22 जुलाई, 2008

तुम अपनी लगती हो.....


क्यूँ तुम अच्छी लगती हो?

क्या इसलिए कि,

तुम्हारे पास शब्दों की थाती है?

या इसलिए कि,

मेरी तरह तुम भी सपने बेचती हो?

या,

तुम्हारे पास भी जादुई परियाँ हैं!

......

तुम मेरी हमउम्र नहीं,

पर जज्बातों की उम्र एक-सी है....

नाम से अनजान हूँ,

फिर भी एक पहचान है...

बताना तो,

ये शब्दों की पिटारी तुम्हे कैसे मिली?

मैंने जो छड़ी अपने सिरहाने राखी थी

तुम्हे कैसे मिली?

क्या कोई परी

तुम्हारे आँगन भी उतरी थी?

या,

दर्द की एक लम्बी सड़क

तुम्हारे हिस्से भी आई थी?

जो भी हो,

तुम अपनी लगती हो,

कोई मुलाकात नहीं,

पर हमसफ़र लगती हो...............

23 टिप्‍पणियां:

  1. मेरी तरह तुम भी सपने बेचती हो?

    या,

    तुम्हारे पास भी जादुई परियाँ है!

    शानदार, कमाल!

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  2. बिलकुल सही है दीदी...ऐसा ही लगता है... :):)

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  3. Thanks to the owner of this blog. Ive enjoyed reading this topic.

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  4. कौन हैं यह ...:) सुंदर लिखी है ..हमेशा की तरह

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  5. क्या कोई परी

    तुम्हारे आँगन भी उतरी थी?

    या,

    दर्द की एक लम्बी सड़क

    तुम्हारे हिस्से भी आई थी?

    adbhut hain ye shabd koyee shabd kaheen se khoj payoon to tareef karoon. amma bhee door hain nahee tum use prshanasa udhar mang leta

    koyee masoom aspas nahee nahee to ek kilkaree rakh deta abhee to har shabd ke ek kala teeka laga diya hai kaheen nazara na lag jaye

    Anil

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  6. एक अजीब सा रिश्ता बन जाता है....
    वो प्यार उस बेबसी में नज़र आता है
    जिसमे मन ही मन चुपके से
    अपने दिल की बातें किया करता है...
    उस वक़्त मेरे साथ सिर्फ उसका अक्स
    कुछ सपने और एक एहेसास होता है
    जो मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ता
    हर पल मेरे साथ होता है
    प्यार उम्र क्या देखे वो देखे जज़्बात
    एहेसास ही काफी है चाहें ना हो मुलाकात

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  7. कहीं वो मैं तो नहीं....हे... हे...

    आपकी लेखनी बहुत बोलती है ....
    लिखते रहिये......

    स-स्नेह
    गीता पंडित (शमा)

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  8. अपने भीतर झाँकने का प्रयास सफल रहा है।बहुत अच्छा लिखा है।

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  9. कोई मुलाकात नहीं,
    पर हमसफ़र लगती हो
    कितनी सच्ची बात कही है आपने मुझे सचमुच कभी-कभी ऐसा ही लगता है !!

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  10. तुम मेरी हमउम्र नहीं,
    पर जज्बातों की उम्र एक-सी है....

    bahut khoob ! saty hai !


    Deepak Gogia

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  11. दर्द की एक लम्बी सड़क

    तुम्हारे हिस्से भी आई थी?

    जो भी हो,

    तुम अपनी लगती हो,

    कोई मुलाकात नहीं,

    पर हमसफ़र लगती हो...............

    just superb.ek bahot hi achha bavnatmak creation

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  12. क्या कोई परी

    तुम्हारे आँगन भी उतरी थी?

    या,

    दर्द की एक लम्बी सड़क

    तुम्हारे हिस्से भी आई थी?

    जो भी हो,

    तुम अपनी लगती हो,

    कोई मुलाकात नहीं,

    पर हमसफ़र लगती हो........


    bahut khoob.....aaj aapka andaje byaan juda sa hai.

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  13. जब दो चिरपरिचित भावनाए एक दुसरे से रूबरू होती है तो फिर उम्र, दूरी और वजूद गौण हो जाता है और सब कुछ बहुत पास -पास और अपना अपना सा प्रतीत होता है | सही कहा आपने |

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  14. दर्द की एक लम्बी सड़क


    तुम्हारे हिस्से भी आई थी?


    जो भी हो,


    तुम अपनी लगती हो,


    कोई मुलाकात नहीं,


    पर हमसफ़र लगती हो...............


    ये पंक्तियाँ कमाल की हैं .

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  15. आजकल आपकी परियों से दोस्ती हो गयी लगती है आपकी...

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  16. शब्दों की पिटारी कोई किसी के नाम कर देता है.
    कौन है वो?.....शायद जादुई परिया!
    पूछा गया प्रश्न और भावनाएं बहुत ही सुन्दर हैं,परियों के पंख-सी

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  17. namste
    mein kya kahun smajh nahi pa rahi hun....dil me ja basa har shabd ....yahi to hota hai jab mein likhti hun jab kuch dil mein ja basta hai mein likhit hun.
    apne mujeh is rachna mein uthara apne aur mere khwabo ka tana bana buna acha laga..iske har prashan ka uttar dungi mein apko ...yais akran aacha lagega apko aur mujhe doino ko hi hai na????


    apna khyaal rakhna

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