08 मई, 2011

दवा 2.5 mg का



समय अपने चाक पर
मुझे घुमाता गया
तेज तेज बहुत तेज
गडमड गडमड चेहरे
खुद से परेशान खुद में लीन
इधर उधर जिधर देखा यही नज़र आया
मैं मजबूत होती गई
या होना पड़ा
या और कोई चारा नहीं था
क्या पता !
उन दस्तावेजों को खोलती गई
जो बचपन से मिलते रहे थे
कुछ काटा कुछ छांटा
आँखों पर चश्मा चढ़ा
माथे पर बल देकर
कई दस्तावेजों की रूपरेखा बदल डाली !
इसमें भी अनोखा क्या है भला
बहुत सोचा
सबने बदला है
आगे भी यही होगा
कोई एक पेड़ ही जड़ से थोड़े न उखड़ता है
सबकी अपनी अपनी बारी है ....
वो तो भला हो इन शब्दों का
जो भावनाओं को देखते देखते
कागज पर तैरने लगते हैं
और कई लोगों तक बहकर
छूकर
एक रात की नींद बन जाते हैं !
इस बार यह दवा 2.5 mg का
पढ़नेवालों के नाम ...

42 टिप्‍पणियां:

  1. "इस बार यह दवा 2.5 mg का
    पढ़नेवालों के नाम ..."

    क्या बात कही आपने.
    आपकी कवितायेँ हमेशा गहन विचारों को अपने में समेटे होती हैं.

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. खुद से परेशान खुद में लीन
    इधर उधर जिधर देखा यही नज़र आया
    मैं मजबूत होती गई
    या होना पड़ा
    या और कोई चारा नहीं था
    क्या पता !
    उन दस्तावेजों को खोलती गई
    जो बचपन से मिलते रहे थे
    कुछ काटा कुछ छांटा
    आँखों पर चश्मा चढ़ा
    माथे पर बल देकर
    कई दस्तावेजों की रूपरेखा बदल डाली !
    ...
    दीदी ....ऐसा झंझावात ? कुम्हार और चक....फिर अन्गढ़ी मिटटी की निर्मम पीड़ा से निअक्ली...सुन्दर मूर्ति जिसे आजका लोग रश्मि प्रभा के नाम से जानते हैं...बहुत सुन्दर दीदी...आपको समझना एक पुरे दर्शन को समझने के बराबर है....
    कई दिन बाद ऑनलाइन आया हूँ...क्षमा कर देना.

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  3. समय के चाक पर न जाने किन शंकाओं में ढलती जिन्दगी।

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  4. और कई लोगों तक बहकर
    छूकर
    एक रात की नींद बन जाते हैं !
    इस बार यह दवा 2.5 mg का
    पढ़नेवालों के नाम ...

    sunder rachna .....!!

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  5. दीदी आपकी सोच कमाल कि है जिन्दगी को कितने अच्छे से समझ कर आप हर कविता लिखती है
    जो सोच हम सोचते रहे जाते है वो आप अपने शब्दों में ढाल देती है ...बहुत खूब लिखा है ..........

    वक़्त के सांचे में खुद को ढाल
    यादो के साये में जीना पड़ा
    अपनों की कमजोरी के आगे
    खुद को मजबूत कर
    बेदर्दी ...और बेरुखी
    के नाम से नवाज़े गए
    और
    हमहे सबके बीच
    यूँ ही जीना है ...........(अंजु...(अनु)

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  6. बहुत सुन्दर रचना| धन्यवाद|

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  7. वो तो भला हो इन शब्दों का
    जो भावनाओं को देखते देखते
    कागज पर तैरने लगते हैं
    और कई लोगों तक बहकर
    छूकर
    एक रात की नींद बन जाते हैं !

    समय के चाक पर गढती ज़िंदगी ... और दस्तावेजों की काट छांट ... फिर भी बह आती हैं भावनाएं ..बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  8. २.५ एम जी. बिल्कुल नया विम्ब है... बहुत अर्थ हैं इसमें...

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  9. वो तो भला हो इन शब्दों का
    जो भावनाओं को देखते देखते
    कागज पर तैरने लगते हैं

    अगर ये शब्द न हों तो शायद घुट कर ही रह जाएं हम
    बहुत ख़ूब !

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  10. कोई एक पेड़ ही जड़ से थोड़े न उखड़ता है
    सबकी अपनी अपनी बारी है ....
    theek boli aap.....

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  11. वो तो भला हो इन शब्दों का
    जो भावनाओं को देखते देखते
    कागज पर तैरने लगते हैं
    और कई लोगों तक बहकर
    छूकर
    एक रात की नींद बन जाते हैं !
    इस बार यह दवा 2.5 mg का
    पढ़नेवालों के नाम ...


    wahhh ...shayad hum jaiso ke liye hi...

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  12. एक रात की नींद बन जाते हैं !
    इस बार यह दवा 2.5 mg का

    :)....dawa tak baat jam rahi thi...
    di aap to uske potential tak pahuch gayee...great!!
    sach me aap bejor ho!

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  13. 2.5 एम. जी ...स्पोरलेक
    समय की चाक पर तेज घूमते विचार किसी की नींद दवा बन जाएँ , यह हुनर कम ही लोगों में होता है !

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  14. माटी के पुतलों के दस्तावेजों को संभाल कर रखना ,वाह क्या बात है आपकी लेखनी को नमन

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  15. आदरणीया,
    जितने बार आपके ब्लॉग पर आता हूँ कुछ नया ले जाता हूँ.....
    हमेशा की तरह नए तरीके और शिल्प में बुनी हुयी कविता....!

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  16. आपका लेखन बहुत ही अच्‍छा एवं प्रेरणात्‍मक है ..बधाई के साथ शुभकामनाएं ।

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  17. एकदम अनूठे बिम्ब का प्रयोग .क्या बात है.

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  18. वो तो भला हो इन शब्दों का
    जो भावनाओं को देखते देखते
    कागज पर तैरने लगते हैं
    और कई लोगों तक बहकर
    छूकर
    एक रात की नींद बन जाते हैं !

    आपके लिखे पर कई बार यूं लगता है जैसे सिर्फ खामोश रहकर इन्‍हें पढ़ते रहो ... पढ़ते रहो ।

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  19. बेहद गहन विचारो का समावेश्…………बहुत सुन्दर्।

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  20. बहुत ही अच्‍छा लिखा है ।

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  21. .

    समय की चाक....

    awesome ! very impressive expression.

    .

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  22. waah!!!

    bahut sunder...

    aadarniya aapse ek vinti hai ki aapke profile me "meri bhawnayen" naam se do baar link dikhata hai, unme se ek jo upar se pehle aata hai khulta nahi hai.....kripaya us link ko delete karwa de taaki confusion naa ho....

    vo link nahi khulne ke kaaran "meri bhawnayen" blog se meri tarah kai paathakon ko wanchit rahna pada hoga....

    aabhar./.......

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  23. सच बात है, बिछड़े सभी बारी बारी....
    रहस्यवाद से ओतप्रोत रचना..

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  24. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 10 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  25. नींद ना लानी हो तो लिखना शुरू कर दीजिये...और लानी हो तो पढना...२.५ मिग्रा की गोली से बचना जरुरी है...समय ऐसे-ऐसे नाच नाचता है कि नींद का उड़ जाना स्वाभाविक है...

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  26. सबकी अपनी अपनी बारी है ....
    वो तो भला हो इन शब्दों का
    जो भावनाओं को देखते देखते
    कागज पर तैरने लगते हैं
    और कई लोगों तक बहकर
    छूकर
    एक रात की नींद बन जाते हैं !
    इस बार यह दवा 2.5 mg का
    पढ़नेवालों के नाम ...
    shbad hi hain jo sahara dete hain jeevan ke bahut se mod pr
    badhai

    उत्तर देंहटाएं
  27. कोई एक पेड़ ही जड़ से थोड़े न उखड़ता है
    सबकी अपनी अपनी बारी है ....
    वो तो भला हो इन शब्दों का
    जो भावनाओं को देखते देखते
    कागज पर तैरने लगते हैं
    और कई लोगों तक बहकर
    छूकर
    एक रात की नींद बन जाते हैं !
    इस बार यह दवा 2.5 mg का
    पढ़नेवालों के नाम ...

    आपका लेखन बहुत ही अच्‍छा एवं प्रेरणात्‍मक है ..बधाई के साथ शुभकामनाएं ।

    उत्तर देंहटाएं
  28. 'कोई एक पेड़ ही जड़ से थोड़े न उखड़ता है , bahut gahri baat rashmi ji

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  29. इस बार यह दवा 2.5 mg का
    पढ़नेवालों के नाम ...

    kavita aur title donon badhiya.

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  30. bahut acche ,shabd sanjeevani hain ....agar vaidh sushesh jaisa ho aur use dhoondhne wala bhavnao ke parvaton se aapke jaisa...

    उत्तर देंहटाएं
  31. दी ,
    बहुत अच्छा सोचा आपने ....ये समय का चाक साधना आ जाये ,तभी दवा की डोज़ भी असर कर पायेगी नहीं तो मात्रा बढानी पड़ जायेगी ...सादर!

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  32. वो तो भला हो इन शब्दों का
    जो भावनाओं को देखते देखते
    कागज पर तैरने लगते हैं
    और कई लोगों तक बहकर
    छूकर
    एक रात की नींद बन जाते हैं !"
    बहुत खुबसुरत भावनाए है --रश्मि जी !

    उत्तर देंहटाएं
  33. कोई एक पेड़ ही जड़ से थोड़े न उखड़ता है
    सबकी अपनी अपनी बारी है ....
    वो तो भला हो इन शब्दों का
    जो भावनाओं को देखते देखते
    कागज पर तैरने लगते हैं
    और कई लोगों तक बहकर
    छूकर
    bahut sunder rachanaa badhaai aapko.
    mera blog per bhi najaren innayat kijiye .thanks

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  34. अधखुले दस्तावेजों में सहेजे खोयी हुई नींद के पन्ने
    फिर सपनों की दुनिया सरल सहज अनमने !! बधाई
    चाक पर चाक हो जाने की !!

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  35. jindgi waqt ke chalk par dhalti hui wo sham he, jiska ki har koi intjaar karta he, ki shayad aane wala kal uska hoga! isi ummeed main to gaddi aage badhti jati he!

    shaandar prastuti DI
    1

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  36. "वक़्त के सांचे में खुद को ढाल
    यादो के साये में जीना पड़ा
    अपनों की कमजोरी के आगे
    खुद को मजबूत कर
    बेदर्दी ...और बेरुखी
    के नाम से नवाज़े गए
    और
    हमहे सबके बीच
    यूँ ही जीना है"
    अनुभव के भंडार से बाहर आते तत्व .अद्भुत है आपका अपनी सोच और भावनाओं को शब्द देना .काफी अर्थ समेटे हुए है यह रचना.

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  37. चाक पर आपकी हथेलियों के बीच जो सृजित हुआ वह खूबसूरत है वो जो कागज पर उतर आया और कोमलता से छू भी गया है .... बधाई

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  38. एक रात की नींद बन जाते हैं !
    इस बार यह दवा 2.5 mg का
    पढ़नेवालों के नाम ...बहुत सुन्दर भाव है। अच्छा लगा । आभार सहित…….

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  39. चित्र ने ताकते रहने को मजबूर किया...
    लगातार...
    कविता रह गई...वह भी बेहतर ही थी...

    उत्तर देंहटाएं
  40. रचना बहुत सुन्दर है दीदी, खासकर यह बात कि मजबूत कोई बनता है या बनना पड़ता है ,,,
    पर आजकल 2.5 mg दवा से कोई रोग ठीक नहीं होता है दीदी, सारे रोग भी अब मजबूत बन गए हैं ... आप डॉक्टर के पास जाइये ... 500 mg से नीचे तो कोई दवाई देता ही नहीं है ..:)

    उत्तर देंहटाएं

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