09 अगस्त, 2008

लहरें.........




( १ )


मैं कोई लहर नहीं
जो आकर लौट जाऊँ....
बालू का घरौंदा भी नहीं
जिसे तोड़ दिया जाए.......
मैं मन हूँ,
मैं आंगन हूँ,
जो बचपन की आंखों में पनाह लेता है
और कभी नहीं खोता .......
तुम जब तक समझ पाओ-
ये पास आ जाता है,
फिर लम्बी बातें करता है
लंबे-लंबे रास्तों की
लम्बी-लम्बी यादों की.........

( २ )
लहरें मेरे अन्दर भी उठती हैं
घरौंदे कभी उसकी गिरफ्त में आते हैं
कभी रह जाते हैं !
कभी मोती
तो कभी दर्द के नक्शे कदम मिल जाते हैं!
डुबोया तो जाने कितना कुछ
पर लहरों के संग
वापस चले आते हैं.......
रात के सन्नाटे में
लहरों का शोर!!!
थपकियाँ देती हूँ खुद को ,
पर नींद-लहरें बहा ले जाती हैं !
...........
क्या करूँ इन लहरों का ?!

17 टिप्‍पणियां:

  1. kya kahoon laharon par ? ek baar phir bas maun rah gaya mere pas dene ko is kavita ko

    soch sakta hoon is kavita ko par shabd nahe emilnege ki tareef men kya kahoon aaj phir bas sar jhuke leta hoon aaj manir jana bhee nahee hua tha

    Anil

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  2. बहुत ही मार्मिक रचना है ...
    पता नहीं क्या बोलूं क्या कहूं क्या लिखूं इस रचना के ऊपर शब्द नहीं मिल रहे......

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  3. रात के सन्नाटे में
    लहरों का शोर!!!
    थपकियाँ देती हूँ खुद को ,
    पर नींद-लहरें बहा ले जाती हैं !
    ~~~
    har baar ki trah is baar bhi ek umda rachna ko likhna aap jisa vyktiv hi rach pata hai aap ki neend achhi hogi kyun ki lahro ko bhi raah badlani hogi aap ko parnam

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  4. main man hun, main aangan hun, jo bachpan ki aankhon me panah leta hai......... bahut sunder

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  5. डुबोया तो जाने कितना कुछ
    पर लहरों के संग
    वापस चले आते हैं.......
    रात के सन्नाटे में
    लहरों का शोर!!!
    थपकियाँ देती हूँ खुद को ,
    पर नींद-लहरें बहा ले जाती हैं !
    ...........
    क्या करूँ इन लहरों का ?!


    sach kahoon to main bhee maun hoon...
    aur soch rahee hoon..... apane amdar uthtee laharon kaa main bhee kyaa karoon.....??

    shubh-kamnaen....aise hee likhtee rahen......

    sa-sneh
    gita pandit

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  6. Behad Khoobsurat abhivyakti.
    मैं मन हूँ,
    मैं आंगन हूँ,
    जो बचपन की आंखों में पनाह लेता है
    और कभी नहीं खोता .......
    तुम जब तक समझ पाओ-
    ये पास आ जाता है,
    फिर लम्बी बातें करता है
    लंबे-लंबे रास्तों की
    लम्बी-लम्बी यादों की.........
    Badhaii !

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  7. लहरें मेरे अन्दर भी उठती हैं
    घरौंदे कभी उसकी गिरफ्त में आते हैं
    कभी रह जाते हैं !
    कभी मोती
    तो कभी दर्द के नक्शे कदम मिल जाते हैं!
    रशिम जी जिन्दगी इसी का तो नाम हे जिसे आप नेअपनी कवितामे शव्दो मे ढाला हे ,बहुत सुन्दर भाव, धन्यवाद

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  8. रात के सन्नाटे में
    लहरों का शोर!!!
    थपकियाँ देती हूँ खुद को ,
    पर नींद-लहरें बहा ले जाती हैं !
    ...........
    क्या करूँ इन लहरों का ?!


    --बहुत उम्दा.

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  9. mai janta hoon,mam,aapke aage badh rahe kadam piche nahi ja sakte...aap lahar ki tarah nahi,aap samay ki tarah aage badh rahi hai....bas iswar se meri yahi prathana hai ki aapka aur samay ka saath hamesha bana rahe,aap samay ke saath chale,na samay se aage aur na samay se piche...aur saath me mujhe bhi le le.....

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  10. shabd kam padh rahe hain apki tareef ke liye....bas itni kahungi ki aapse bahut kuchh seekhna hai mujhe...
    abha

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  11. खुबसूरत ख़यालात... खुबसूरत तरीके से और खुबसूरत सलीके से.

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  12. *थपकियाँ देती हूँ खुद को ,
    पर नींद-लहरें बहा ले जाती हैं !*
    ...........
    बहुत ही भावःप्रवीण सौंदर्य है इन बातों में...

    थपकियों का इस्तेमाल लहरों पर करके देखे...
    शायद मंज़र और मुकाम बदल जाए...

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  13. डुबोया तो जाने कितना कुछ
    पर लहरों के संग
    वापस चले आते हैं.......
    रात के सन्नाटे में
    लहरों का शोर!!!
    थपकियाँ देती हूँ खुद को ,
    पर नींद-लहरें बहा ले जाती हैं !
    ...........
    क्या करूँ इन लहरों का ?!

    बहुत खुबसूरत |
    यादो की इन लहरों का आना - जाना जीवन के अंत तक लगा ही रहेगा, कोशिश यही करनी चाहिए की इन लहरों का इस्तमाल भविष्य की दिशा निर्धारित करने के लिए कर ली जाये |

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  14. jindagi ka taana baana, aise hi lahro ke shor ke bich dabb kar rah jaata hai, par yahi to jindagi hai........ !!

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  15. bhaut khoobsoorat raha in lahron ka aana - jana
    man ko bhaut sunder shabdon main likha hai

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  16. तो कभी दर्द के नक्शे कदम मिल जाते हैं!
    डुबोया तो जाने कितना कुछ
    पर लहरों के संग
    वापस चले आते हैं.......
    रात के सन्नाटे में
    लहरों का शोर!!!
    थपकियाँ देती हूँ खुद को ,
    पर नींद-लहरें बहा ले जाती हैं !


    baha le gayee ye lahre door kahin ret pe sagar ki aur bhaut kuch kah gayee apne shor mein..

    bahut khub likha hai..

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