09 सितंबर, 2016

"खिड़की से समय"





















कई बार बहुत कुछ ऐसा होता है, जो जानबूझकर नहीं होता, पर हम मान लेते हैं और दुखी हो जाते हैं  ,,, पर, इस दुखी होने में भी बहुत फर्क है, एक में हम चुप्पी साध लेते हैं और संबंधों की इतिश्री कर लेते हैं, जो दरअसल सिर्फ इम्तिहान पर टिके होते हैं,  ... पर एक दुःख में हम शिकायत कर लेते हैं, जो अधिकार है।
कुछ ऐसा ही अधिकार जताया अरुण चन्द्र राय ने  ... कुछ इस तरह,

"namaskar rashmi ji.. apne meri kitab par ek shabd bhi nahi kahe... और विडम्बना देखिये  कि मेरी औसत सी कविताओं के संग्रह को फेमिना ने साल के चुनिंदा किताब में शामिल कर लिया है।  बधाई तो दे दीजिये। "
बधाई तो मैंने दी थी, लेकिन खिड़की से बाहर समय इतनी द्रुत गति से चल रहा था मेरी अपनी जिम्मेदारियों के मध्य कि मुझे याद नहीं रहा कि उन्होंने अपनी किताब "खिड़की से समय" मुझे भेजी थी, पता मैंने ही दिया था  ... लेकिन नानी / दादी बनने के क्रम में सब भूल गई थी।  

अरुण जी ने ही याद दिलाया कि किताब तो जनवरी में ही आपने पाने की सूचना दी थी, शर्मिंदा भी हुई लेकिन एक अनुभवी ही खिड़की से समय को देखता है और दूसरे के समय को समझ पाता है !  ... खैर, जहाँ मैं किताबों को सहेजकर रखती हूँ, वहाँ से इस किताब को निकाला, सच कहूँ  - थोड़ा डर लगा था, कहीं मैंने खो तो नहीं दिया।  अपनी तरफ से मैं कभी कोई ग़लतफ़हमी नहीं बुनना चाहती, बन जाए तो दुःख होता है !
अरुण जी ने इस किताब में बड़े स्नेह से लिखा है,
"खिड़की से आता हुआ समय
लेकर आता है
नई रौशनी
नई आशाएँ
नई उम्मीद  ...
इस किताब को मैं कैसे भूल गई !

समीक्षा तो मैं करती नहीं, बस अनुरोध करुँगी सबसे कि "खिड़की से समय" को पढ़िए  कील पर टँगी बाबूजी की कमीज से रूबरू होइए    ...
हर रचना में अरुण के जीए हुए पल उभर कर आये हैं,

ज्योतिपर्व प्रकाशन से प्रकाशित इनकी पहली कविता संग्रह "खिड़की से समय" को फेमिना हिंदी ने साल के बेहतरीन कविता संग्रह के रूप में चुना है और सितंबर माह में कवर स्टोरी में स्थान दिया है।

ईश्वर आपकी कलम को और निखारे :)

3 टिप्‍पणियां:

  1. अरूण जी को बहुत बहुत बधाई । उनका लिखा वैसे भी समय का एक हस्ताक्षर ही होता है । शुभकामनाएं उनको ।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (11-09-2016) को "प्रयोग बढ़ा है हिंदी का, लेकिन..." (चर्चा अंक-2462) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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प्रभु

देनेवाले, तेरा दिया तुझे ही देकर सब बहुत खुश हैं ! सोने से तुम्हें सजाकर डालते हैं एक उड़ती दृष्टि अपने इर्दगिर्द और मैं तोते की...