16 मई, 2011

पसंद अपनी ख्याल अपना ....



एक व्यक्ति के रूप अनेक !
किसी का व्यक्तित्व एक सांचे में नहीं होता
सामाजिक पारिवारिक राजनैतिक आर्थिक
हर सांचे का अपना एक सच होता है
कौन कितनी देर मिलता है
कहाँ मिलता है
उसके विषय उसकी बोली उसकी चाल
व्याख्या हमेशा अलग अलग होती है
रूचि अरुचि सब मायने रखती है
एकांत और भीड़ में
एक ही छवि बदल जाती है
वैसे ही
एक रचना ... दृष्टिकोण अनेक
एक शब्द के अर्थ अनेक
भाव अलग प्राप्य अलग
पढ़ने की मनोदशा अलग
अतीत वर्तमान सबकी
अपनी एक छाया होती है
एक बार नहीं दो बार नहीं कई बार
हम जो नहीं लिखते
उनकी भी एक शक्ल तैयार हो जाती है
....
व्यक्ति , काल , शब्दभाव ....
मित्रता,प्रेम,प्रतिस्पर्द्धा,घृणा की सान पर चढ़ते हैं
कोई प्रोत्साहित करता है
कोई अद्वितीय घोषित करता है
कोई होड़ लगाता है
कोई आलोचना के तीखे धार पर रखता है
कोई रद्दी की टोकरी में डाल देता है
सीधी सी बात है-
पसंद अपनी ख्याल अपना ....

39 टिप्‍पणियां:

  1. हाँ रश्मि जी,

    जिन्दगी में हर चीज पर हर व्यक्ति का दृष्टिकोण अलग अलग होता है और वह उसको उसी रूप में देखता है. कुछ अपनी मनःस्थिति के अनुरुप भी उसके स्वरूप को देख पाते हैं . किसी के जीवन कि कुछ घटनाएँ साजों की आवाज को भी कानों में शीशे सा डालता हुआ लगता है और कहीं वही सुमधुर ध्वनि बन मन को मोह लेती है.

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  2. आदरणीय रशिम प्रभा माँ
    नमस्कार !
    उसके विषय उसकी बोली उसकी चाल
    व्याख्या हमेशा अलग अलग होती है
    रूचि अरुचि सब मायने रखती है
    .....बहुत अच्छी भावनाएं हैं इन पंक्तियों में,

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  3. इस एक कविता में जीवन का पूरा आख्यान लिख दिया आपने...

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  4. ठीक हीतो है --पसंद अपनी -अपनी ख्याल अपने -अपने

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  5. सच ही तो है विषय एक होता है पर उसका विश्लेषण और उस पर राय अलग-अलग होती है
    बहुत सुंदर विश्लेषण किया है रश्मि जी...

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  6. बहुत ही अच्छा विश्लेषण किया है और अगर ऐसा न होता तो सबका नजरिया तो एक-सा ही होता फिर वैचारिक मतभेद कहां होते...
    तभी जिंदगी में विविधता है और जीने का अपना अलग अंदाज....
    है न...अपने ख्याल अपनी राय....

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  7. एक ही कविता में जिन्दगी का हर भाव भर दिया दीदी आपने

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  8. मानव स्वभाव और उसकी प्रकृति का सटीक चित्रण..

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  9. बहुत सरल शब्दों में आपने
    मानव समाज
    की
    बहुत बड़ी समस्या का हल दे दिया है ...

    काश आपकी यह कविता ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ लें....

    ईश्वर की कृपा से अगर वो थोड़ा बहुत ही समझ भी लें
    तो शायद
    अपने जीवन,
    जिसे फालतू के
    समझने और समझाने में गुजार रहे,
    उससे मुक्त हो जाते
    और अपने और अपने अपनों के
    के जीवन को सार्थकता दे पाते

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  10. आदरणीय रश्मि जी, ब्लॉग पर लिखी गयी टिप्पणियों पर सटीक विश्लेषण, कविता रूप में, यही तो है अद्वितीय साहित्य की नर्संगिक छमता. निसंदेह आप कविवर सिरोमणि पन्त जी की पुत्री ही नहीं सरस्वती माँ की मानस पुत्री भी है , मार्गदर्शन करती रहें धन्यवाद.

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  11. हर एक के विचार और स्‍वभाव में अन्‍तर होता है लेकिन स्‍नेह में अन्‍तर नहीं होना चाहिए।

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  12. बहुत बढ़िया .... सच में किसी भी बात को लेकर सबका सोचना अलग अलग हो सकता है....

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  13. madam... bilkul sahi kaha apne ham koi bhi rachna apne anubhavo se likhte hai.. per rachna padne apni paristithi ke anusar uska arth niklta hai... bhut hi gahraayi hai apki rachna me...

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  14. सबकी अलग पहचान है,
    वही उसका सम्मान।

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  15. जाकी रही भावना जैसी...प्रभु मूरत देखी तिन्ह तैसी...पर जब अपने दिल की बात कोई दूसरा अपने शब्दों में कह देता है...तो वाह-वाह के आलावा कुछ नहीं निकलता...

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  16. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 17 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  17. बिलकुल सही कहा आप ने अपनी कविता मे, धन्यवाद

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  18. कोई उलझा है सच से
    तो कोई बुन रहा है सपना
    यकीनन,
    पसंद अपनी ख्याल अपना

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  19. कितनी सादगी से सभी उलझनों से मुक्त कर दिया ...
    सच है पसंद अपनी -अपनी !
    आपके ब्लॉग पर आना हमेशा आत्मीयता भरा सुकून देता है...
    आभार !

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  20. मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना..!
    सुन्दर भावप्रणव रचना!

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  21. सही कहा………

    सपेक्षता का नियम है।

    देश काल परिस्थिति और मनोस्थिति से अलग अलग भाव ग्रहण किए जाते है।

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  22. बेहद खूबसूरत कविता...मानव स्वभाव और उसकी प्रकृति का सटीक चित्रण..

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  23. नज़र गर मुख्तलिफ़ न हो तो सारे रंग बेरंगे से हो जायेंगे!सच में यह जान लेना कि हर नज़रिया या विचार अपने आप में परिपक्व हो सकता है एक बडी वैचारिक उपलब्धि है!
    सुन्दर विचार की सुन्दर प्रस्तुति है!

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  24. सीधी सी बात है-
    पसंद अपनी ख्याल अपना ....yahi to aajkal jod pakadta ja raha hai.kitna achcha ho agar ham doosron ke pasan ka bhi khyal rakhen.

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  25. दीदी बहुत सुन्दर लिखा है

    मेरे अन्दर एक और मैं हूँ
    जो कभी कभी ही सामने आता है

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  26. सबका अपना अपना नज़रिया होता है इस बात को आपने बखूबी व्यक्त किया है।

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  27. एक रचना ... दृष्टिकोण अनेक
    एक शब्द के अर्थ अनेक
    भाव अलग प्राप्य अलग
    पढ़ने की मनोदशा अलग

    सच है ... कौन किस बात का क्या मतलब निकलता है ये तो उसकी दृष्टिकोण पर निर्भर करता है ... और दृष्टिकोण मनुष्य के स्वभाव या व्यक्तित्व पर ...
    सुन्दर रचना !

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  28. पूरा जीवन दर्शन है यह रचना...
    सादर...

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  29. रश्मिप्रभा जी ...........आपकी ये रचना मानव के स्वभाव ,रूचियाँ सब अलग होने की सुन्दर व्याख्या करती है....सबसे अच्छी बात है कि किसी की पसंद को अच्छा -खराब ना कहकर उसे वैसा ही स्वीकारने को कहती है......क्यूंकि सब अलग हैं...और उस बात का सम्मान अवश्य करना चाहिए

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  30. एक रचना ... दृष्टिकोण अनेक
    एक शब्द के अर्थ अनेक
    भाव अलग प्राप्य अलग
    पढ़ने की मनोदशा अलग

    बहुत ही सही कहा है....बढ़िया अभिव्यक्ति

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  31. मन के भा्वों की सुन्दर अभिव्यक्ति है

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  32. Rashmi ji first time aapko padh rahi hoon.bahut umda likhti hai aap.jeevan jeene ka alag alag dhang alag drashtikon hota hai bahut achchi vyakhya ki hai aapne.aapki tippani ka haardk dhanyavaad.

    उत्तर देंहटाएं
  33. एक रचना ... दृष्टिकोण अनेक
    एक शब्द के अर्थ अनेक
    भाव अलग प्राप्य अलग
    पढ़ने की मनोदशा अलग
    अतीत वर्तमान सबकी
    अपनी एक छाया होती है
    एक बार नहीं दो बार नहीं कई बार
    हम जो नहीं लिखते
    उनकी भी एक शक्ल तैयार हो जाती है

    यकीनन ... ऐसा ही है ।

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  34. आदरणीय रश्मि जी, सभी की पसंद और रूचि अलग अलग होती है, तो विश्लेषण में भी अंतर आना स्वाभाविक है.

    आभार.

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  35. और हम भी अपनी जगह पर राजा ...प्रजा जो कहे ..सुन्दर अभिव्यक्ति

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