17 अक्तूबर, 2016

उम्मीद ज़िंदा है




जहाँ भी उम्मीद की छाया दिखती है
साँकल खटखटा ही देती हूँ
सोचती हूँ एक बार
खटखटाऊँ या नहीं
लेकिन अब पहले जैसी दुविधा देर तक नहीं होती
उम्र की बात है - !

यौवन की दहलीज़ पर
होठ सिल ही जाते हैं
भय भी होता है
... जाने क्या हो !
"ना"
या कोई भी जवाब नहीं मिलना
मन को कचोटता है
खुद पर विश्वास कम होता है !

उम्र की बरगदी जड़ें
अब भयभीत नहीं करतीं
मेरे अंदर कुछ पाने की धुन है
और कब कहाँ से
कौन सी धुन
मेरी जिजीविषा की प्यास बुझा दे
सोचकर
हर दिन कोई अनजान साँकल खटखटा देती हूँ
उम्मीद ज़िंदा है
कब अमर हो जाए
क्या पता  ...

14 टिप्‍पणियां:

  1. उम्मीदें
    जिंदा
    रहें
    फुलें
    फलें
    बिखरें
    बिखेरें
    खुश्बुएं ।

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  2. उम्र की बात .... अनुभव का साथ
    लाजवाब लेखन !

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  3. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 19 अक्टूबर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. इंसान के साथ हर पल उम्मीद रहती ही है... बहुत सुंदर रचना

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  5. उम्मीद ज़िंदा है
    कब अमर हो जाए
    क्या पता ...
    बहुत सुंदर ....

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  6. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (19-10-2016) के चर्चा मंच "डाकिया दाल लाया" {चर्चा अंक- 2500} पर भी होगी!
    करवाचौथ की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  7. उम्र की बरगदी जड़ें
    अब भयभीत नहीं करतीं
    मेरे अंदर कुछ पाने की धुन है
    और कब कहाँ से
    कौन सी धुन
    मेरी जिजीविषा की प्यास बुझा दे
    सोचकर
    हर दिन कोई अनजान साँकल खटखटा देती हूँ
    उम्मीद ज़िंदा है
    कब अमर हो जाए
    क्या पता ...

    बहुत सुन्दर
    उम्र के साथ तजुर्बा बढ़ जाता है असमंजस भी नहीं रहता
    .. उम्मीद पर दुनिया कायम है ..

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  8. यौवन की दहलीज़ पर
    होठ सिल ही जाते हैं
    भय भी होता है
    ... जाने क्या हो !
    "ना"
    या कोई भी जवाब नहीं मिलना
    मन को कचोटता है
    खुद पर विश्वास कम होता है !

    यौवन के दौर में अंतर्द्वंद्व कुछ अधिक होता है, कठिन होता है स्थिति को समझ पाना.

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  9. सांकल का खटखटाया जाना ही ज़रूरी है... बहुत सुन्दर बात कही है दीदी!!

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  10. सच कहा आपने पढ़कर लगा कि उम्मीद जिन्दा है!

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  11. बहुत ही वास्तविक सोच. Congrats!

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