04 मई, 2011

दो आत्माएं और प्यार


यादों के ढेर से ज्वालामुखी नहीं फटती , दर-दर की ठोकरों से रास्ते बनाकर दो आत्माएं मिलती ही नहीं ....

शरीर तो नश्वर है
मिलकर भी नहीं मिलता
मात्र उसे लेकर
किसी को कोई सुकून नहीं मिलता
शरीर को लम्हा लम्हा जीकर भी
साँसें अधूरी रहती हैं
मन का कोना कोना
खाली होता है...

पर जब दो आत्माएं एकाकार होती हैं
तो शरीर प्रेम का अनोखा विम्ब होता है
हर स्पर्श एक नई पहचान
नई शुरुआत होती है
धड़कनों की छोड़ो
सोयी आँखें भी इज़हार करती हैं
कमरे से बाहर होकर भी
कमरे के अन्दर 'हम' रहता है
घूंट घूंट लम्हें को पीता है
लोगों की भीड़ से अलग
गर्म साँसों को सुनता है
नशीली आँखों की इस भाषा को ही
प्यार कहते हैं
जो हर शाख से जुड़ता है
एक सुरंग की कौन कहे
जाने कितनी सुरंगें बनाता है
सात समंदर से भी
नंगे पाँव चलकर आता है
इन पैरों की क्या आलोचना करोगे
इसकी गर्मी को कैसे झेलोगे ?

जो संबंध आत्मा से है
उसे तोडना
उससे जूझना
उसे समझना
आसान नहीं
ज़िन्दगी को गाना
सबके वश की बात नहीं
और जो गाते हैं
उनकी तान को मौन करना
अन्याय है
.............
ईश्वर अपने आप में प्रेम है
प्रेम के द्वार से सारे पृष्ठ खुलते हैं
द्वार को बन्द कर दोगे
तो ......
तुम्हारी पहचान गुम हो जाएगी
दो आत्माओं के मध्य
भूले से भी मत आना
इस आँच को सह नहीं पाओगे

ईश्वर की आँखों से गर आंसू बहे
तो कोई तुम्हें माफ़ नहीं करेगा
तुम्हारा ये नाम
गुमनामियों के अँधेरे में
बेनाम दम तोड़ देगा !

45 टिप्‍पणियां:

  1. शाश्वत सम्बन्ध तो शाश्वत तत्व ही समझ सकते हैं।

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  2. ईश्वर अपने आप में प्रेम है
    प्रेम के द्वार से सारे पृष्ठ खुलते हैं
    द्वार को बन्द कर दोगे
    तो ......
    तुम्हारी पहचान गुम हो जाएगी

    बहुत ही गंभीर विवेचन किया है....इस कविता में प्रेम के सच्चे रूप की व्याख्या मिलती है.

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  3. सच कहा प्रेम इश्वर का दूसरा नाम है.शरीर से शुरू होने वाले सम्बन्ध जब आत्मा तक पहुँच एक हो जाते हैं ,समुचि सृष्टि उसमे समा जाती है और..... प्रेम अपने सत्य स्वरूप में होता है दो के बीच...फिर भी समस्त का...हा हा हा क्योंकि वो स्वार्थी नही.समस्त दुनिया को समेट लेने की शक्ति लिए होता है.
    क्या खूब लिखती हो.जीवन ने बहुत कुछ दिया है भावाभिव्यक्ति के लिए. है न ? तुम्हारे हर शब्द में मैं खुद को देख रही हूँ किसी कांच के आर पार देख ले ज्यों कोई.....पर ये बद दुआए किसको??? ये दर्द क्यों?
    लिखती हो या सिसकती हो कभी कभी कुछ रचनाओं में ?

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  4. पर जब दो आत्माएं एकाकार होती हैं
    तो शरीर प्रेम का अनोखा विम्ब होता है
    हर स्पर्श एक नई पहचान
    नई शुरुआत होती है

    मन को छूने वाली पंक्तियाँ ..... प्रेम तो आत्माओं का ही हो ....

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  5. जो संबंध आत्मा से है
    उसे तोडना
    उससे जूझना
    उसे समझना
    आसान नहीं
    ज़िन्दगी को गाना
    सबके वश की बात नहीं

    बहुत सुंदर रश्मि जी ,आप की भावाभिव्यक्ति ज़बर्दस्त है
    बधाई स्वीकार करें

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  6. आध्यात्म प्रेम पर बहुत सटीक प्रस्तुति ...


    तुम्हारी पहचान गुम हो जाएगी
    दो आत्माओं के मध्य
    भूले से भी मत आना
    इस आँच को सह नहीं पाओगे

    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ

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  7. जो संबंध आत्मा से है
    उसे तोडना
    उससे जूझना
    उसे समझना
    आसान नहीं
    ज़िन्दगी को गाना
    सबके वश की बात नहीं

    इतनी गहन बात कहना तभी संभव है जब कोई आत्मा से ही बात करे.आत्मा को समझने के लिए आत्म तत्व में लीन होना पड़ता है.और ऐसा होने पर जिंदगी का सुरीला गीत स्वयं गाया जाने लगता है.

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  8. जो संबंध आत्मा से है
    उसे तोडना
    उससे जूझना
    उसे समझना
    आसान नहीं
    ज़िन्दगी को गाना
    सबके वश की बात नहीं
    और जो गाते हैं
    उनकी तान को मौन करना
    अन्याय है

    रश्मि जी, आसान से शब्दों में गूढ़ अर्थ प्रस्तुत करने की कला में आप माहिर हैं. बहुत उम्दा रचना है.

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  9. जो संबंध आत्मा से है
    उसे तोडना
    उससे जूझना
    उसे समझना
    आसान नहीं
    ज़िन्दगी को गाना
    सबके वश की बात नहीं
    और जो गाते हैं
    उनकी तान को मौन करना
    अन्याय है
    ati sunder.

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  10. बहुत सुंदर प्रस्‍तुति, धन्यवाद

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  11. रश्मिप्रभाजी ...........आपने जो भी कहा बहुत सुनार और साथ ही सत्य भी है......कुछ इस तरह का मैंने भी लिखा था........
    कोई अगर ये कह दे

    कि हमारे मध्य समय ने उत्पन्न की है दूरी ............

    तो मैं यह मान सकती नहीं

    क्यूंकि

    मेरा ख्याल ,तुम्हारे पास

    और तुम्हारा ख्याल मेरे पास

    जिस पल पहुँच जाता है

    समय तो वहीँ रुक जाता है

    तो दूरी कब ?दूरी कैसी ? दूरी कहाँ ?

    कोई अगर यह कह दे

    कि तुम्हारी मेरी दूरी

    समय की नहीं वरन स्थानों की है दूरी..................

    तुम रहते हो दूर वहाँ

    और मैं रहती हूँ दूर यहाँ

    पर, मैं और तुम तो आ जाते हैं पास

    जिस क्षण कर लें एक दूसरे को याद

    तो दूरी कब? दूरी कैसी? दूरी कहाँ?

    कोई अगर यह कह दे

    कि स्थान की नहीं वरन अलग व्यक्तित्व होने से दूरी है................

    पर, यह तो संभव ही नहीं है

    क्यूंकि

    तुम मेरी अस्मिता का ही रूप हो

    और मैं तुम्हारी पहचान हूँ

    तो दूरी कब? दूरी कैसी?दूरी कहाँ?

    कोई अगर यह कह दे

    कि तुम और मैं अलग व्यक्तित्व नहीं वरन भिन्न आत्मा होने से दूर हैं................

    पर यह तो संभव ही नहीं है

    क्यूंकि

    आत्माएं भले भिन्न हों पर परमात्मा तो एक है

    और इसीलिए शायद ,

    तुम्ही नज़र आते हो मुझे हर ओर

    तो दूरी कब? दूरी कैसी? दूरी कहाँ?

    ये दूरी: मेरी-तुम्हारी

    एक भ्रम है

    जो "हमें "

    "मैं" और "तुम" में बांटती है

    वरना "ऐक्य" है मुझमें -तुममें

    "हम" के रूप में

    "परम ब्रहम" के स्वरुप में .

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  12. बेहतरीन कविता रश्मि जी... प्रेम को आपने आध्यात्मिक, अलौकिक रूप दिया है इस कविता में.. बहुत बढ़िया..

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  13. ek acchi rachna...
    par ishwar dayalu hain...un aatmaon jinme prem pana[pta hai
    un aatmaon ke paridhi me aane se koi bhi aatma prem ka hi anubhav karegi...
    aur jo vaastav me prem karte hain
    wo bhi dayalu hote hain...kyonki prem bhavnao ki aisi kadi hai jise do aatmaon ke beech wo parmatama jodta hai ....

    उत्तर देंहटाएं
  14. कविता के भावों में डूब कर रह गयी हूँ ...दो आत्माओं के मिलन को ना कोई जोड़ सकता है ना कोई रोक सकता है ,उन आत्माओं के सिवा ...
    कविता में क्या नहीं है ...
    प्रेम , अध्यात्म , समझाईश , धमकी !

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  15. आज तो आप किसी दूसरी दुनिया में ले गयी.
    भावनाओ की कोमल अभिव्यक्ति. बहुत सुंदर लगी यह कविता.

    उत्तर देंहटाएं
  16. पर जब दो आत्माएं एकाकार होती हैं
    तो शरीर प्रेम का अनोखा विम्ब होता है
    हर स्पर्श एक नई पहचान
    नई शुरुआत होती है
    बेहतरीन शब्द सामर्थ्य युक्त इस रचना के लिए आभार !!

    उत्तर देंहटाएं
  17. शरीर को लम्हा लम्हा जीकर भी
    साँसें अधूरी रहती हैं
    मन का कोना कोना
    खाली होता है...

    वाह क्या बात कह दी आपने दीदी, बहुत सही है ... कभी कभी सबकुछ होते हुए भी मन में खालीपन होता है ...

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  18. शब्द जब आपके कलम से निकलते है तो आत्मीयता , प्रेम और मानवता की मिसाल बनते है . प्रेम आत्मा का मिलाप है ये तो सर्वमान्य है .

    उत्तर देंहटाएं
  19. ज़िन्दगी को गाना
    सबके वश की बात नहीं
    और जो गाते हैं
    उनकी तान को मौन करना
    अन्याय है
    और ये अन्याय लगातार हो रहे हैं। भगवान को लोग भूल गये हैं। अच्छी रचना के लिये बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  20. पर जब दो आत्माएं एकाकार होती हैं
    तो शरीर प्रेम का अनोखा विम्ब होता है
    हर स्पर्श एक नई पहचान
    नई शुरुआत होती है
    :)
    rashmi di aap to ab kaviyatri us upar ho gaye ho...
    aap adhaytm ki baat karne lage ho!!
    simply great!

    उत्तर देंहटाएं
  21. दो आत्माओं के मध्य
    भूले से भी मत आना
    इस आँच को सह नहीं पाओगे

    बिल्‍कुल सच कहा है इस रचना के हर शब्‍द में, शुरू से अंत तक ..पर कुछ लोग इन बातों से परे सिर्फ अपनी मैं में ही जीते हैं और स्‍वयं को सर्वोपरि मान लेते हैं, उन्‍हें समझाने के लिए यह पंक्तियां अतिउत्‍तम हैं ... आपकी लेखनी को नमन है ...बहुत ही गहराई से प्‍यार को उसकी पवित्रता को व्‍यक्‍त किया है आपने ।

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  22. ईश्वर अपने आप में प्रेम है
    प्रेम के द्वार से सारे पृष्ठ खुलते हैं
    द्वार को बन्द कर दोगे
    तो ......
    तुम्हारी पहचान गुम हो जाएगी
    दो आत्माओं के मध्य
    भूले से भी मत आना
    इस आँच को सह नहीं पाओगे
    puri rachna anupam hai...

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  23. कमरे से बाहर होकर भी
    कमरे के अन्दर 'हम' रहता है

    bahut gaheri bat kahi hai...

    ईश्वर की आँखों से गर आंसू बहे
    तो कोई तुम्हें माफ़ नहीं करेगा
    तुम्हारा ये नाम
    गुमनामियों के अँधेरे में
    बेनाम दम तोड़ देगा !

    bahut hi sahi....vo sambandh koi bhi ho sakta hai sirf ek nari aur purush ka nahi ..

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  24. सर्वप्रथम बधाई ! दिल्ली के पुरस्कार वितरण में पुरस्कृत होने के लिए -
    सुंदर रचना !बेहद संवेदन शील शब्द वाह !आपकी जितनी तारीफ करू कम है !

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  25. अध्यात्म प्रेम ..बहुत ही सुन्दर और सटीक लिखा है.

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  26. जो संबंध आत्मा से है
    उसे तोडना
    उससे जूझना
    उसे समझना
    आसान नहीं
    ज़िन्दगी को गाना
    सबके वश की बात नहीं
    और जो गाते हैं
    उनकी तान को मौन करना
    अन्याय है

    बहुत सुंदर रश्मि जी, आपने अपनी रचना के माध्यम से आध्यात्मिक प्रेम को दिव्य, आलौकिक स्वरुप प्रदान किया है... आपकी सोच आपकी रचना को नमन....

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  27. आत्मा से आत्मा का मिलन
    वो चाहे दिल से दिल का हो
    या ..हो भाव का ...उसे समझ
    पाना आम इंसान कि बात नहीं
    मिलन आत्मा से परमात्मा का
    जीने को ये जहान या वो जहान
    मिलन राधा और कृष्ण का
    दास्ताँ इस जहान या उस जहान ....
    बहुत सटीक विवरण ...आत्मा और परमात्मा का ...बहुत अच्छा लिखा है आपने रश्मि दीदी

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  28. जो संबंध आत्मा से है
    उसे तोडना
    उससे जूझना
    उसे समझना
    आसान नहीं
    ज़िन्दगी को गाना
    सबके वश की बात नहीं

    सच है ...

    मोहसिन रिक्शावाला
    आज कल व्यस्त हू -- I'm so busy now a days-रिमझिम

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  29. bahut sunder rachna ......
    isise sambdtit hai aajki rachna...

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  30. आत्मतत्व का सुन्दर विवेचन्।

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  31. जब आत्माएं एकाकार होती हैं...तो जिंदगी साकार होती है...शरीर का साथ तो सिर्फ इस जनम का ही है...इस प्रेम को महसूस कर सकना हर एक के बस की बात नहीं है...

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  32. कविता में धार्मिक प्रवचन । अद्भुत प्रस्तुति ।

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  33. पवित्र प्रेम शाश्‍वत सम्‍बन्‍धों का आधार है। शिष्‍ट व्‍यवहार शालीनता से भरा होता है, जबकि दूषित व्‍यवहार अकीर्तिकर होता है।

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  34. शुरू में दी गई भूमिका और चित्र भी इस खूबसूरत अहसास दिलाती कविता की गरिमा बढ़ा रहे हैं।
    शरीर के महत्व को नकार तो नहीं कह सकते लेकिन जिनके लिये प्रेम का अर्थ शरीर से शुरू होकर शरीर तक ही है, सही मायने में वो प्रेम का अर्थ ही नहीं जानते।
    गहन भावों से सजी इस रचना के लिये आभार।

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  35. अपेक्षा रहित समर्पण ही प्रेम है और यह आत्मिक मिलन से ही संभव है ,शारीरिक मिलन से नही ।

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  36. sharirik aur atmik milan ki bahut hi achhe se ukera he aapne!


    badhai kabule

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  37. atama hi pramatma hai nice do atmao kaa milan yaani parmatma se milan

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  38. गहन भावों के साथ सशक्‍त रचना

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