07 सितंबर, 2016

अंदर की कमज़ोरी कठोर ही जानता है




कमज़ोर होना नहीं चाहना
वैसा ही है
जिस तरह -
वृद्धावस्था,
रुग्णता,
मृत्यु से विक्षुब्ध सिद्धार्थ
मोहबंध से निकल गए
यशोधरा और राहुल को छोड़कर
!!!
क्या सच में ?
मन के भीतर
इस रिश्ते से निकल सके सिद्धार्थ बुद्ध होकर ?

निकल जाते तो ज्ञान पाकर
घर न लौटते
यशोधरा की व्यथा की फटकार न सुनते
राहुल को
यशोधरा को
अपने साथ न ले जाते !

ज्ञान सत्य का था
बुद्ध को सत्य मिला
सत्य मृत्यु है
जीवन क्षणिक है
तो मोहबंध भी एक सत्य है
जो कमज़ोर बनाता ही है
ऊपर की कठोरता
कुछ भी कहे
अंदर की कमज़ोरी कठोर ही जानता है
नारियल की तरह  ...

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सधी हुई बात. एक बहुत ही संवेदनशील विन्दु के प्रतीक के माध्यम से बहुत ही खूबसूरती से अपनी बात कही है.
    बेहतरीन बात!!

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  2. सत्य स्वीकारता नहीं है फिर भी हर कोई
    आभासी आभासों में जीने वाला हर आदमी

    बहुत सुन्दर ।

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  3. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 08 सितम्बर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 08-09-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2459 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  5. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन नीरजा भनोट और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  6. जीवन के अंतिम सत्य को स्वीकारना ही पड़ता है।
    सचमुच "ऊपर की कठोरता
    कुछ भी कहे
    अंदर की कमज़ोरी कठोर ही जानता है
    नारियल की तरह ..."

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  7. ऊपर की कठोरता भी एक आवरण है जिसमें से मानव-सहज कमज़ोरी खनक ही जाती है.

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  8. बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको . कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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  9. अपने हजारों शिष्यों की तरह बुद्ध ने उन्हें भी दीक्षित किया इसलिये ले गये होंगे न कि मोह के कारण..

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