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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

29 सितंबर, 2016

आदिशक्ति



माँ कमज़ोर नहीं होती
लेकिन माँ माँ होती है
एक तरफ मोम सी आँखें पिघलती हैं ज़रूर
पर यकीनन वह अँधेरे से लड़ती है  ... !
डर जाना
डर लगना तो एक आम बात है
लेकिन आग के दरिया को
वह हर हाल में पार करती है
...
माँ अपने आप में दुआओं का धागा है
मन्नत पूरा करनेवाला वृक्ष भी स्वयं
बाँध देती है अपने आप को
हर तने से
अधूरे मन्त्रों का जाप
वह इतनी निष्ठा से करती है
कि सरस्वती खुद
साथ साथ मंत्रोच्चार करती हैं

माँ ध्यानावस्थित होती है
चलायमान दिखती है
महिषासुर का वध करती है
गणेश की रचना करती है
माँ प्रकृति के कण कण से
आशीषों का शंखनाद करती है
.... बावजूद इसके
वह दिखती है कई बार काँपती हुई
लेकिन गौर करना -
हर कम्पन में रक्षा मन्त्र होता है
तभी तो
वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की आदिशक्ति है।

11 टिप्‍पणियां:

  1. माँ माँ होती है इसके आगे कहने के लिये कुछ नहीं होता है
    बहुत सुन्दर ।

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  2. हर कम्पन में रक्षा मन्त्र होता है...बाँध देती है,बिलकुल सही

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  3. माँ शक्ति स्वरूपा है ...उसके हर क्रियाकलाप में रक्षा सूत्र पिरोया होता है .

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  4. माँ तो बस माँ होती है! फिर तो जितने भी गुणों का बखान कोइ करे, सब उसमें ही हैं!

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  5. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (01-10-2016) के चर्चा मंच "आदिशक्ति" (चर्चा अंक-2482) पर भी होगी!
    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. आदिशक्ति को शतशत नमन..नवरात्रि के शुभ अवसर पर सुंदर रचना..

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  7. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "भाखड़ा नंगल डैम पर निबंध - ब्लॉग बुलेटिन“ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  8. माँ क्या होती है और अपने बच्चों के लिए क्या - क्या हो सकती है यह कल्पना से परे है ! आदि शक्ति माँ को - शत शत प्रणाम ! नव रात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं आपको भी और सभी पाठकों को भी ! बहुत ही सुन्दर रचना !

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  9. माँ जब रचती-सँवारती है तो उसकी दृढ़ता भी वात्सल्य की कोमलता से भर जाती है. सुन्दर प्रस्तुति .

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  10. अचिन्तयरूपा बस माँ ही हो सकती हैं ।

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