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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

27 जुलाई, 2012

सच क्या है ?







सच क्या था , क्या है , क्या होगा
वह -
जो तुमने
उसने
मैंने -
कल कहा
या आज सोच रहे
या फिर कल जो निष्कर्ष निकला
या निकाला जायेगा !
सच का दृश्य
सच का कथन
...... पूरा का पूरा लिबास ही बदल जाता है !

सच भी समय के साथ चलता है
और समय .... कभी इस ठौर
कभी उस ठौर
जाने कितने नाज नखरे दिखाता है ...
आँखें दिखाने पर
शैतान बच्चा भी कुछ देर मुंह फुलाए
चुपचाप बैठ जाता है
हवा थम जाती है
पर यह समय .....
सच के पन्ने फाड़ता रहता है
हर बार नाव नहीं बनाता
यूँ हीं चिंदियों की शक्ल में उन्हें उड़ा देता है !

क्या समय मुक्ति का पाठ पढ़ाता है
या सच में सच बदल जाता है
हमारे चेहरों की तरह ...
कितना मासूम था यह चेहरा
फिर नजाकत , शोखी ... अब गंभीर
कल खो जायेगा चेहरा
और फिर कभी याद नहीं आएगा !!!
ओह -
ईश्वर को इस भुलभुलैये के खेल में
क्या मज़ा मिलता है
..........
शायद वह चाहता है कि हम थक जाएँ
और खुद आउट होने की ख्वाहिश रख दें
क्या यह ख्वाहिश सच है ?


40 टिप्‍पणियां:

  1. शायद वह चाहता है कि हम थक जाएँ
    और खुद आउट होने की ख्वाहिश रख दें

    परीक्षा देते देते या सच साबित करते करते थक जाने के बाद खुद आउट होने की ख्वाहिश रख भी दें तो हर्ज क्या है,यह जानते हुए कि यह सही नहीं !!

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  2. शनिवार 28/07/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. आपके सुझावों का स्वागत है . धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  3. क्या यही उसका न्याय है ?

    सांयकाल का समय
    गाँव के कौने में बनी
    फूस की झोंपड़ी
    गोबर से लिपा फर्श
    दो चार बर्तन
    वो भी सब खाली
    खाने को कुछ भी नहीं
    भूख से व्याकुल बूढ़ी माँ
    उदिग्नता से पुत्र की
    प्रतीक्षा कर रही थी
    उसका एकमात्र सहारा
    काम से लौटेगा
    खाने के लिए कुछ लाएगा
    उसने सुबह से कुछ नहीं
    खाया था
    केवल पानी पी कर
    काम चलाया था
    आँखों में आशा के भाव
    स्पष्ट झलक रहे थे
    दूर धूल उड़ने लगी
    कुछ आवाजें सुनायी
    पड़ने लगी
    उदिग्नता कम होने लगी
    लोगों के
    पास आने पर देखा
    पुत्र अकेला नहीं आया था
    उसके मृत शरीर के साथ
    कुछ लोग भी थे
    जिन्होंने बताया
    दुर्घटना का शिकार हो
    काल कवलित हो गया था
    बूढ़ी माँ
    चुपचाप देखती,सुनती रही
    आँखों से अश्रुओं की धारा
    बह निकली
    निढाल हो कर लुडक पडी
    पुत्र के पास परलोक
    पहुँच गयी
    आँखें आकाश को देखती हुयी
    खुली की खुली ही रह गयी
    मानों परमात्मा से
    पूंछ रहीं हो
    क्या यही उसका
    न्याय है ?
    17-02-2012
    181-92-02-12

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  4. बहुत सुन्दर दी....
    बार बार पढ़ रही हूँ....
    सादर
    अनु

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  5. सच भी समय के साथ चलता है...
    .....और व्यक्ति के साथ भी.......!!
    :))

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  6. कितना मासूम था यह चेहरा
    फिर नजाकत , शोखी ... अब गंभीर
    कल खो जायेगा चेहरा
    और फिर कभी याद नहीं आएगा !!!
    ओह -
    ईश्वर को इस भुलभुलैये के खेल में
    क्या मज़ा मिलता है
    बहुत ही गहन भाव लिए यह पंक्तियां जिन्‍दगी का सच उतार दिया आपने ...आभार

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  7. सच को जानना जैसे पानी को मुट्ठी में पकड़ना .... परिस्थितिनुसार सच भी सच में बादल जाता है ... खूबसूरत प्रस्तुति

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  8. चेहरा खो जायेगा ही... इसलिए तो जो भी करना है इस पल में ही कर लें..एक पल में जीना जिसे आ जाये वह जानता है कि वह इतना सूक्ष्म है कि उसे कोई छू भी नहीं सकता.. कि वह सदा से है सदा रहेगा...

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  9. sahi bat hai kabhi-kabhi aise khyal bhi dil me aa hi jate hain..bahut acchi abhiwyakti .....

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  10. बहुत सुन्दर..इस रचना के लिए आभार...

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  11. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    आपकी प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (28-07-2012) के चर्चा मंच पर लगाई गई है!
    चर्चा मंच सजा दिया, देख लीजिए आप।
    टिप्पणियों से किसी को, देना मत सन्ताप।।
    मित्रभाव से सभी को, देना सही सुझाव।
    शिष्ट आचरण से सदा, अंकित करना भाव।।

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  12. Bahut sundar...antim panktiyon ka koi uttar nahi hai...sach mein

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  13. शायद वह चाहता है कि हम थक जाएँ
    और खुद आउट होने की ख्वाहिश रख दें
    क्या यह ख्वाहिश सच है ?
    कभी -कभी ऐसा लगता है ये वाक्य बिलकुल सच हैं, परिस्थितियां खुद आउट होने की ख्वाहिश रखने को कहती दिखती हैं, शायद यह भी उसीकी मर्ज़ी हो वो अपने ऊपर इल्जाम नहीं लेना चाहता हो. गहन अभिव्यक्ति

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  14. शायद वह चाहता है कि हम थक जाएँ
    और खुद आउट होने की ख्वाहिश रख दें
    क्या यह ख्वाहिश सच है,,,,,

    बेहतरीन गहन अभिव्यक्ति,,,,,,

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  15. सच भी समय के साथ चलता है
    और समय .... कभी इस ठौर
    कभी उस ठौर...
    सच्ची कहा दी.... सुन्दर रचना...
    सादर

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  16. ईश्वर को इस भुलभुलैये के खेल में
    क्या मज़ा मिलता है...यह प्रश्न कितनी ही बार मेरे मन में आता है .
    शायद वह चाहता है कि हम थक जाएँ
    और खुद आउट होने की ख्वाहिश रख दें
    क्या यह ख्वाहिश सच है ?....बहुत खूब!!

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  17. पर यह समय .....
    सच के पन्ने फाड़ता रहता है
    हर बार नाव नहीं बनाता
    यूँ हीं चिंदियों की शक्ल में उन्हें उड़ा देता है !

    बहुत सही कहा आपने

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  18. कभी कभी लगता है कि सच भी हमेशा एक सा नहीं होता , समय के साथ सच और उसके मायने बदलते रहते हैं , समझ नहीं आता सच क्या है , सच ही या समय !!

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  19. बहुत सुंदर !
    बहुत खूब !

    समय है सच
    या सच समय है
    सच सच है
    समय समय है
    इस से पहले
    समय हो जाये
    चलो आउट हो जायें !

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  20. बहुत सुंदर प्रस्तुति...आभार

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  21. सच.....बड़ा ही अरिबो गरीब होता है ये सच।

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  22. शायद वह चाहता है कि हम थक जाएँ
    और खुद आउट होने की ख्वाहिश रख दें
    क्या यह ख्वाहिश सच है ?


    गहन भाव ...
    साभार !!

    उत्तर देंहटाएं
  23. रश्मि जी,आपके ब्लॉग पर देरी से आने के लिए पहले तो क्षमा चाहता हूँ. कुछ ऐसी व्यस्तताएं रहीं के मुझे ब्लॉग जगत से दूर रहना पड़ा...अब इस हर्जाने की भरपाई आपकी सभी पुरानी रचनाएँ पढ़ कर करूँगा....कमेन्ट भले सब पर न कर पाऊं लेकिन पढूंगा जरूर

    सच भी समय के साथ चलता है
    और समय .... कभी इस ठौर
    कभी उस ठौर
    जाने कितने नाज नखरे दिखाता है ..

    आपको पढना हमेशा प्रीतिकर लगता है...हमेशा की तरह अद्भुत रचना है ये आपकी...सतत उच्च स्तरीय लेखन के लिए मेरी ...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  24. बहुत ठीक कहा है आपने सच भी ससमय के आठ चलता है |बहुत प्यारी कविता |सादर
    आशा

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  25. थक जाना और रुक जाना ....ये तो जिंदगी नहीं हैं ...

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  26. जिसको सच मान बैठते हैं, वह टिकता नहीं है, समय के साथ उसका स्वरूप बदलता रहता है।

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  27. सच बताएं
    हम सच जानते ही नही
    सच की तलाश भी नहीं करते
    फिर सच तक पहुंचना भला कैसे संभव है

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  28. शायद वह चाहता है कि हम थक जाएँ
    और खुद आउट होने की ख्वाहिश रख दें
    क्या यह ख्वाहिश सच है,,,,,bhaut hi gahri aur prabhaavshali prstuti....

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  29. सच है आखिर में हम खुद ही थक कर आउट होना चाहते हैं. गंभीर रचना, बधाई.

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  30. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....
    रक्षाबंधन पर्व की हार्दिक अग्रिम शुभकामनाएँ!!


    इंडिया दर्पण
    पर भी पधारेँ।

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  31. दो दिन से बार-बार पढ़ रही हूँ
    सच क्या होता है जानने की कोशिश भी
    शायद वह चाहता है कि हम थक जाएँ
    और खुद आउट होने की ख्वाहिश रख दें
    क्या यह ख्वाहिश सच है ? ?

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  32. बहुत ही सुंदर समीक्षा ...
    हार्दिक बधाई !!

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