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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

13 अप्रैल, 2012

खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में !



ज़िन्दगी से जुड़े दर्द को
जानलेवा हम बनाते हैं
कोई मोह नहीं होता
सब दिखावा रहता है ...
खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में
सहनशीलता की मूरत बने हम
आकाश से धरती
फिर धरती से पाताल में चले जाते हैं ...

धरती और आकाश का ज्ञान तो हमें है
पर पाताल से सिर्फ शाब्दिक नाता है
तो निःसंदेह पाताल को स्वीकारना संभव नहीं होता ...

फिर हम जो सुनते हैं
उससे अलग कुछ कहते हैं
और कह दिया तो सिद्ध करने की होड़
.....
संस्कार की दुहाई देते देते
हम हैवान बन जाते हैं !
खुद के सिवा कुछ भी
नज़र नहीं आता
बाकी सबकुछ हलक के बीचोबीच !
....
न निगलते हैं
न बाहर निकाल पाते हैं
उबजुब सी स्थिति
लाइलाज !
बीमार सी ज़िन्दगी
और आस पास कोई नहीं
.....
सब कहीं न कहीं
किसी न किसी तरह से आगे निकल गए हैं
सबको लगता है -
मंजिल मिल गई
और जश्न !
अकेले मनाने को रह गए हैं
बस .....
खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में !

44 टिप्पणियाँ:

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"(Dr.Rajendra Tela,Nirantar)" ने कहा…

खुद को दिखाने के लिए
लोग क्या नहीं करते
खुद के ज़मीर को
मिट्टी में मिला देते
चेहरे पर चेहरा चढाते
बिना बात मुस्काराते
मीठी बातों से लुभाते
हर हथ कंडा अपनाते
ना करे पसंद
दिखा दे आइना कोई तो
दुश्मन उसे समझते
घमंड से भरे ऐसे लोग
सबको बेवकूफ समझते हैं
भूल जाते हैं
हीरे को परखने वाले
जोहरी भी दुनिया में होते हैं
खुद को दिखाने के लिए
लोग क्या नहीं करते

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

वाह! जी वाह! बहुत ख़ूब

कृपया इसे भी देखें-

उल्फ़त का असर देखेंगे!

shikha varshney ने कहा…

मंजिल मिल गई
और जश्न !
अकेले मनाने को रह गए हैं
बस .....
खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में !
बिलकुल सच ..पर यह समझता कौन है ..

राजेश उत्‍साही ने कहा…

बेहतर यही है कि जो हम हैं वैसे ही दिखें, वही कहें, जो कहना चाहते हैं।

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

सब कहीं न कहीं
किसी न किसी तरह से आगे निकल गए हैं
सबको लगता है -
मंजिल मिल गई
और जश्न !
अकेले मनाने को रह गए हैं
बस .....
खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में !

सही कहा , किसी के लिए मुह में गर्म दूध हैं तो किसी के लिए खुशफहमी !

lokendra singh rajput ने कहा…

खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में
सहनशीलता की मूरत बने हम
आकाश से धरती
फिर धरती से पाताल में चले जाते हैं ...
खरा सच....

मनोज कुमार ने कहा…

खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में !

सब झमेला यही और इसी के लिए है।

ऋता शेखर मधु ने कहा…

इसे कहते हैं...प्रतिष्ठे प्राण गंवायो...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में
सहनशीलता की मूरत बने हम
आकाश से धरती
फिर धरती से पाताल में चले जाते हैं ...

बस मैं ही मैं नज़र आता है
सोचते ही नहीं कि किसी और से भी नाता है ... बहुत अच्छी प्रस्तुति

वाणी गीत ने कहा…

सबसे बेहतर साबित होने की की महत्वाकांक्षा क्या नहीं करवाती लोगों से , मगर आखिर के अकेलपन से अनजान है ये लोंग !

वन्दना ने कहा…

और जश्न !
अकेले मनाने को रह गए हैं
बस .....
खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में !

कितना सच कहा है …………मगर ये बात हर किसी को समझ नही आती।

Er. Shilpa Mehta ने कहा…

बिलकुल सच कह रही हैं - अपने को बेहतर दिखने के लिए सच ही हम पाताल चले जाते हैं - very true :(

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

सब कहीं न कहीं
किसी न किसी तरह से आगे निकल गए हैं
सबको लगता है -
मंजिल मिल गई
और जश्न !
अकेले मनाने को रह गए हैं
बस .....
खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में !sahi bat...

Suman ने कहा…

और जश्न !
अकेले मनाने को रह गए हैं
बस .....
खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में !
bilkul sahi kaha hai ....

यादें....ashok saluja . ने कहा…

शायद ये ही सच है .....???
बड़े-बड़े नंगे हो गए ,इस हरम में
खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में ....

Dr.Nidhi Tandon ने कहा…

खुद को बेहतर दिखाने के चक्कर में हम नीचे ..और नीचे गिरते ही जाते हैं .

Maheshwari kaneri ने कहा…

सच कहा खुद को बेहतर दिखने ्की दौड़ में क्खुया-क्दया नहीं करते और अंत में कितने अकेले रह जाते है..ये पता नहीं...सुन्दर सटीक रचना..

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

गुलाब जब कमल बनने की कोशिश करने लगता है तो न तो वह कमल बन पाता है और न गुलाब रह जाता है.. गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने इसे स्व-धर्म कहा है..
खुद को बेहतर दिखाने का अर्थ तो यह हुआ कि भगवान ने हमें जो बनाया हम उससे संतुष्ट नहीं हैं!! सच कहा दीदी, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा!! पतन का मार्ग!!

Anupama Tripathi ने कहा…

कटु सत्य कहती रचना .....आवरण हटाना कितना मुश्किल है ....

M VERMA ने कहा…

दिखने और दिखने के क्रम में बहुत कुछ करते हैं.
विसंगतियाँ को अपनाने में भी चूकते नहीं

Sunil Kumar ने कहा…

और जश्न !
अकेले मनाने को रह गए हैं
बस .....
बहुत अच्छी भावाव्यक्ति , बधाई

dheerendra ने कहा…

खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में
सहनशीलता की मूरत बने हम
आकाश से धरती
फिर धरती से पाताल में चले जाते हैं ...

आज के सच को दर्शाती सुंदर रचना...बेहतरीन पोस्ट .

MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: आँसुओं की कीमत,....

Vaanbhatt ने कहा…

फोटो कहाँ से खोजी...एकदम सटीक है...कविता के साथ...

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बहुत खूब रश्मि दीदी !

इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - किसी अपने के कंधे से कम नहीं कागज का साथ - ब्लॉग बुलेटिन

expression ने कहा…

होड लगी है..............दौड रहे हैं सब स्वर्ण पदक पाने को............
अजीब स्थिति है....
सादर.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सबको लगता है -
मंजिल मिल गई
और जश्न !
अकेले मनाने को रह गए हैं
बस .....
खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में !

Steek.... Bilkul Sach hai, Hote dekha hai aisa.....

Vibha Rani Shrivastava ने कहा…

खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में
सहनशीलता की मूरत बने हम
आकाश से धरती
फिर धरती से पाताल में चले जाते हैं ....
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जानते हुए भी .... कभी कभी कोशिश करने पर भी दूसरा रास्ता नजर नहीं आता .... ??
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उबजुब सी स्थिति
लाइलाज !
बीमार सी ज़िन्दगी .....
हकीकत है .... फिर भी .... ?

Santosh Kumar ने कहा…

मैंने कभी osho times में पढ़ा था :
Be yourself
and then
you will be accepted by Nature,
You will be accepted by God.

सुन्दर दिखने की कोशिश तो करनी चाहिए, पर अपनी पहचान खोनी नहीं चाहिए.

Shanti Garg ने कहा…

बहुत बेहतरीन....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

Anita ने कहा…

बहुत सही कहा है...बधाई !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कभी कभी पूर्ण स्वार्थी हो जाने को जी करता है।

sushila ने कहा…

"सब कहीं न कहीं
किसी न किसी तरह से आगे निकल गए हैं
सबको लगता है -
मंजिल मिल गई
और जश्न !
अकेले मनाने को रह गए हैं
बस .....
खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में !
हम आगे निकलने की जद्दोजहद में कितना कुछ (अपना और कीमती) पीछे छोड़ जाते हैं ! बहुत भावपूर्ण और सुंदर अभिव्यक्‍ति !

vandana ने कहा…

खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में
सहनशीलता की मूरत बने हम
आकाश से धरती
फिर धरती से पाताल में चले जाते हैं ...

कटु सत्य अभिव्यक्ति

vandana ने कहा…

आदरणीय दीदी आपका ब्लॉग खुलने में बहुत समय लगता है ...नीचे दूसरे ब्लोगर्स के डिटेल आते रहते हैं या तो टिप्पणी वाले या फिर ब्लॉग सूची वाले ..इस तरह पूरी रचना को पढ़ने में काफी वक्त लगता है

कविता रावत ने कहा…

न निगलते हैं
न बाहर निकाल पाते हैं
उबजुब सी स्थिति
लाइलाज !
बीमार सी ज़िन्दगी
और आस पास कोई नहीं
..sach aisi esthiti mein sab saath dekhte bue bhi saath kahan hote hain..khud bhi bhugtna hota hai apna dard...
..veartman parishya ka sateek chintansheel prastuti..

manukavya ने कहा…

हम जो सुनते हैं
उससे अलग कुछ कहते हैं
और कह दिया तो सिद्ध करने की होड़

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति रश्मि जी... ज़िंदगी में बस अपने कहे को सिद्ध करने की होड़ में ही तो सब लगे हैं...ज़िंदगी एकसूत्री कार्यक्रम हो गयी है... ख़ुद को बेहतर सिद्ध करना, ख़ुद को साबित करना ...

सादर
मंजु

manukavya ने कहा…

हम जो सुनते हैं
उससे अलग कुछ कहते हैं
और कह दिया तो सिद्ध करने की होड़

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति रश्मि जी... ज़िंदगी में बस अपने कहे को सिद्ध करने की होड़ में ही तो सब लगे हैं...ज़िंदगी एकसूत्री कार्यक्रम हो गयी है... ख़ुद को बेहतर सिद्ध करना, ख़ुद को साबित करना ...

सादर
मंजु

आशा जोगळेकर ने कहा…

खुद को बेहतर दिखाने की ही तो कोशिश करते रहते हैं हम । सुंदर अलग सी रचना ।

Naveen Mani Tripathi ने कहा…

bahut khoob soorat rachana badhai rashmi ji

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में न जाने कितने मुखौटे बना लेते हैं, किंतु सच्चाई कुछ और होती है
न निगलते हैं
न बाहर निकाल पाते हैं
उबजुब सी स्थिति
लाइलाज !
बीमार सी ज़िन्दगी
और आस पास कोई नहीं

सदा ने कहा…

खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में
सहनशीलता की मूरत बने हम
आकाश से धरती
फिर धरती से पाताल में चले जाते हैं ...
बिल्‍कुल सच कहा है आपने ...आभार

Amrita Tanmay ने कहा…

महत्वाकांक्षा जो न करवाए.. अति सुन्दर..

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

कल 17/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Saras ने कहा…

और जश्न !
अकेले मनाने को रह गए हैं
बस .....
खुद को बेहतर दिखाने के क्रम में !
सबको पीछे छोड़ने की होड़ में जब इंसान बेतहाशा भागता है ......तो बहुत सी तिलान्जलियाँ देता जाता है ...और आखिरकार अकेला रह जाता है ..जीत की कगार पर !!!!