31 जुलाई, 2008

बोलो ना !


मेरे पास एक इन्द्रधनुष है,

चलोगे धरती से आकाश पर?

रंग सात हैं,

जिस रंग पर बैठो

नीला आकाश मुठ्ठी में होगा,

सितारे टिमटिमाकर स्वागत करेंगे........

बोलो ना,

चलोगे आकाश पर?

इन्द्रधनुष से उतरकर

बादलों पर बैठ जाना

वे किसी ऊँचे पर्वत की चोटी पर उतार देंगे,

वहां से दुनिया को देखना.......

बोलो ना,

बादलों की पालकी पर चलना है?

बोलो ना,
मेरे साथ खेलना है????????

33 टिप्‍पणियां:

  1. अगर इतनी सुंदर रचनाए मिलेगी वहा तो ज़रूर चलना है..

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  2. ऐसी दुनिया में रमना आपसे बहेतर कोई नहीं जानता कोई भी नहीं
    sabse aage mai huin aapka shaitanu main khelinga mai cahluinga aur pareshan bhi bahut karuinga...:)

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  3. बोलो ना,
    मेरे साथ खेलना है????????
    aap ka likha ...shbdo ka khel hai kitni achhi trah sai aap nai in shbdo ko piro diya inderdanush,sitaarey,aakash,badalo ki mala piro .apnai saath humey bhi ghuma diya ..aap ka shukriya.aur parnaam

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  4. ACHHI LAGI, PAR AISA LAG RAHA HAI KI AAP HUME LALCHAA RAHI HO.. THIK USI TARAH JAISE CHHOTE SE BACHHE KO USKI BADI BAHEN KHELNE JANE KO BULA RAHI HO.. GUD..!!

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  5. di aapka har shabd indradhanush ke rang se saja hai aur anat lok ki ser karata hai....aapke bhaav main dubne par bhala kaun hai jo khud ko yaad rakh sake....

    ehsaas chalega pal pal aapke saath!

    mohak aur alhad man ke swapno ki abhivyakti....sundar prastutikaran hai

    ...Ehsaas!

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  6. kitana sahaj.........aur kitana sundar....kaash ! main bhee aisa
    likh patee....rashmi ji.......

    badhaee....

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  7. कया सुन्दर एहसास हे , चलिये हम भी चलेगे सब के साथ, बहुत सुन्दर, धन्यवाद

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  8. सितारे टिमटिमाकर स्वागत करेंगे
    बोलो ना,
    चलोगे आकाश पर?

    यदि आप ऐसे बोलेंगी तो कौन ना कह सकेगा। सुंदर रचना, अति उत्तम।।।।।।

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  9. is baar bhee ek bahut hee pyaree kavita hai man kee khsuhee kavita se baat kar rahee hai
    Anil

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  10. बहुत प्यारी और उम्दा रचना... बेहतरीन....

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  11. As an opportunity i saw your this creations. In real sense, I have no words to comments that you have written with just a good sense of literature and you used your words where they should be used.
    Really i like it and desirous to get your all new creations.
    ...Ravi
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  12. बोलो ना,


    बादलों की पालकी पर चलना है?


    बोलो ना,
    मेरे साथ खेलना है????????
    "really beautiful, enjoyed reading it ya"
    Regards

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  13. kyu na chaloongi ...itne pyaar se manuhaar ki aur naa kah de koi ....
    bahut pyaari rachna...

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  14. मोहक सपनीली छटा है ..
    हम चलने को उत्सुक तो है पर ....
    डर है कि मेरे अपने सपनो की तरह वहां पहुचने पर उन तारों की हकीकत बदल ना जाए ..
    वो इन्द्रधनुष पिघल ना जाये..

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  15. aunty racha bahut sunder hai...par mai ni chalungi...qki zaruri to nahi k inderdhanush jitna dur se sunder lagta hai utna paas se bhi lage,ho sakta hai uske rang dur se jitni shanti or sukun dete hai utne hi paas se wo aankhon ko chubhe....
    or dharti mein kya burai hai yahan ki har cheez apni hai...chahe buri hi q na ho...kayi baar baarish k baad prakarti ko dekh k bhagwan ko thanks karne ka mun karta hai..qki humein us watavaran mein uske seerat ka ehsaas hotra hai surat ka nahi....mai udna to chahti hun par apne pankho k zareeye.....

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  16. बोलो न चलोगे मेरे साथ...
    बादलों की पालकी पर सवार होकर .......
    आसमान की सैर पर......

    अति सुंदर रचना...!!

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  17. बादलों की पालकी पर चलना है?


    kya baat hai...is khyaal ko lekar to bahut door chale jaye palki mein baithey naye khyaalo ko boonane ki raah pe. bahut achi rachna man ko harshane wali.

    "मोहक सपनीली छटा है ..
    हम चलने को उत्सुक तो है पर ....
    डर है कि मेरे अपने सपनो की तरह वहां पहुचने पर उन तारों की हकीकत बदल ना जाए ..
    वो इन्द्रधनुष पिघल ना जाये..

    last line mein kya kah diya...mein to ek dam achambhit hun ..bhaut sahi likha hai apne bhi.
    ki pighal na jaye..aur phir kya hogaa na jaane kya hoga phir

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  18. कहीं हम गिर न पड़े ! मुझे तो उचाई से डर लगता है .मेरा जाना कैंसिल . आप हो आइये शुभकामना !

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  19. सुंदर भावपूर्ण है यह कविता जो सपनो की दुनिया में ले जाती है

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  20. .इंसान कितना भी बड़ा क्यूँ न हो जाए दिल में कंही न कंही ,मन के किसी न किसी न कोने में एक निश्छल ,सरल और मोहक बचपन अपनी पूरी अल्लाह्दता के साथ साँसे लेता रहता है....बनावती दुनिया और डरावनी आधुनिकता में कभी पिस ता और कभी अपनी बेबस बौद्धिकता पे रोते व्यक्ति को अचानक ही बालसुलभ मह्त्वाकान्च्छायें जीने की राह दिखा देती हैं.....
    निश्चय ही जीवन अपनी तमाम त्रासद सच्चाइयों के वावजूद अपनी खूबसूरती को बचाए रखता है...
    अपने रंग ,अपनी चमक,अपनी विहंगमता और अपनी ऊष्मा को उनके लिए संजो कर कर रखता है जो मरुस्थलिये विचारों से ऊपर उठ कर उसकी निर्विकार सुन्दरता को देखने का उल्लासित प्रयास करते हैं....!!!
    ***बोलो ना !*** एक पुल की तरह जिंदगी के रास्तों को पूर्णता दे रही है ....तो कभी आसमां की ऊंचाई पर उन्मुक्त होने की चाह लिए पर कटे परिंदे की तरह तरसते मन को एक जोड़े पंख की सौगात दे रही है....बेहद प्यारी रचना....
    ....देश.

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  21. आपकी यह प्यारी रचना कहीं और पढ़ी है दी... कहाँ...? कहाँ...??
    बहुत सुन्दर...
    सादर.

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