02 अगस्त, 2008

अपने.....!


अपमान की आग जब लगी

तो,

हाथ सेंकनेवाले अपने ही थे !

मासूमियत का मुखौटा पहन

सिहरते हुए,

घी डालते गए !

बढती लपटों ने

कितनी भावनाओं को अपनी चपेट में लिया-

इससे बेखबर ,

हाथ सेंकते गए............

कुछ रहा ही नहीं कहने को,

और न कुछ अपना लगता है,

सिवाय उन बातों के -

जिसका पाठ

इन्होंने ही पढाया..............!!!!!!

21 टिप्‍पणियां:

  1. सही शब्दों के साथ सुंदर चित्र,
    सुंदर....अति उत्तम।।।।

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  2. Rashmi ji, kya kahe aapki rachanaye itani badhiya hoti hai ki use sabdo me nahi likh sakte. jari rhe.

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  3. AAP KO PARNAAM ....AAP KI LIKHI HAR RACHNA DIL SE DILO TAK JATI HE AAP KI LAIKHNI KALAM SIRF AAP KAI HI PASS HE JO BAHUT KIMTI HAIN...JAI SAI RAM

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  4. बहुत अच्छी तरहां से समझता हूं इस बात को
    सफाई देने पर इल्जाम हम पर ही लगाये जाते हैं
    क्यूंकि
    इस अदालत में भी गवहा झूठे और मतलबी हुआ करते हैं
    अपनी हर दलील में रिश्तों कि बदनामी क्या करते हैं
    और
    फैसला सुनाये जाने पर
    एक बार फिर से समर्पण -रुपी फांसी से हम दम तोड़ते दिखते हैं
    वाह ! ये भी कितने अजीब रिश्ते हुआ करते हैं

    ऐसे रिश्ते हर बार किसी न किसी कसौटी पर परखे जाते हैं
    और जरा सी नज़र अंदाजी पर तोड़ भी दिए जाते हैं

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  5. woh apne hi hote hai jo jara jara si baato ke liye dard mein dubo jate hai...aur yaisis jahreeli baate karte hai jo bina nashatar ke hamein cheer jati hai....
    is rachna ke ahsas ko samjh skati hun kis uljhan se bahar aake nikle ka rasta dhundh rahi hai ye rachna....
    bhaut sundar abhivaykti

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  6. WAH, HAR DIL KI BAAT KO AAPNE IS KAVITA ME UTAR DIYA HAI..
    ACHHI LAGI..!!

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  7. बहुत अच्छी कविता, रशिम जी इन हाथ सेंकने वालो से बचना मुस्किल नही, लेकिन आमी को समझदार होना चहिये, फ़िर जो दुसरो के घरो मे आग लगाते हे, एक दिन खुद भी उसी आग मे जलते हे, धन्यवाद .

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  8. sach baat kahi, hamesha maine bhii isii baat ko mahsoos kiya hai!

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  9. Hmm Nice one.- ईसे मैं कहूंगा - Truth in Text n Feelin in Facts.

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  10. कुछ रहा ही नहीं कहने को,
    और न कुछ अपना लगता है,
    सिवाय उन बातों के -
    जिसका पाठ
    इन्होंने ही पढाया..............!!!!!!


    यही सच है...बेहतरीन रचना। बधाई स्वीकारें।


    ***राजीव रंजन प्रसाद

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  11. kam shabdon mei bahut kuchh kah diya
    vah kitna kuchh samjhaa diya ...

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  12. apno se jo zakhm mila karate hai,kahaa vo sila karate hai...har kisi ki aapbeetee hotee hai ye...aapne shabdo me dhala bahut achchha kiya..badhai aapko..aur haa
    meri kavita par tippanee ke liye dhanyavaad..

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  13. "बढती लपटों ने
    कितनी भावनाओं को अपनी चपेट में लिया-
    इससे बेखबर ,
    हाथ सेंकते गए............"
    बहुत सार्थक रचना...यथार्थ के एक दम करीब...बधाई.
    नीरज

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  14. सत्य कहा आपने...
    अपनों के डंक पहचानना..बहुत मुस्किल काम है

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