29 जुलाई, 2012

वक़्त का इंतज़ार सही नहीं ...





मैं नहीं समझ पाती उनको , उस वक़्त को
जो बिना किसी आकस्मिक सूचना के
सुनामी ले आते हैं
और मैं किसी अनजान सड़क पर
दूर दूर तक संवेदनशीलता की तलाश में
किसी अपने को तलाशती हूँ ...
मानती हूँ
समय बड़ा बलवान
पर कई बार हम जानबूझकर
उसे बलवान बना देते हैं ...
कितनी बार समझाया है अपनों को
कि जब घबराहट , दर्द , भय से
दिल दिमाग का चक्का जाम हो
कोई राह ना मिले
तो वक़्त का इंतज़ार सही नहीं ...

वक़्त का इंतज़ार
स्वाभाविकता को निगल जाता है
होनी यही थी
या हमने होनी को अपनी मर्ज़ी की शक्ल दे दी
इसे समझना , समझाना
मुश्किल होता है
क्योंकि शब्दों के पासे अलग अलग होते हैं
.... कोई शब्द गले लग जाता है
कोई वक्र निगाहों से देखता है
तो कोई शतरंज खेलता है !

शह और मात -
क्षणिक ख़ुशी है
दर्द को बांटकर
फिर साथ चलना ही ज़िन्दगी है
और आंसू में भी ख़ुशी है !

आकस्मिक सुनामियाँ भी थम जाती हैं
यदि होनी की मिट्टी
चाक पर समय से चढ़ाई जाए
नहीं तो सब टूटकर बिखर जाता है
कारण - सुनामी नहीं
अन्दर का अकेलापन होता है
जिसकी आह वक़्त की मोहताज होती है
........

37 टिप्‍पणियां:

  1. शह और मात -
    क्षणिक ख़ुशी है
    दर्द को बांटकर
    फिर साथ चलना ही ज़िन्दगी है
    और आंसू में भी ख़ुशी है !

    वक्त का मोहताज क्यों? सुंदर प्रस्तुति.

    उत्तर देंहटाएं
  2. जीवन को बहुत करीने से सजाया है आपने शब्दों में।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सच कहा दी.....
    वक्त का इंतज़ार सही नहीं....
    होनी को टालने का प्रयास करें तो सही...

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  4. सही कहा आपने वक्त का इंतजार स्वाभाविकता को निगल जाता है ...
    और परिणामों के पीछे हम ही होते हैं ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. ओह , आज कौन सी सुनामी ने घेर लिया ? और चाक पर होनी की मिट्टी बिखर गयी .... सच है हमें अवसर का इंतज़ार नहीं करना चाहिए बल्कि अवसर को दास बनाना आना चाहिए ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत ही बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग

    विचार बोध
    पर आपका हार्दिक स्वागत है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. आकस्मिक सुनामियाँ भी थम जाती हैं
    यदि होनी की मिट्टी
    चाक पर समय से चढ़ाई जाए
    नहीं तो सब टूटकर बिखर जाता है
    कारण - सुनामी नहीं
    अन्दर का अकेलापन होता है
    जिसकी आह वक़्त की मोहताज होती है

    यही तो है ज़िन्दगी के सच

    उत्तर देंहटाएं
  8. वक्त अपनी गति से चलता है और हम अपनी गति से. कौन किसके लिए रुका है? ये सोच कर चलते रहो और कर्म करते रहो. फल तो अपने हाथ नहीं है. वक़्त की धारा हम अपने हिसाब से मोड लेंगे. बहुत सुंदर रचना कुछ सिखा रही है.

    उत्तर देंहटाएं
  9. शह और मात -
    क्षणिक ख़ुशी है
    दर्द को बांटकर
    फिर साथ चलना ही ज़िन्दगी है
    और आंसू में भी ख़ुशी है !
    बहुत सुंदर रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत ख़ूब!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 30-07-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-956 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  11. वक्त भी बड़ा जुआरी है ..अपने पासे में लपेट ही लेता है..अच्छा लिखा है..

    उत्तर देंहटाएं
  12. जीवन का कटु सत्य है.... जिससे आपने अवगत कराया है....

    उत्तर देंहटाएं
  13. आकस्मिक सुनामियाँ भी थम जाती हैं
    यदि होनी की मिट्टी
    चाक पर समय से चढ़ाई जाए
    bahut sundar likha hai di...

    उत्तर देंहटाएं
  14. शह और मात -
    क्षणिक ख़ुशी है
    दर्द को बांटकर
    फिर साथ चलना ही ज़िन्दगी है
    और आंसू में भी ख़ुशी है !

    सुंदर प्रस्तुति.,,,,,

    RECENT POST,,,इन्तजार,,,

    उत्तर देंहटाएं
  15. जब घबराहट , दर्द , भय से
    दिल दिमाग का चक्का जाम हो
    कोई राह ना मिले
    तो वक़्त का इंतज़ार सही नहीं .... ?

    उत्तर देंहटाएं
  16. बहुत गहन भावों को संजोये हुए है शब्दों में ये प्रस्तुति बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  17. आकस्मिक सुनामियाँ भी थम जाती हैं
    यदि होनी की मिट्टी
    चाक पर समय से चढ़ाई जाए
    नहीं तो सब टूटकर बिखर जाता है
    कारण - सुनामी नहीं
    अन्दर का अकेलापन होता है
    जिसकी आह वक़्त की मोहताज होती है
    ........
    bauhat khoob kaha hai...very deep and thoughtful!!

    उत्तर देंहटाएं
  18. शह और मात -
    क्षणिक ख़ुशी है
    दर्द को बांटकर
    फिर साथ चलना ही ज़िन्दगी है
    और आंसू में भी ख़ुशी है !

    Sach Hai...Bahut Sunder

    उत्तर देंहटाएं
  19. |
    एक भावपूर्ण सुन्दर और कलात्मक रचना |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  20. शब्दों के पासे अलग अलग होते हैं
    .... कोई शब्द गले लग जाता है
    कोई वक्र निगाहों से देखता है
    तो कोई शतरंज खेलता है !
    - कभी-कभी शब्दों का अपना अर्थ भी बदल जाता है
    वक्त के प्रवाह के साथ !

    उत्तर देंहटाएं
  21. आकस्मिक सुनामियाँ भी थम जाती हैं
    यदि होनी की मिट्टी
    चाक पर समय से चढ़ाई जाए
    नहीं तो सब टूटकर बिखर जाता है
    कारण - सुनामी नहीं
    अन्दर का अकेलापन होता है
    जिसकी आह वक़्त की मोहताज होती है
    मात्र यह अभिव्‍यक्ति नहीं .. एक ऐसा सच है जो अनुभवी आंखों ने देखा और वक्‍़त की कसौटी पर परखा गया है ... प्रेरणात्‍मक पंक्तियां लिए उत्‍कृष्‍ट लेखन ... आभार

    उत्तर देंहटाएं
  22. ~कारण - सुनामी नहीं
    अन्दर का अकेलापन होता है
    जिसकी आह वक़्त की मोहताज होती है~

    'अकेलापन खुद अपने आप में एक सुनामी है....'~भावपूर्ण रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  23. शह और मात -
    क्षणिक ख़ुशी है
    दर्द को बांटकर
    फिर साथ चलना ही ज़िन्दगी है
    और आंसू में भी ख़ुशी है !

    ये समझ आ जाए फिर जिंदगी से कोई गम ना रहे...
    सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  24. रश्मि जी नमस्कार...
    आपके ब्लॉग 'मेरी भावनाएं' से कविता भास्कर भूमि में प्रकाशित किए जा रहे है। आज 30 जुलाई को 'वक्त का इंतजार सही नहीं...' शीर्षक के कविता को प्रकाशित किया गया है। इसे पढऩे के लिए bhaskarbhumi.com में जाकर ई पेपर में पेज नं. 8 ब्लॉगरी में देख सकते है।
    धन्यवाद
    फीचर प्रभारी
    नीति श्रीवास्तव

    उत्तर देंहटाएं
  25. आकस्मिक सुनामियाँ भी थम जाती हैं
    यदि होनी की मिट्टी
    चाक पर समय से चढ़ाई जाए
    नहीं तो सब टूटकर बिखर जाता है

    सही बात कही है आपने वक़्त का इंतज़ार सही नहीं ... आपके अनुभवों के खजाने का एक और मोती... आभार

    उत्तर देंहटाएं
  26. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....
    रक्षाबंधन पर्व की हार्दिक अग्रिम शुभकामनाएँ!!


    इंडिया दर्पण
    पर भी पधारेँ।

    उत्तर देंहटाएं
  27. आकस्मिक सुनामियाँ भी थम जाती हैं
    यदि होनी की मिट्टी
    चाक पर समय से चढ़ाई जाए
    नहीं तो सब टूटकर बिखर जाता है

    बहुत सुंदर । वक्त बलवान तो है पर हमारा मन उससे भी बलवान ।

    उत्तर देंहटाएं
  28. बहुत ही गहन भावों को लिए जीवन का एक औत सच दिखाया..आभार रश्मि जी..

    उत्तर देंहटाएं
  29. कारण को खोज निकालने और बताने के लिए,धन्यवाद!!

    उत्तर देंहटाएं
  30. होनी की मिट्टी
    चाक पर समय से चढ़ाई जाए
    नहीं तो सब टूटकर बिखर जाता है ....

    ध्रुव सत्य को रेखांकित करती रचना दी...
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  31. रश्मि जी नमस्कार...
    आपके ब्लॉग 'मेरी भवनाएं' से कविता भास्कर भूमि में प्रकाशित किए जा रहे है। आज 3 अगस्त को 'वक्त का इंतजार सही नहीं...' शीर्षक के कविता को प्रकाशित किया गया है। इसे पढऩे के लिए bhaskarbhumi.com में जाकर ई पेपर में पेज नं. 8 ब्लॉगरी में देख सकते है।
    धन्यवाद
    फीचर प्रभारी
    नीति श्रीवास्तव

    उत्तर देंहटाएं
  32. कारण - सुनामी नहीं
    अन्दर का अकेलापन होता है
    जिसकी आह वक़्त की मोहताज होती है
    bahut achchha likha hai aapne ....
    aapko man ki suksham bhavnaaon ko pragat karne me ..daksh ho gayi hai ...
    likhti jaaye ...shubh kamna ...mai padhataa rahungaa ,,,..

    उत्तर देंहटाएं
  33. कारण - सुनामी नहीं
    अन्दर का अकेलापन होता है
    जिसकी आह वक़्त की मोहताज होती है
    bahut achchha likha hai aapne ....
    aapko man ki suksham bhavnaaon ko pragat karne me ..daksh ho gayi hai ...
    likhti jaaye ...shubh kamna ...mai padhataa rahungaa ,,,..

    उत्तर देंहटाएं

ये तो मैं ही हूँ !!!

आज मैं उस मकान के आगे हूँ जहाँ जाने की मनाही थी सबने कहा था - मत जाना उधर कमरे के आस पास कभी तुतलाने की आवाज़ आती है कभी कोई पु...