    पा लौट जाये
    आता नहीं है
    कोई भी कभी
    फिर भी हाथ
    में मुहर रख
    इंतजार करने
    में भी कोई
    बुराई नहीं है :)

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  6. दरवाज़े कितने अजीब होते हैं न रास्ता बनाते भी हैं और बंद भी करते हैं | गहन भाव |

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  7. अंत भला तो सब भला
    समय गुजर जाता है
    यादें दामन मे देकर
    हार्दिक शुभकामनायें

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  8. बार-बार कटघरे में
    एक ही जवाब देते-देते ऊब जाता है मन
    साँचे में भी रखा रिश्ता
    आकारहीन, बेशक्ल हो जाता है
    और -
    फिर,
    अपना ही घर अजायबघर लगता है !
    आपकी लेखनी से निकल हर शब्द नये अर्थों को जीने लगता है और पहले से अधिक मूल्यवान हो जाता है ! बहुत सुंदर रचना !

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  9. मन कुम्हला जाता है
    पर - मैं हार नहीं मानती !
    बचपन से अब तक
    आशाओं की चादर बड़ी घनी बुनी है
    सिलाई उधड़े
    - सवाल ही नहीं उठता !
    ये ज़ज्बा यूँ ही क़ायम रहे .... आमीन !!!!

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  10. ठंड लगने लगती है
    शरीर अकड़ जाता है
    मन कुम्हला जाता है
    पर - मैं हार नहीं मानती !
    बचपन से अब तक
    आशाओं की चादर बड़ी घनी बुनी है
    सिलाई उधड़े
    - सवाल ही नहीं उठता !............लाजवाब.......

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  11. dil ke anginat bhaw chhupe hain ...aapki is rachna me rashmi jee ....

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  12. मैं हर दिन उम्मीदों की तलाश लिए
    सोच की धुंध से लड़ती हूँ
    ठंड लगने लगती है
    शरीर अकड़ जाता है
    मन कुम्हला जाता है
    पर - मैं हार नहीं मानती !
    ...सच जब तक साँस तब तक आस नहीं छोड़नी चाहिए इंसान को ,,..
    बहुत सुन्दर प्रेरक रचना ..

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  13. काफी उम्दा प्रस्तुति.....
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (02-02-2014) को "अब छोड़ो भी.....रविवारीय चर्चा मंच....चर्चा अंक:1511" पर भी रहेगी...!!!
    - मिश्रा राहुल

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  14. अपने आप रातों में/चिलमनें सरकती हैं
    चौंकते हैं दरवाज़े/सीढियाँ धड़कती हैं!!
    अपने आप!!
    / चाहे कितना भी ज़्नग लगा हो मन के दरवाज़ों में... आशा अपने आप सारे दरवाज़े खोल देती है!!
    बहुत गहराई से आप भावो6 को अभिव्यक्त करती हैं!!

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  15. आशा और निराशा के बीच झूलते रिश्ते कभी बन जाते हैं अवसाद और कभी आशा जीने की..आशा और निराशा के बीच झूलती रिश्तों का कटु सत्य दर्शाती बहुत उत्कृष्ट प्रस्तुति.....
    उलझन ही सही -
    वो भी ज़रूरी है
    एक और दिन जीने के लिए
    जी जाने की मुहर लगाने के लिए !!!
    ...और शायद यही जीवन का सत्य है...

    उत्तर देंहटाएं
  16. आपकी इस प्रस्तुति को आज की कल्पना चावला की 11 वीं पुण्यतिथि पर विशेष बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  17. प्रत्याशा की भोर में
    खोलती हूँ सारे दरवाजे
    बहुत शोर होता है
    पंछी उड़ जाते हैं भयाक्रांत
    मन की हथेली पर रखे दाने
    रखे ही रह जाते हैं..................

    अतिसुन्दर दी......
    सादर
    अनु

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  18. इतना कुछ हो जाने पर भी मन उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ता और छोड़ना भी नहीं चाहिए ....गहन भाव लिए बहुत ही सुंदर भवाभिव्यक्ति ....

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  19. कई बार सोचता है मन
    कि आज धूप से कट्टी कर लूँ
    पर - सुबह,दिन,शाम,रात से परे
    जिंदगी खिसकती नहीं
    उलझन ही सही -
    वो भी ज़रूरी है
    एक और दिन जीने के लिए
    जी जाने की मुहर लगाने के लिए !!!
    इसी से मिलती जीवन को निरंतरता ...बहुत सुन्दर !
    New post Arrival of Spring !
    सियासत “आप” की !

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  20. हर दिन जीने का आग्रह, जीवन जीने की संवेदना

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  21. उलझन ही सही -
    वो भी ज़रूरी है
    एक और दिन जीने के लिए ....bahut sunder !

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  22. मन के बंद दरवाजों पर भले ही जंग लगा हो पर आप रोज़ भोर होते ही खोलने का प्रयास करती हैं चरमराहट की आवाज़ भले ही आये पर खुल तो जाते हैं दरवाज़े .... और उम्मीद की किरण मन को कर देती है उत्साहित . बहुत सुन्दर रचना

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  23. आशा ओर निराशा के बीक ह भी जीवन है जो चलता रहता है ...

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  24. जीवन के हर गुजरते पलों में आशा और निराशा का संचार होता है
    जूझना तो पड़ता है-----आशा और निराशा कि पड़ताल करती अनुभूति-----


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  25. जीवन में संघर्ष किन किन रूपों में सामने आता है, पर इनके आगे न झुकना ही जीवन है...
    बचपन से अब तक
    आशाओं की चादर बड़ी घनी बुनी है
    सिलाई उधड़े
    - सवाल ही नहीं उठता !

    बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना, बधाई.

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  26. जो कुम्हला जाये उसी का नाम तो मन है..मन तो अपना काम ठीक से ही करता है..हम ही हैं वह कमल जो कभी नहीं कुम्हलाता..

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