14 अगस्त, 2008

बीती कहानी बंद करो........


इति यानि बीती........हास यानि कहानी...
बीती कहानी बंद करो!
नहीं जानना -
वंदे मातरम् की लहर के बारे में,
नहीं सुनना -
'साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल....'
नहीं सुनना-
'फूलों की सेज छोड़ के दौड़े जवाहरलाल....'
नहीं जानना-
ईस्ट इंडिया कंपनी कब आई!
कब अंग्रेजों ने हमें गुलाम बनाया!
कहना है तो कहो-
आज कौन आतंक बनकर आया है!
और अब कौन गाँधी है?
कौन नेहरू?कौन भगत सिंह ?
वंदे मातरम् की गूंज
किनकी रगों में आज है?
अरे यहाँ तो अपने घर से
कोई किसी को देश की खातिर नहीं भेजता
( गिने-चुनों को छोड़कर )
जो भेजते हैं
उनसे कहते हैं,
'एक बेटा-क्यूँ भेज दिया?'
क्या सोच है!
........
ऐसे में किसकी राह देख रहे हैं देश के लिए?
देश?
जहाँ से विदेश जाने की होड़ है..........
एक सर शर्म से झुका है,
'हम अब तक विदेश नहीं जा पाए,'
दूसरी तरफ़ गर्वीला स्वर,
'विदेश में नौकरी लग गई है'
........
भारत - यानि अपनी माँ को
प्रायः सब भूल गए हैं
तो -
बीती कहानी बंद करो!!!!!!!!1

28 टिप्‍पणियां:

  1. भारत - यानि अपनी माँ को
    प्रायः सब भूल गए हैं
    तो -
    बीती कहानी बंद करो!!!!!!!!1रश्मि जी
    आपने बहुत सही लिखा है। हम लोग अतीत का गुणगान करते है पर वर्तमान को नहीं सुधारते। एक सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई।

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  2. ऐसे में किसकी राह देख रहे हैं देश के लिए?
    देश?
    जहाँ से विदेश जाने की होड़ है..........
    एक सर शर्म से झुका है,
    'हम अब तक विदेश नहीं जा पाए,'
    दूसरी तरफ़ गर्वीला स्वर,
    'विदेश में नौकरी लग गई है'
    ........

    सही लिखा है आपने ..आज को सार्थक करता

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  3. बहुत ही सच उडेल दिया आप ने अपनी कविता मे,बहुत ही प्रेरणा दायक हे, आप की कविताये पढ कर लगता हे किसी महान कवि की कविताये पढ रहे हॊ, धन्यवाद

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  4. जहाँ अपनी बोली में लिखने वाले 'बाबा नागार्जुन' और 'मटियानी' जीवन अवसान विपन्नता में गुजारे पर शोभा डे और चेतन भगत *अंग्रेजी* में लिख धन-कुबेर हो जाए और रोल-मॉडल बन जाए....... !!!!!
    वहां "गाँधी' और "टैगोर" की एक राष्ट्र की भावना कैसे टिके ????????

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  5. बिल्कुल ठीक कहा आपने....आज यही सब तो हो रहा है....
    बहुत सुंदर व्याख्या आज की..जबकि हम एक और नया स्वतंत्रता-दिवस मनाने जा रहे हैं...

    वंदे मातरम...

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  6. बहुत सही आपने कहा सच है दर्द है चिंतन है जो आप जेसी लेखिका ही उठा सकती है
    जहाँ से विदेश जाने की होड़ है..........
    एक सर शर्म से झुका है,
    'हम अब तक विदेश नहीं जा पाए,'
    दूसरी तरफ़ गर्वीला स्वर,
    'विदेश में नौकरी लग गई है'
    आज भेज दिया जाने वाला भूल गया ऐसा गर्व क्या जिसे पला उसी को आँखों से दूर किया हमे सोचना होगा देश के हित ना कि अपने हित ...आप को ..सलाम जय हिंद

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  7. bahut sahi kah rahi hain aap is rachna ke madhyam se. aaj desh ki chintta na to deshwasiyon ko hai aur na hi netaon ko .sab apane swarth ki roti sek rahe hain.aaj ke netaon men se kitane jaante hain apane desh ke itihaas ko? itihaas .....hasy ban kar rah gaya hai.is rachna par
    sadhuwad

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  8. एक गंभीर चिंतन को प्रेरित करती एक प्रभावशाली रचना |
    Actully हमलोग शारीरिक रूप से आजाद तो हो गए परन्तु अधिकांशतः मानसिक रूप से आज भी गुलाम है पश्च्यात सोच, संसकृति और जीवनशैली के |

    भारतीय इतिहास का एक अंश है जो आपसे शेयर करना चाहूँगा, शायद आपने पहले सुना हो |
    अंग्रजी हुकूमत ने Lord Macaulay ko उनिसबी सदी के सुरुआत के दसक में भारतीय समाज के ऊपर एक सर्वे करने को भारत भेजा ताकि भारतीयों की कमियों को करीब से जाना जा सके और उन्हें चिरकाल तक गुलाम बनाया जा सके | Lord Macaulay भारत भ्रमण के बाद स्वदेश लौटे और ब्रिटिश पार्लियामेंट को सन १८३५ वस्तु स्थिति बतलाया जो इस प्रकार से है :
    "I have travelled across the length & breagth of India and I have not seen one person who is a beggar, who is a thief. Such wealth I have seen in this Country, such high moral values, people of such caliber that i do not think we would ever conquer this Country unless we break the very backbone of this nation, which is her spretual & cultural haritage and therefore I propose that we replace her old & ancient education system, her culture, for if the Indian thinks that all that is foreign & English is good & greater then there own, they will lose there selfsteem there native culture & they will became what we want them, a truely dominated nation"

    इस quote को जब - जब मैं पढता हू और आज की परिस्थितयों को देखता हू तो ये महसूस होता है की हम भले ही "तन की आज़ादी" का ६१ वा जश्न मानाने जा रहे है परन्तु हम आज भी अंग्रजो द्वारा फैलाये गए मानसिक गुलामी के जाल से आजाद नहीं हो पाए और वास्तविक आज़ादी की लडाई अभी भी शेष है |

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  9. बहुत बहुत बहुत ही बढ़िया..!! बिलकुल सही कटाक्ष किया है आपने आजके लोगों की मानसिकता पर,
    घर को भूल कर जो परदेश और परदेशी संस्कृति में खुद को ही भूल गए..
    एक बेटा भेजने वाले को पूछते हैं कि एकलौते बेटे को सरहद पर क्यों भेज दिया उनको बिलकुल भी एहसास नहीं कि देश के करोडों बेटे हों जिसके, उसके लिए ये एक बेटा क्या? पर ऐसे लोगों को शर्म नहीं आती कि ये जवान अगर फौज कि नौकरी छोड़ कर घर में बैठ जायेंगे तो देश कि रक्षा कौन करेगा? क्या उसके लिए बाहर के देशों से फौज आयात करने पड़ेंगे? या चुपचाप फिर से गुलाम होने दे दिया जायेगा देश को? ऐसे लोगों कि सोच पर सोचिये तो आखिर कितने उच्च ख़याल के हैं ये महानुभाव, जिन्हें देश, संस्कृति और अपनेपन कि कितनी फ़िक्र है? हाँ, जब तक उनके बच्चे यहाँ से बाहर नहीं जाते कमाने तब तक उनका स्टेटस जो ऊँचा नहीं होता.. हाई-फाई लोगों कि हाई-फाई सोच.. वाह..!! यानि हम सब तो बेवकूफ हैं ना जो देश के लिए सोचा करते हैं? हम लोग तो सोच भी लेते हैं, इनके पास सोचने तक का वक़्त नहीं होता देश के बारे में सोचने का.. क्या करेंगे ये लोग ? पैसा-पैसा और सिर्फ पैसा, और कुछ भी नहीं, ना देश ना भेष, ना सम्मति ना संस्कृति..
    जाने क्या सोच हो गयी है ऐसे लोगों की और खुद को देश से अलग कर के वो कैसे सोच पते हैं.. क्या अगर देश गुलाम होगा (भगवान ना करे ऐसा कभी हो) तो वो किसी और देश में जा कर रहने की अभी से सोच कर बैठे हैं? अगर ऐसा सोचते हैं तो लानत है ऐसे लोगों पर जो अपनी माँ का ना हुआ उसका बेटा भी उसको वही सिला देता है.. देश और मिटटी के कर्ज को चुकाने की कभी सोचा भी नहीं होगा उन्होंने.. अगर ये कह दिया जाये की देश ने विश्व बैंक से जो कर्ज लिया है उसमे सब लोग सहयोग करिए तो ऐसे लोग जाने किस बिल में जा कर छुप जाएँ.. बस, बहुत हो चूका, सोचना पड़ेगा कुछ ना कुछ बहुत जल्दी.. वरना वक़्त निकल चूका होगा हाथ से और हमे तब होश आएगा जब हम अपना सब कुछ गवां चुके होंगे..
    आपकी कविता पढ़कर जाने क्या हो जाता है..,
    बस जो दिल में आ जाता है लिख जाता हू.. और मेरा सोचना है की प्रतिक्रिया यही होती है,
    पढने के बाद मै जो कुछ भी सोच रहा हूँ वो बाकी सबको भी तो पता चले..!
    बहुत ढेर सारी बधाई दी..!!

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  10. विदेश चले जाने का अर्थ देश की सेवा से विमुख हो जाना तो नहीं-खैर, इस पर लम्बी बात हो सकती है मगर यहाँ शायद अंतर्निहित बात दूसरी है-अच्छी रचना, बधाई.

    स्वतंत्रता दिवस की आपको बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.

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  11. excellent mam...once again a precious truth....bahut hi sajeev-chitran kiya hai aapne....waise bhi jab 'watan' ki baat ho to satya bolna chahiye,chahe 'watan' ke liye sach bolne ki saza mrityu-dand hi kyo na ho...aapke dil me desh ke liye jo bhawnaye hai,use jaankar mujhe bahut achha laga....

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  12. मैंने जो लिखा उस पर आप सबों की प्रतिक्रियाएं उबलते खून सी,
    देश की शाखाएं मजबूत हैं .....
    शुक्रिया

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  13. ऐसे में किसकी राह देख रहे हैं देश के लिए?
    देश?
    जहाँ से विदेश जाने की होड़ है..........
    एक सर शर्म से झुका है,
    'हम अब तक विदेश नहीं जा पाए,'
    दूसरी तरफ़ गर्वीला स्वर,
    'विदेश में नौकरी लग गई है'

    execellent rashmiji........

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  14. बहुत ही अच्छी रचना है॥ निश्चय ही 'वर्त्तमान' कि मनोदशा दर्शाती है..सिर्फ़ एक बात और कहनी थी..बहुतों के दृष्टिकोण भिन्न हो सकते हैं..पर कितने ही आप्रवासी भारतियों के बारे में ये जरुर कहूँगा कि उनके ह्रदय के तार गहरे जुड़े हैं देश से..

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  15. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  16. इस quote को जब - जब मैं पढता हू और आज की परिस्थितयों को देखता हू तो ये महसूस होता है की हम भले ही "तन की आज़ादी" का ६१ वा जश्न मानाने जा रहे है परन्तु हम आज भी अंग्रजो द्वारा फैलाये गए मानसिक गुलामी के जाल से आजाद नहीं हो पाए और वास्तविक आज़ादी की लडाई अभी भी शेष है |
    sanji ki baat se main bhi sahmat hun.
    aapne badhya vichaar uthaya hai.
    inhin sab binduon par samwad karne hamlogon ne naya blog banaya hai. http://saajha-sarokaar.blogspot.com/
    samay mile to zaroor aayen.

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  17. आज़ादी का मंत्र जप रहे ब्लॉगर भाई।
    मेरी भी रख लें श्रीमन् उपहार बधाई॥

    हम आज़ाद हो गये हैं... शायद देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से, राष्ट्रप्रेम से,नैतिकता से, ... हम स्वतंत्र हैं कुछ भी चुनने को, कहीं भी आने-जाने को, कुछ भी झटकने को-गटकने को, कुछ भी बोलने को...छिः

    आपने बहुत सोचने वाली बात कही है।

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  18. taarif k liye shabd kahan se laun....!!!
    sahi kaha aj log apne desh ko bhool gaye hain...
    dharm aur jati k nam pe dange aur ladayiyan...apne desh ko khokla kar rahe hain...

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ये तो मैं ही हूँ !!!

आज मैं उस मकान के आगे हूँ जहाँ जाने की मनाही थी सबने कहा था - मत जाना उधर कमरे के आस पास कभी तुतलाने की आवाज़ आती है कभी कोई पु...