11 फ़रवरी, 2012

कत्तई नहीं ! :)



(आस पास कई लोग ऐसे भी मिल जाते हैं - )

न तुम तब
तब के थे
न तुम आज
आज के हो
तुम वह राजा भी नहीं हो
जिसके सिर पर सिंग था
तुम तो बिना सिंग के
सिंग होने की बात करते हो
और सोचते हो -
कोई तुम्हारे सिंग की चर्चा कर रहा है ...
:)
दरअसल तुम एक पागल हो
जो कभी कपड़े में होता है
तो कभी नंगा ...
ऐसे में तुम किसी दिन नंगे से परहेज रखते हो
किसी दिन कपड़े पहने लोगों से ...
:)
तुम्हारी मानसिकता दयनीय तो बिल्कुल नहीं
खतरनाक से भी अधिक हास्यास्पद है
क्योंकि तुम कभी धूनी रमाते हो
कभी नशे में धुत्त रोते हो
कभी ईंट पत्थर के साथ सम्राट हो जाते हो !
:)
बचपन और पौधा एक सा होता है
समय समय पर काटछांट ना हो
तो गुलाब गुलाब होकर भी अपनी छवि खो देता है
और इन्सान अपनी ज़ुबान !
तुमने भी ज़ुबान खो दी है
कहाँ कब किससे क्या कहना चाहिए
तुमने सीखा नहीं
पर अपने आगे सबको झुकाना चाहते हो !
तुम दया के पात्र बिल्कुल नहीं
तुम वह पात्र हो
जिसमें अमृत भी अपनी पहचान खोने लगता है
इस लिहाज से
तुमसे डर लगता है !
अपनी पहचान खोना
किसी को गवारा नहीं होता
और बेवजह एक पागल की सनक में
कत्तई नहीं ! :)

41 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा है ... आस पास भांति- भांति के लोग मिलते हैं ... दूसरों को नीचा दिखाने के चक्कर में खुद कितना नीचे गिर जाते हैं उनको खुद ही नहीं पता चलता । अपनी पहचान गंवाना कत्तयी गवारा नहीं ...

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  2. इंसानी फ़ितरत की अच्छी पड़ताल की है आपने इस काव्य के माध्यम से।

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  3. tum chaahte jo tumhein pasand
    vah hee ho sab ko pasand
    nahee to sab dushman
    galtee tumhaaree nahee tumhaaree nasl kee hai
    tum insaan to ho nahee sakte
    jaanvar bhee nahee
    usmein to nanhe pakshee aur nirih khargosh bhee hote
    mujhe pooraa yakeen hai
    tum insaan ke roop mein haiwaan ho
    kewal haivaan ho

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  4. बहुत सार्थक बात कही ..... सच है क्यों खोई जाये अपनी पहचान

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  5. इंसान क्‍या ऐसा ही होता है...???

    सुंदर प्रस्‍तुतिकरण।

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  6. बहुत गहरी पडताल है एक विक्षिप्त व्यक्ति के मानसिक दिवालिएपन की.. दरसल ऐसे लोग तो कहीं चर्चा के योग्य भी नहीं होते!!

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  7. पहचानना और जानना जरूरी है अपने आसपास को।

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  8. हँसते हुए :) बेहद गंभीर बात कर गयी कविता!

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  9. वाह वाह क्या बात कह डाली है.लोग दूसरों के बारे में बोलते हुए ये तनिक भी नहीं सोचते कि उनके बारे लोग क्या सोच रहे हैं.और ज्यादातर दूसरों के खोदे गड्ढे में खुद ही गिर जाते हैं.

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  10. बड़ी पागलपन लिए हुए कविता है :) पर सच ही तो है !!!!

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  11. अपनी पहचान खोना.......... कत्तई नहीं...... संभव ही नहीं........ !!
    इस दुनिया के भांति-भांति इंसानों के स्वभाव का सही चित्रण.... :):)

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  12. विद्रुप सत्य को खूबसूरत लिबास में प्रस्तुत किया है...लेखन की अद्भुत कला|

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  13. हां-हां-हां....................मौन -मौन सिंग को फॉरवर्ड कर रहा हूँ , फिट बैठता है उसपर :)

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  14. क्या कीजियेगा, सब झेलना ही पड़ता है...

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  15. तुमने भी ज़ुबान खो दी है
    कहाँ कब किससे क्या कहना चाहिए
    तुमने सीखा नहीं
    पर अपने आगे सबको झुकाना चाहते हो !

    नहीं तुम्हारे आगे कोई नहीं झुक सकता कतई नहीं...गहन भाव... आभार

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  16. बचपन और पौधा एक सा होता है
    समय समय पर काटछांट तो होनी ही चाहिए ....
    जो आप कर रही हैं !!!
    शुभकामनाएँ!

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  17. " रहिमन इस संसार में भांति भांति के लोग "

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  18. वाह सुंदर पड़ताल कर डाली. बहुत सुंदर प्रस्तुति.

    बधाई.

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  19. कल 13/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  20. बचपन और पौधा एक सा होता है
    समय समय पर काटछांट तो होनी ही चाहिए ...बिल्कुल सही कहा रश्मि जी..अच्छा विश्लेशण है....अभिव्यंजना में आप को न देख कर थोड़ी चिन्ता होगई...

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  21. बहुत तीखा प्रहार ...सार्थक प्रस्तुति ...

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  22. बचपन और पौधा एक सा होता है
    समय समय पर काटछांट ना हो
    तो गुलाब गुलाब होकर भी अपनी छवि खो देता है ekdam sahi baat .......

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  23. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 13-02-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  24. विचारोत्प्रेरक सार्थक रचना दी...
    सादर.

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  25. बहुत सुन्दर लाजबाब प्रस्तुतीकरण|

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  26. ऐसे पागलपन को झेलना मुश्किल है...पर क्या करें इस नवधनाढ्य संस्कृति में ऐसे सनकियों की भरमार है...जो खुद को आज का सम्राट समझते हैं...

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  27. आस पास ऐसे "भी" नहीं...ऐसे "ही" लोग है...
    ज़्यादातर...

    बहुत बढ़िया रचना दी...
    सादर.

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  28. समय समय पर काटछांट ना हो
    तो गुलाब गुलाब होकर भी अपनी छवि खो देता है
    और इन्सान अपनी ज़ुबान !

    सच कहा आपने ...सीमाओं का अपना महत्व है वर्ना पागलपन बढ़ने में देर नहीं लगती

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  29. तुम वह पात्र हो
    जिसमें अमृत भी अपनी पहचान खोने लगता है
    इस लिहाज से
    तुमसे डर लगता है !
    अपनी पहचान खोना
    किसी को गवारा नहीं होता
    और बेवजह एक पागल की सनक में
    कत्तई नहीं ! :)

    बहुत ही सशक्त रचना ! इसमें संदेह नहीं वर्तमान में हम ऐसे ही लोगों से घिरे हुए हैं और अपना अस्तित्व अपनी पहचान बनाये रखने के संघर्ष में जुटे हुए हैं ! शानदार रचना ! बधाई एवं शुभकामनायें !

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  30. बार बार दिन ये आये...बार बार दिल ये गाये...
    तुम जियो हज़ारो साल...है ये मेरी आरज़ू...

    :-)
    मुस्कान बिखराती...प्यार लुटाती...आदरणीय रश्मि दी-
    आपको जन्मदिन की बहुत शुभकामनाएँ...

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  31. अपनी पहचान खोना
    किसी को गवारा नहीं होता
    और बेवजह एक पागल की सनक में
    कत्तई नहीं ! :)

    ऐसे भी लोंग होते ही हमारे पास ...
    और सचमुच डर नहीं , शायद नफरत होती है उनसे या फिर उपेक्षा कि ऐसे लोगों के लिए क्यों अपनी धडकनें जाया करें !

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  32. तुम दया के पात्र बिल्कुल नहीं
    तुम वह पात्र हो
    जिसमें अमृत भी अपनी पहचान खोने लगता है

    teekha prahar .....bahut hi sundar

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  33. बचपन और पौधा एक सा होता है
    समय समय पर काटछांट ना हो
    तो गुलाब गुलाब होकर भी अपनी छवि खो देता है
    अनुभवी आंखों से कोई बच नहीं सकता ...जिनके पास कलम का जादू हो .. शब्‍दों का खजाना हो ..सार्थकता लिए हुए सटीक अभिव्‍यक्ति ... ।

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  34. जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ आंटी।

    सादर

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  35. तुमने सीखा नहीं
    पर अपने आगे सबको झुकाना चाहते हो !
    तुम दया के पात्र बिल्कुल नहीं
    तुम वह पात्र हो
    जिसमें अमृत भी अपनी पहचान खोने लगता है
    इस लिहाज से
    तुमसे डर लगता है !
    ..isani fitrat se sachet karti sarthak rachna ..

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  36. बहुत ही सार्थक एवं सशक्त रचना .....

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  37. तुम वह पात्र हो
    जिसमें अमृत भी अपनी पहचान खोने लगता है
    इस लिहाज से
    तुमसे डर लगता है !

    takra hi jate hain aise log kya karen didi !

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