28 अगस्त, 2010

मैं कहाँ हूँ !!!


मैं हमेशा खो जाती हूँ
फिर ढूंढती हूँ खुद को
सबके दरवाज़े खटखटाती हूँ
पर कहीं नहीं मिलती...
दम घुटता तो है
पर तलाश जारी है अपनी

कभी-कभी तब यूँ ही
बचपन की कहानी याद आती है
'अकेले कहीं मत जाना
वरना बूढ़ा बाबा
अपनी झोली में पकड़ कर ले जायेगा ...'
सोचती हूँ -
कब निकली बाहर !
कब ले गया बूढ़ा बाबा मुझे !
........
हँसते हो ?
क्या कहा .
ये मेरा भ्रम है , बुद्धू हूँ मैं ?
अगर सच में ये मेरा भ्रम है
तो मैं कहाँ हूँ
कहाँ हूँ !!!

18 अगस्त, 2010

लिखो कुछ मनचाहा



उन लम्हों का हिसाब हम क्यूँ करें
जिन पर होनी की पकड़ थी
हम कितना भी कुछ कहें
हमारी राहें जुदा थीं
तुम आकाश लिख रहे थे
मैं पिंजड़े की सलाखों से
आकाश को पढ़ना चाह रही थी ...

बिना स्याही
तुमने बहुत कुछ लिखा
और बन्द कमरे की स्याह घुटन में
मैंने बहुत कुछ पढ़ा
तुम लिखना नहीं भूले
मैं पढ़ना नहीं भूली
पर अतीत के वे पन्ने
जो अनचाहे लिखे गए
उनको मैं पढ़ना नहीं चाहती
क्या तुम उन शब्दों को मिटा सकते हो ?

यकीन करो -
अभी भी मेरे पास खाली स्लेट है
और कुछ खल्लियाँ
और कुछ मनचाही इबारतें
वक़्त भी है -
तो लिखो कुछ मनचाहा
ताकि इस बार
खुली हवा में मैं पढ़ सकूँ
सबकुछ सहज हो जाये ...





12 अगस्त, 2010

अकेलापन और मेरी साँसें


अकेलेपन की हद थी !
मानसिक सन्नाटे में
पत्ते खड़खडाते थे
अनचाहे लोग जब बोलते
तो सिर्फ उनकी जुबान हिलती नज़र आती
कुछ सुनाई नहीं देता था ...

जंगल में भटकता मन
ख़ास फूलों की तलाश में
लहुलुहान होता गया ...
समझदारी ?
अकेला मन
कभी समझदार नहीं होता
हाँ भीड़ से अलग होता है !

पर क्या सारे अकेले मन
एक से होते हैं?


नहीं -
अकेला मन किसी का साथ चाहता है
अकेला मन शंकाओं से भयभीत होता है
अकेला मन शतरंज की बाज़ी खेलता है

पर भीड़ हो या अकेलापन
ज़िन्दगी रूकती कहाँ है
क़दमों के कुछ निशान काफी होते हैं
जीने के लिए
जैसे मेरे लिए -
ये निशान ही मेरी साँसें हैं !

11 अगस्त, 2010

मेरी उसकी बात ...एक पल की



'कहाँ हैं सात रंग '
'हमारे प्यार में'
'किधर?'
... उसने मेरे माथे को चूम लिया
और मेरे चेहरे पर देखते-ही-देखते
इन्द्रधनुषी रंग बिखर गए

'कहाँ है खुशबू '
'हमारे साथ में '
और उसने मुझे बाहों में भर लिया
मलयानिल मेरे रोम-रोम से बहने लगा

'कहाँ है नज़ाकत '
'हमारे विश्वास में '
और कमर में खूंसे आँचल के सिरे को
उसने हौले से खींच लिया
पूरा शरीर सरगम की धुन पर
थिरक उठा

'कहाँ है मासूमियत '
'हमारे ही प्यार में'
और अपनी हथेलियों से
मेरी आँखों को बन्द किया ...
मैं पूरी हो गई
एक पल में !

09 अगस्त, 2010

सच का सामना ???




सच का सामना ?
किसका सच ?
कैसा सच ?
जिस सच के मायने
अलग-अलग होते हैं ?

एक ही सच !
कहीं सही, कहीं गलत,
और कहीं वक़्त की मांग !

रोटी में कभी चाँद
कभी भूख
कभी हवस !

कोई शरीर को आत्मा बना जीता है
कोई शरीर को माध्यम बना जीता है
कोई शरीर को टुकड़े-टुकड़े में
विभक्त कर जीता है
बात कहीं गलत
तो कहीं सही
कहीं व्यथा बनकर चलती है
किसी की ज़िन्दगी थम जाती है
कोई पीछे मुड़कर नहीं देखता ...
एक ही कैनवस पर सोच अलग-अलग होती है !

हिसाब अपने दिमाग का होता है
हम अपने दिमागी अदालत में
अपना निजी फैसला देते हैं
मौत की सज़ा सुनाने से पहले भी
सामने वाले की रज़ा नहीं सुनते

प्यार और ज़िद
भूख और प्यास
नींद और सुकून में
बड़ा फर्क होता है
आसान नहीं सच को समझना
तो किस सच का सामना?
और किस आधार पर?

सरेआम की गई हत्या के सुराग नहीं मिलते
तो फिर घुटे हुए सच के धागों को सुलझाना
उनको कटघरे में लाना
उन पर फैसला देना
अमानवीय कृत्य है

30 जुलाई, 2010

मेरे घर आना




तमाम घरों में बड़े बड़े ताले लगे होते हैं
एक सख्त लोहे का ग्रिल
दरवाज़े पर एक होल
घंटी बजे तो देख लो
कौन है !
बड़ा खतरा है- जाने कब क्या हो जाये !
बेशकीमती सामानों से घर भरा है
मामूली चीजों की तो कोई औकात नहीं
वही चीजें हों
जिनकी कीमत आसमान छुते हों
और सबसे अलग हों
अब घर के रंग रूप ही बदल गए हैं
सामान -
प्रदर्शनी में रखे अदभुत वस्तु लगते हैं
रहनेवाले लोग कांच के नज़र आते हैं
पॉलिश इतनी ज़बदस्त
कि फिसलन ही फिसलन
बड़े तो बड़े , छोटों की अदा पर
आँखें विस्फारित रहती हैं !
क्या है असली, क्या है नकली
कोई जोड़ घटाव नहीं
अंग्रेजों की गुलामी से अलग
सब अपनी कामनाओं के गुलाम हो गए हैं
तुम.. तुम.. तुम
कोई भी संतुष्ट नहीं
रात बेचैनी में गुज़रती है
दिन मुखौटों में .............

ऐसी दहशत में
मैंने अपने घर के दरवाज़े खोल दिए हैं
मेरे घर में बेशकीमती चीजें नहीं
अनमोल एहसास हैं
एक संदूक - यादों की
एक संदूक - मासूम सपनों की
एक संदूक- मुस्कान की
हर कमरे में मैंने उन दुआओं को मुखरित किया है
जिनसे रिश्तों की गर्माहट बनी रहती है
जब हार जाओ बाज़ी लक्ष्यहीन दौड़ की
तो बेख़ौफ़ यहाँ आना
एहसासों के मध्य लम्बी साँसें लेना
फिर मुड़ना
तुम्हें अपने वे सपने दिखाई देंगे
जिनमें सिर्फ असली रंग भरे थे
एक बार -
मेरे घर आना !...

28 जुलाई, 2010

हम कुछ भी कर सकते हैं


अचानक हम बहुत अकेले हो गए हैं
सच है कि इस अकेलेपन में
हमारी ही जीत है
सफलता है
भविष्य है
हमारी शुरुआत है ...
पर !
अकेले चले नहीं
तो घड़ी की सूई थम गई है
सोच की दिलचस्प उड़ान
रुक गई है
खिलखिलाते झरने का पानी
सूख चला है
तब हम क्या करें !
चलो खूब बातें करते हैं
इतनी कि हमारे शहर चलने लगें
और करीब हो जाएँ
भरोसा है न खुद पर ?
"हम कुछ भी कर सकते हैं ..."

21 जुलाई, 2010

जल्दी आओ ...




मन उदास रहता है
कई बार...
हवा की खुशनुमा चपल चाल भी
अच्छी नहीं लगती
ज़मीन पर पाँव रखने का
चलने का दिल नहीं होता
अपने सारे प्रिय खिलौने
सहमे-सहमे नज़र आते हैं
मोबाइल हाथ में लिए
देखती रहती हूँ ...
किसका नंबर घुमाऊं
पर रुक जाती हूँ !
पता नहीं क्या कर रहे होंगे
परेशान होंगे
व्यस्त होंगे !
और मैं कहूँगी भी क्या ?
कि हवा अच्छी नहीं लगती ..
सब हँसेंगे
'ये क्या बात हुई '
पर क्या यह सहज बात है ?
सब हवा को तरस रहे
और मैं हवा से बेज़ार हूँ
यह तो एक बीमारी हो गई !
कारण?
कौन ढूंढेगा ?
और ढूंढ भी लिया तो इलाज !
न हवा को समझाया जा सकता है
न मुझे बहलाया जा सकता है
(बहल जाने की उम्र होती है) !

ऐसे में -
चल मन
एक छोटा सा ब्रेक लेते हैं
जिन नंबरों को घुमाना चाहती हूँ
उन्हें पास बुलाते हैं
बेसिर पैर की बातें करते हैं
और एक कमरे में
बेतुकी बातों पर हँसते-हँसते सो जाते हैं
.............
सुबह की चाय तब बनेगी
जब नींद पूरी होगी
जब सब साथ हों
तो एक चाय भी बिना तू तू मैं मैं के
कहाँ स्वादिष्ट होती है !

तो देर किस बात की ?
हलो ...
(ख़ास नाम ख़ास लोगों को पता है)
कोई सवाल नहीं ,
जल्दी आओ ...

14 जुलाई, 2010

कुछ तो है


मुझे नहीं मालूम
नशीली आँखों का राज़
पानी भी मयस्सर नहीं था जिसे
उसे नशे की क्या पहचान !
मुझे नहीं पता
आज सूरज क्यूँ निकला है
चर्चा तो यही थी कि
अँधेरे का साम्राज्य होगा
इस तरह अचानक
सूरज दोस्त बनेगा
गुमां न था ....
सात घोड़े के रथ पे सवार
भाग्य का शंखनाद करता सूरज
परिक्रमा कर रहा है
एक ही धुन , एक ही राग-
अब सूरज कभी अस्त नहीं होगा ... !

मुझे नहीं मालूम
मेरे रोम-रोम में
इन आँखों ने क्या जादू किया है
पर कुछ तो है ..
जिसने सुरक्षा कवच की तरह
मेरा हाथ थामा है
कुछ है,
जिसने बिना स्पर्श के
मुझे रोमांचित किया है

नहीं जानती - सत्य और असत्य
सही और गलत
स्वप्न और यथार्थ
पर कुछ तो है
जो मेरी धडकनें सुनाई देने लगी हैं
कुछ तो है
तभी तो
आत्मा परमात्मा को छू लेने को व्याकुल है

09 जुलाई, 2010

आज को जियो


आज को जीना चाहते हो
तो उस आज को जियो
जो रात तुम्हारे सिरहाने की बेचैनी ना बने
उधेड़बुन और जोड़ घटाव में
सुबह ना हो जाये
और वह आज एक प्रश्न ना बन जाये...

अतीत को उतना ही भूलो
जितनी ज़रूरत हो
अतीत को जेहन में ना रखा
तो आज को तराश नहीं पाओगे !
...
जो कहते हैं अतीत को भूल जाओ
उनसे दूरी बनाकर चलो
याद रखो-
वे जिस सबक को भूल जाने की सलाह देते हैं
अपने आल्मीरे के लॉकर में
उसे संभालकर रखते हैं ...

और भविष्य !
आज ही तुम्हारा भविष्य है
आज को संवारो
आज हंसो
आज को जियो....
कल को भविष्य माना तो एक ही सार होगा
तुमने क्या पाया?
तुम्हारा क्या गया जो रोते हो !!!

रामायण तुम्हें सुनाते हैं

http://www.youtube.com/watch?v=myx8Lb5NAes

प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो... यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है। यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती...