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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

02 फ़रवरी, 2012

अपराध समझिये



" मैंने मुज़रिम को भी मुज़रिम न कहा दुनिया में ..."
ताउम्र इसी बात पर अड़े रहे
खुश रहे ...
' कोई अफ़सोस नहीं ...' गुनगुनाते रहे
पर कौन मुज़रिम है
ये जानते हुए कहा नहीं !
तो फिर मुज़रिम
- अतिरिक्त हिम्मत लिए
जुर्म करते गए ...
तो क्या नहीं कहने का जुर्म इतना छोटा है
कि आप गाते जाएँ सीना ठोककर
' कोई अफ़सोस नहीं ....'
वहम से बाहर आएँ
ज़हर सिर्फ आपने नहीं पिया है
असर आसपास पुरजोर है
तो अपराध समझिये
मुज़रिम को मुज़रिम कहिये !!!

47 टिप्‍पणियां:

  1. कहने के लिए बड़ी हिम्मत चाहिए दी....

    आसान नहीं है सच को सच कहना..

    सादर.

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  2. तो अपराध समझिये
    मुज़रिम को मुज़रिम कहिये !!!
    दो टूक ...
    एक लुहार की ...
    सीधा प्रहार ....
    सत्य के मार्ग पर आगे बढा दिया आपने अब पीछे क्या देखना है ....

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  3. सही कहा आपने मुजरिम को मुजरिम कहिये वर्ना उनकी हिम्मत बढती जाएगी और हम भी बन जायेंगे अपराधी... गहरी सोच... आभार

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  4. ईसा ने कहा था पहला पत्थर वह मारेगा जो खुद मुजरिम न हो...क्या इस बात को भी हमें याद नहीं रखना होगा.

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  5. मुज़रिम को मुज़रिम कहिये ..क्यों डरना..सही सटीक और सीधा प्रहार..

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  6. तो अपराध समझिये
    मुज़रिम को मुज़रिम कहिये !!!
    ...... बेहद प्रभावशाली व गहरी सोच

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  7. वहम से बाहर आएँ
    ज़हर सिर्फ आपने नहीं पिया है
    असर आसपास पुरजोर है
    तो अपराध समझिये
    मुज़रिम को मुज़रिम कहिये !!!

    बिल्‍कुल सही कहा है ..आपने इन पंक्तियों में ..आभार ।

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  8. अपनी बचाव में सब कुछ जायज मान लेने की जिद लिए सब फिरते हैं..

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  9. किस किस को मुजरिम कहें . एक ढूढो हज़ार मिलते हैं .

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  10. बिलकुल जुर्म सहना भी उतना भी बड़ा जुर्म है जितना कि करना.

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  11. जब तक मुजरिम को एहसास नहीं दिलाया जायेगा की वो मुजरिम है तब तक वो और अपराध करता रहेगा ..ज़रुरी है मुजरिम को मुजरिम कहना ..

    सार्थक प्रस्तुति

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  12. सही...जुर्म को जुर्म ना कहना सबसे बड़ा जुर्म है

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  13. " मैंने मुज़रिम को भी मुज़रिम न कहा दुनिया में ..."
    कहते है.... जुर्म करने वाले से ज्यादा , जुर्म सहने वाला कसूरवार......... !!!!!

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  14. रश्मि दी,
    आज आपकी कविता पर अपनी बात के लिए साहिर साहब के शब्द उधार ले रहा हूँ:
    इन्साफ का तराजू,
    जो हाथ में उठाये,
    ज़ुल्मों को ठीक तोले
    ज़ुल्मों को ठीक तोले
    ऐसा न हो कि कल का
    इतिहासकार बोले
    मुजरिम से भी ज़ियादा
    मुंसिफ ने ज़ुल्म ढाया!

    इसके बाद आपकी बात पर कहने को कुछ नहीं रहता..! एक संवेदनशील मुद्दा उठाया है आपने!!

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  15. sach mein mam jyada maaf kara bhi achchha nahi bure ko bhura kah hi dena chahiye..

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  16. मुज़रिम को मुज़रिम कहने की हिम्मत जुट पाए तो शायद बहुत कुछ आसान हो जाए|

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  17. तो अपराध समझिये
    मुज़रिम को मुज़रिम कहिये !!!जिसे करने हम लोग हमेसा बचते है...... सार्थक संदेस देती अभिवयक्ति.....

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  18. कविता ... बेबाकी तथा साफगोई का बयान!

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  19. कोई अफ़सोस नहीं ....'
    वहम से बाहर आएँ
    ज़हर सिर्फ आपने नहीं पिया है

    सिर्फ जहर के रूप अलग हैं..पीना तो सबको ही पड़ता है

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  20. आपका कहना ठीक है,परन्तु कहना आसान नहीं,..बेहतरीन प्रस्तुतीकरण,

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  21. बहुत बड़ा ह्रदय चाहिए ..
    kalamdaan.blogspot.com

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  22. चुप रहना भी अपराध है। नाहक अपराध क्यों करना। अपराध से बचने के लिए मुजरिम को मुजरिम कहना ही होगा। वरना उसका हौसला बढ़ता जाएगा और वो जमाने पर जुल्म करता जाएगा।

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  23. मुजरिम को मुजरिम न कहना भी
    एक अभिशाप है रश्मी जी
    और उसे सहना तो
    बहुत बड़ा अपराध है रश्मी जी
    सुन्दर रचना के लिये बधाई.....
    कृपया इसे भी पढ़े
    नेता,कुत्ता और वेश्या

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  24. सच कह रही हैं आप - अपराध को सहना उसे बढ़ावा देने जैसा है - यह सीना ठोकने की नहीं, गर्दन झुकाने वाली बात है |

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  25. अतिरिक्त हिम्मत लिए
    जुर्म करते गए ...
    तो क्या नहीं कहने का जुर्म इतना छोटा है
    कि आप गाते जाएँ सीना ठोककर
    ' कोई अफ़सोस नहीं ....'
    अगर किसी कारणवश हम ना भी कहे पर
    प्रकृति मुजरिम को कभी माफ़ नहीं कर सकती
    एक्शन रिअक्शन प्रकृति का गुणधर्म है
    अच्छी रचना है ......बड़े दिनों बाद आई हूँ ब्लॉग पर माफ़ करे :)

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  26. मुजरिम कहने से पहले अपराध की समझ भी होनी चाहिए।

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  27. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल शनिवार .. 04-02 -20 12 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचलपर ..... .
    कृपया पधारें ...आभार .

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  28. जिस दिल लोग यह कहेगें
    फिर जुर्म कौन करेगा
    जालीम तो
    मेरे घर में आकर
    पानी भरेगा।
    सुन्दर रचना।

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  29. Bahut sahi baat, jaante hue bhi mujrim ko mujrim naa kehna bhi apne aap mein ek gunah hai...
    bahut hi saarthak rachna!

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  30. ज़हर सिर्फ आपने नहीं पिया है
    असर आसपास पुरजोर है
    तो अपराध समझिये
    मुज़रिम को मुज़रिम कहिये !!!

    ....बहुत सच कहा है...बहुत सटीक प्रस्तुति...आभार

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  31. सार्थक सन्देश देती रचना !

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  32. मुजरिम को मुजरिम कह दीजे
    जो होगा , देखा जाएगा............

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  33. वहम से बाहर आएँ
    ज़हर सिर्फ आपने नहीं पिया है
    असर आसपास पुरजोर है
    तो अपराध समझिये
    मुज़रिम को मुज़रिम कहिये !!!

    khoob soorat rachana samaj ko sach kahne ke liye dhikkarati hui rachna ...badhai Rashmi ..sath hi abhar bhi.

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  34. असर आसपास पुरजोर है
    तो अपराध समझिये
    मुज़रिम को मुज़रिम कहिये !

    सार्थक सन्देश और बहुत सटीक प्रस्तुति.

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  35. वाह रश्मि जी ,
    बहुत ही अर्थपूर्ण ,सार्थक अभिव्यक्ति..

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  36. जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध...

    अपराध बोध करने का शुक्रिया...

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