23 अगस्त, 2019

क्या खोया,क्या पाया !




(लिखती तो मैं ही गई हूँ, पर लिखवाया सम्भवतः श्री कृष्ण ने है )

भूख लगी थी,
रोऊँ...
उससे पहले बाबा ने टोकरी उठा ली !
घनघोर अंधेरा,
मूसलाधार बारिश,
तूफान,
और उफनती यमुना ...
मैं नारायण बन गया,
अपने लिए,
बाबा वासुदेव और माँ देवकी के लिए ।
घूंट घूंट पीता गया बारिश की बूंदों को,
शायद इसीलिए,
चमत्कारिक रूप से यमुना शांत हो गईं,
मुझे छूकर मुझे रास्ता दिया,
और मैं माँ यशोदा के निकट पहुँच गया ।
उल्लास था नंद बाबा के घर,
बाबा वासुदेव जा चुके थे,
मैं बालक भूख से व्याकुल,
माँ यशोदा के सीने से जा लगा ।
माँ यशोदा की थपकियों में,
मुझे मेरा वह ब्रह्मांड मिला,
जिसे मैं कारागृह में छोड़ आया था,
यूँ कहो,
जो मुझसे छूट गया था !
गोकुल में मिले ब्रह्मांड को मैंने हृदय से लगा लिया,
तभी - हाँ तभी,
मैं सुरक्षित रहा ताड़का के आगे,
कर सका कालिया मर्दन,
उठा सका गोवर्धन ... !
मैं ईश्वर था ?
या कारागृह में सात बच्चों की नृशंस हत्या के बावजूद,
मुझे जीवन देनेवाली माँ थी ?
अमावस्या की रात थी ?
बारिश की बूंदें थीं ?
यमुना का साथ था ?
बाबा वासुदेव का साहस था ?
या माँ यशोदा का वह अंश,
जिसने मेरी भूख मिटाई ?
मैं स्वयं अनभिज्ञ हूँ !
इस गहन ज्ञानागार में,
मैंने जाना -
तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो !
यदि मैं रोता ही रहता,
तो दो माओं,
दो पिताओं,
यमुना,गोकुल,बरसाने,मथुरा का,
कर्ज़ कैसे चुका पाता !!
मिट्टी से भरे मुख में माँ यशोदा ने,
ब्रह्मांड देखा,
या कर्तव्यों के आगे,
मेरे तिल तिलकर मरने का सत्य,
यह किसे पता !
यह सब मेरे और माँ यशोदा के बीच की कथा है,
एक मासूम रुदन की कथा !
माँ बेहोश हुई,
या निष्प्राण
... यह सिर्फ मैं जानता हूँ,
विस्मृति की चादर ओढ़ना,
उसकी विवशता थी,
जैसे कदम कदम पर,
सबकुछ खोते हुए,
नटखट बने रहना मेरी विवशता थी !
मुझे लौटना था मथुरा,
और एक जीवित कृष्ण का सम्बल,
खुशी,
सुकून,
माँ देवकी को देना था ।
श्राप कह लो,
अथवा नियति,
मैं कृष्ण,
स्वयम नहीं जानता
कि मैंने क्या खोया,क्या पाया !
पर एक सत्य है,
मेरे जन्म को जिस उल्लास से तुम मनाते हो,
तब एक क्षण के लिए ही सही,
मैं भूल जाता हूँ,
उस रात क्या क्या हुआ था,
और जी लेने की पूरी कोशिश करता हूँ
हाँ, पूरी कोशिश ।

18 अगस्त, 2019

विश्वास है





















सोई आँखों से कहीं ज्यादा,
मैंने देखे हैं,
देखती हूँ,
जागी आंखों से सपने ।
सकारात्मक,
आशाओं से भरपूर ...
बहुत से सच हुए,
और ढेर सारे टूट गए !
पर हौसले का सूर्योदय
बरक़रार है,
क्योंकि विश्वास मेरे सिरहाने है,
बगल की मेज,
खाने की मेज,
रसोई,
बालकनी,
खुली खिड़की,
बन्द खिड़की,
... और मेरे पूजा घर में है ।
विश्वास मेरी धड़कनों में है,
एक एक मुस्कान में है ।।
यूँ ही नहीं कहती मैं,
"सब बहुत अच्छा होगा"
निन्यानबे पर सांप के काट लेने से क्या,
सौ पर पहुंचना ही मेरा सपना है,
और पहुंच के दम लेना,
विश्वास है ।

11 अगस्त, 2019

अलग अलग नाप की मुस्कान




रात में,
जब कह देते हैं लोग शुभरात्रि
वक़्त के कई टुकड़े पास आ बैठते हैं,
सन्नाटा कहता है,
सब सो गए !
लेकिन जाने कितनी जोड़ी आँखें
जागती रहती हैं,
लम्बी साँसों के बीच
ज़िन्दगी को रिवाइंड करती हैं,
फिर एक प्रश्न
आँखों के सूखे रेगिस्तान में तैरता है
"जिन देवदारों ने तूफानों में दम तोड़ दिया,
उसकी टूटन को मिट्टी में मिलाकर,
कैसे कोई दर्द को शब्द देता है !"
क्या सच में वह दर्द
दर्द होता है ?
अनुत्तरित स्थिति में नींद आ जाती है,
सुबह जब आँखें खुलती हैं,
तब सर भारी भारी होता है,
सामने होती है लम्बी दिनचर्या
और ...
डब्बे में पड़ी अलग अलग नाप की मुस्कान से
एक मुस्कान निकाल लेता है,
प्रायः हर कोई,
सामनेवाले को क्या दिखाई दे रहा,
इससे बेखबर,
वह मुस्कान की धार पर चलता जाता है ...।

08 अगस्त, 2019

वक्रतुंड विघ्नहर्ता



गणपति सुखकर्ता,
वक्रतुंड विघ्नहर्ता,
गौरीनन्दन,
शिव के प्यारे,
कार्तिकेय की आंखों के तारे,
खाओ मोदक,
झूम के नाचो,
झूम के नाचो
महाकाय ... गणपति सुखकर्ता ...

लक्ष्मी संग विराजो तुम
सरस्वती संग विराजो तुम
ज्ञान की वर्षा,
धन की वर्षा
करके हमें उबारो तुम
गणपति सुखकर्ता ...

आरती तेरी मिलकर गायें,
चरणों में नित शीश झुकाएं,
दूब, सुपारी लेकर बप्पा
तेरी जय जयकार करें
विघ्न हरो बप्पा
विघ्न हरो
गणपति सुखकर्ता ...

01 अगस्त, 2019

बाकी सब अपरिचित !!!




खूबसूरत,
सुविधाजनक घरों की भरमार है,
इतनी ऊंचाई
कि सारा शहर दिख जाए !
लेकिन,
वह लाल पक्की ईंटों से बना घर,
बेहद खूबसूरत था ।
कमरे के अंदर,
घर्र घर्र चलता पंखा,
सप्तसुरों सा मोहक लगता था ।
घड़े का पानी,
प्यास बुझाता था,
कोई कोना-
विशेष रूप से,
फ्रिज के लिए नहीं बना था ।
डंक मारती बिड़नियों के बीच,
अमावट उठाना बाज़ीगर बनाता था ।
सारे दिन दरवाज़े खुले रहते थे,
बस एक महीन पर्दा खींचा रहता ।
जाड़ा हो या गर्नी,
वर्षा हो या आँधी
कोई न कोई घर का बड़ा जागता मिलता था,
मेहमानों के आने की खुशी होती थी,
बासमती चावल की खुशबू बता देती थी,
कोई आया है !
अब तो बस घरों की खूबसूरती है,
लम्बी कार है,
बाकी सब अपरिचित !!!

हादसे स्तब्ध हैं

हादसे स्तब्ध हैं, ... हमने ऐसा तो नहीं चाहा था ! घर-घर दहशत में है, एक एक सांस में रुकावट सी है, दबे स्वर,ऊंचे स्वर में दादी,ना...