07 फ़रवरी, 2012

सुकून से मरो ...



एक अपमानजनक थप्पड़ !
छोटा मत जानो या मानो
जानलेवा बन जाए
तब तक इंतज़ार क्यूँ करना !
चिंगारी को भभक कर जल जाने दो
वरना दायरा बढ़ता जायेगा ...
न्याय समय से ना हो
तो एक अपराध के
कई गुनहगार हो जाते हैं
सफाई देते देते शिकायतों की गिरहें
कसती जाती हैं ...
पता भी नहीं चलता
और अन्दर की सारी बुनावट
अजनबी हो जाती है
अपनी हँसी भी अनजानी लगने लगती है
!!!
एक वक़्त आता है
जब हमें लगता है
दुनिया बदल गई
पर सही मायनों में हम बदल जाते हैं !
ख़ामोशी कहो या सन्नाटा
वह हमारे भीतर ही गहराता है
और जब अन्दर बसंत नहीं रह जाता
तो बाहर का बसंत भी सूखा लगता है
प्रकृति भी बेगानी लगती है !
!!!
फिर क्या इंतज़ार
कैसा और किसका इंतज़ार ...
जो कुछ दबा सुलग रहा है
उसे बाहर आने दो
वरना दायरा बढ़ता जायेगा !
!!!
जानलेवा विस्फोट प्राण ले
उससे पहले गले लगकर रो लो
सुकून से मरो ...

40 टिप्‍पणियां:

  1. अनुभवसार ....सार्थक अभिव्यक्ति
    सादर !

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  2. बहुत बढ़िया रचना रश्मि जी ! मगर बुरा न मने तो एक बात कहूंगा कि सन्देश बड़ा खतरनाक प्रसारित कर रही है आप इस रचना के माध्यम से :)

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  3. अन्दर की सारी बुनावट
    अजनबी हो जाती है
    अपनी हँसी भी अनजानी लगने लगती है!!!

    मन की यह स्थिति बड़ी ही कष्‍टदायक होती है ..गहन भाव लिए सटीक बात कहती सार्थक अभिव्‍यक्ति ।

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  4. वह हमारे भीतर ही गहराता है
    और जब अन्दर बसंत नहीं रह जाता
    तो बाहर का बसंत भी सूखा लगता है
    प्रकृति भी बेगानी लगती है !
    ........बढ़िया रचना मगर बेहद प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करने की बधाई

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  5. एक वक़्त आता है
    जब हमें लगता है
    दुनिया बदल गई
    पर सही मायनों में हम बदल जाते हैं ....

    सच कहा है ... और ऐसे पल हर किसी के जीवन में आते हैं ... पूरी रचना की हर पंक्ति सत्य कहती है ...

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  6. अनुभव की कलम से निकली सुन्दर रचनायें मन विभोर कर देती हैं!
    सादर!

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  7. ख़ामोशी कहो या सन्नाटा
    वह हमारे भीतर ही गहराता है
    और जब अन्दर बसंत नहीं रह जाता
    तो बाहर का बसंत भी सूखा लगता है
    प्रकृति भी बेगानी लगती है !

    तब हम मौत को गले लगा लेते है,...

    प्रभावी रचना ..

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  8. ना हो गर खुशी
    तो गम भी नहीं हैं हज़ार ...
    फिर भी जिंदगी हैं
    चलने का नाम
    जो कभी रूकती नहीं
    अपनों के बिने भी |

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  9. bahut shreshth bhaav saarthak abhivyakti.man me jwalamukhi mat banne do fat jaayega.

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  10. ख़ामोशी कहो या सन्नाटा
    वह हमारे भीतर ही गहराता है
    और जब अन्दर बसंत नहीं रह जाता
    तो बाहर का बसंत भी सूखा लगता है
    प्रकृति भी बेगानी लगती है !


    जानलेवा विस्फोट प्राण ले
    उससे पहले गले लगकर रो लो
    सुकून से मरो ...


    कोशिश करती हूँ
    सुकून से मरने की
    गले लगकर रोने की
    हर बार करती हूँ
    पर नाकाम होती हूँ
    फिर दोबारा
    गरल भर जाता है
    और हर बार विस्फ़ोट
    पहले से ज्यादा भयावह होता है
    आखिर कब तक
    खुद को गलाये कोई
    बार बार कब तक
    अपने स्वाभिमान को जलाये कोई
    ये बाहर पसरे हों या अन्दर
    अब सन्नाटे ही बसन्त से महकते हैं
    या कहो सन्नाटों मे ही
    मैने बसंत ढूँढ लिया है ………
    जब मरना मुमकिन ना हो और जीना दुश्वार विस्फ़ोटकों के साथ जीना ही नियति बन जाती है

    बस यही कह सकती हूँ रश्मि जी ………शायद ऐसा भी होता है ज़िन्दगी मे।

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  11. न्याय समय से ना हो
    तो एक अपराध के
    कई गुनहगार हो जाते हैं
    सफाई देते देते शिकायतों की गिरहें
    कसती जाती हैं ...
    पता भी नहीं चलता
    और अन्दर की सारी बुनावट
    अजनबी हो जाती है
    अपनी हँसी भी अनजानी लगने लगती है
    !!!

    रश्मि दी...
    आप ही लिख सकती हैं ऐसा..
    अदभुद!!

    सादर.

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  12. फिर क्या इंतज़ार
    कैसा और किसका इंतज़ार ...
    जो कुछ दबा सुलग रहा है
    उसे बाहर आने दो
    वरना दायरा बढ़ता जायेगा !
    !!!
    जानलेवा विस्फोट प्राण ले
    उससे पहले गले लगकर रो लो
    सुकून से मरो .....अदभुद!!अदभुद!!महा अदभुद!!

    उत्तर देंहटाएं
  13. फिर क्या इंतज़ार
    कैसा और किसका इंतज़ार ...
    जो कुछ दबा सुलग रहा है
    उसे बाहर आने दो
    वरना दायरा बढ़ता जायेगा !
    आभार.............................. !! शुक्रिया.................................. !!

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  14. और अन्दर की सारी बुनावट
    अजनबी हो जाती है ..bahut sundar....

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  15. एक वक़्त आता है
    जब हमें लगता है
    दुनिया बदल गई
    पर सही मायनों में हम बदल जाते हैं !

    बहुत सही बात कही है .
    सुन्दर प्रस्तुति .

    उत्तर देंहटाएं
  16. प्राय‍श्‍चित ही सबसे बेहतर है।

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  17. आपकी यह कविता कुछ कठिन लगी..क्या यह किसी समाचार की ओर इशारा है, थप्पड़ वाली बात.

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  18. न्याय समय से ना हो
    तो एक अपराध के
    कई गुनहगार हो जाते हैं

    सही है जैसे - जैसे वक़्त बढता जाता है साथ बढ़ते जाते हैं गुनहगार...

    उत्तर देंहटाएं
  19. सुकून से मरो ...
    बहुत सुन्दर एवं सार्थक प्रस्तुति !
    आभार !

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  20. मन की सुगबुगाहट को कोई राह मिले...

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  21. जानलेवा विस्फोट प्राण ले
    उससे पहले गले लगकर रो लो
    सुकून से मरो ...

    हम हर कुछ सह लेंगे,इस विचार को त्यागना होगा ..

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  22. रश्मि दी!
    आज मैं कुछ नहीं कहूँगा.. कुछ की स्थिति नहीं!! बहुत ही सुन्दर और प्रेरक कविता!!

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  23. बहुत गहन अभिव्यक्ति .. और सही है चिंगारी को जल जाने दो नहीं तो दायरा बढ़ जाएगा .. कितना खूब कहा..

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  24. एक वक़्त आता है
    जब हमें लगता है
    दुनिया बदल गई
    पर सही मायनों में हम बदल जाते हैं !

    बिलकुल सही बात है दी ...
    कठिनाई के समय मन सबका ही घबराता है किन्तु ......
    हम जैसा सोचते हैं वैसा ही रास्ता बन जाता है ....सकारात्मक सोच सही राह बताती ही है ....!!

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  25. is kavita main artha ke saath-saath anubhav bhi jhalak raha hai kyunki aise pal har kisi ki zindagi main aate hee hain

    उत्तर देंहटाएं
  26. ख़ामोशी कहो या सन्नाटा
    वह हमारे भीतर ही गहराता है
    और जब अन्दर बसंत नहीं रह जाता
    तो बाहर का बसंत भी सूखा लगता है
    प्रकृति भी बेगानी लगती है !
    जीवन की सच्चाई है,जैसा मन-वैसा चमन
    जानलेवा विस्फोट प्राण ले
    उससे पहले गले लगकर रो लो
    सुकून से मरो ...

    वाह !!!!!!!!!

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  27. जानलेवा विस्फोट प्राण ले
    उससे पहले गले लगकर रो लो
    सुकून से मरो ...
    गहन एवं अर्थपूर्ण रचना!!

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  28. न्याय समय से ना हो
    तो एक अपराध के
    कई गुनहगार हो जाते हैं.......

    बेहतरीन लाईनें।

    शानदार रचना।

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  29. पीड़ा कहने से कुछ तो सुकून मिलेगा ही , बहुत सुंदर

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  30. फिर क्या इंतज़ार
    कैसा और किसका इंतज़ार ...
    जो कुछ दबा सुलग रहा है
    उसे बाहर आने दो
    वरना दायरा बढ़ता जायेगा ....
    बेहद खूबसूरत रचना...

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  31. न्याय समय से ना हो
    तो एक अपराध के
    कई गुनहगार हो जाते हैं
    ..
    आपकी बेबाक बयानी दीदी ..वाकई नमन आपको.

    उत्तर देंहटाएं

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